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मकर संक्रांति, पोंगल और बिहू के रंग
मकर संक्रांति के दिन तड़के सवेरे उठ कर गंगासागर के पास सूर्य की पूजा करती एक महिला.
हिंदू धर्म को मानने वालों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और इस दिन सर्दी ख़त्म हो कर गर्मी के दिनों की शुरूआत होती है. इस दिन लोग सूर्य की पूजा करते हैं.
गंगासागर में सैंकड़ों हिंदू श्रद्धालु सुबह-सवेरे गंगा के तट पर पहुंचे और पूजा-आराधना की.
मकर संक्रांति को मलमास यानी हिंदू पंचाग के अनुसार शुभ काम के लिए अशुभ माने जाने वाले महीनों का अंत माना जाता है.
गंगासागर में पूजा करने पहुंचे आदिवासी समुदाय की महिलाएं.
हिंदू धर्म के अनुसार महाभारत में भीष्म पितामह अपने प्राण त्यागने के लिए शरशैय्या पर तब तक पड़े रहे थे जब तक सूर्य उत्तरायण नहीं हुए थे.
गंगा में डुबकी लगाने पहुंचे एक साधु अपने पालतू बंदर को भी साथ ले आए. इस तस्वीर में वो अपने बंदर के साथ अपनी सिगरेट शेयर कर रहे हैं.
इस त्योहार को उत्तर भारत के कई इलाकों में मकर या सकट के नाम से भी जाना जाता है. जहां उत्तर प्रदेश, पश्चिम बिहार में इसे खिचड़ी पर्व कहते हैं, मिथिला में इसे तिल संक्रांत कहा जाता है.
असम में इस दिन को भोगाली बिहू के नाम से मनाया जाता है. ये फसल की कटाई का त्योहार है.
घासफूस से मेजी बनाई जाती है और रात को आग की पूजा कर मेजी में आग लगाई जाती है.
असम में मछुआरा समुदाय के लोगों ने बिहू मनाया. इस समुदाय में लोग पूरी रात नाचते-गाते हैं और साथ मिल कर खाना खाते हैं.
इस दौरान मछली पकड़ने के खेल का भी आयोजन होता है जिसमें लोग मछलियां पकड़ते हैं. इस तस्वीर में पनबारी के गोरोइमारी झील में एक लड़के ने ये मछली पकड़ी है.
मकर संक्रांति के दिन को दक्षिण भारत के तमिलनाडु में पोंगल के तौर पर मनाया जाता है. लोग चावल से पोंगल नाम का एक व्यंजन बनाते हैं और सूर्य की पूजा करते हैं.
श्रीलंका में भी पोंगल का त्योहार मनाया जाता है और मंदिरों में ख़ास पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है.
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