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'कहीं-कहीं आधा राशन अधिकारियों के घर पहुंच जाता है'
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत की सरहदों पर कठिन परिस्थितियों में तैनात सेना और अर्ध सैनिक बलों को दिया जानेवाला खाना काफ़ी शोध के बाद तैयार किया जाता है.
देश का एक प्रमुख रक्षा संस्थान डीआरडीओ यानी 'डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइज़ेशन' शोध कर एक ख़ास तरह का खाना तैयार करता है जिससे उन्हें मुश्किल परिस्थितियों में ताक़त मिलती है.
ये सिर्फ़ उन जवानों के लिए है जो बर्फ़ीली दुर्गम पहाड़ियों या दूसरी मुश्किल जगहों पर बन पोस्ट या कैंप में तैनात हैं.
डीआरडीओ जिस खाने की सप्लाई करता है, उसकी सूची लंबी-चौड़ी है. इसमें शाकाहारी और मांसाहारी भोजन के अलावा 'ड्राई फ्रूट्स', मौसमी फल और जूस भी शामिल हैं.
देश के बाकी हिस्सों में मौजूद पोस्टों या कैंपों में तैनात जवान या अधिकारी खाना अपने हिसाब से पकाते हैं.
सेना में खाने की व्यवस्था अर्धसैनिक बलों की तुलना में बिल्कुल अलग है.
अर्धसैनिक बलों की व्यवस्था कुछ इस तरह है कि कैंपों में तैनात अधिकारी और जवानों की संख्या के हिसाब से राशन के लिए आवंटन दिया जाता है.
इस आवंटन के हिसाब से ही बाज़ार से खाद्य सामग्री ख़रीदी जाती है और खाना पकाया जाता है.
इस ख़रीददारी के लिए कैंप में जवानों की एक समिति भी बनायी जाती है जो यह तय करती हैं कि किस दिन क्या पकाया जाए. नाश्ता हो या फिर दोपहर और रात का खाना.
केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में रेलवे सुरक्षा विशेष बल के अलावा भारत तिब्बत सीमा पुलिस यानी आईटीबीपी, सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ़), सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ़), केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ़) के अलावा इंडिया रिज़र्व बटालियन (आईआरबी) शामिल हैं.
सीआरपीएफ़ से रिटायर हुए लोगों के संगठन के अध्यक्ष सुलिंदर सिंह कांडी से बीबीसी ने पूछा कि कैंपों में दिए जाने वाले खाने पर उठे विवाद को वो किस तरह देखते हैं ?
तो कांडी कहते हैं: "वैसे तो कैंपों में खाना काफी अच्छा होता है. मगर यह सब कुछ वहाँ तैनात अधिकारियों और ख़ास तौर पर कमांडिंग अफसर पर निर्भर करता है."
कांडी कहते हैं कि उन्हें कई ऐसे कैंपों के बारे में पता है जहां जवान अपनी दाल का तड़का खुद लगाते हैं.
कांडी का कहना है :" वो जो तेज बहादुर यादव ने अपने वीडियो में दिखाया है वो सच भी हो सकता है. कई ऐसे मामले हमें पता है कि जहां दस किलो दाल मिलनी चाहिए, वहां सिर्फ़ पांच किलो से काम चलाया जाता हैं जबकि बाक़ी के पांच किलो मेस अधिकारी और सीओ के घर पहुंचा दी जाती है. यही हाल तेल, घी और सब्ज़ियों का भी होता है."
मगर अर्ध सैनिक बलों से सेवानिवृत हुए जवान और अधिकारी कहते हैं कि कई अधिकारी बहुत अच्छे भी हैं जिनकी वजह से जवानों को इस तरह का खाना भी मिलता है जो उन्हें अपने घर तक में भी नहीं मिल सकेगा.
हलाकि कांडी और उनके सेवानिवृत सीआरपीएफ़ के साथियों को लगता है कि अगर कोई जवान कुव्यवस्था से तंग आकर आवाज़ उठाता है तो उसके ख़िलाफ़ बदले की भावना से कार्रवाई की जाती है. उस पर कई आरोप लगा दिए जाते हैं.
यहाँ तक कि अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाती है.
जम्मू कश्मीर में सेना के कोर कमांडर रहे लेफ्टिनेंट जनरल सय्यद अता हसनैन कहते हैं कि सरहद पर तैनात बीएसएफ की टुकड़ी वैसे तो सेना के अधीन होती है मगर खाने पीने का बंदोबस्त, अर्ध सैनिक बल अपने जवानो के लिए खुद करता है.
बीबीसी से बात करते हुए जनरल हसनैन ने कहा : "खाना पकाने का इंतज़ाम यूनिट को करना पड़ता है. सेना तो यूनिट तक सामग्री पहुंचाने की ज़िम्मेदारी लेती है. खाना पकाने में वहां तैनात जवानों की पसंद को ध्यान में रखना चाहिए. मिसाल के तौर पर अगर जवान दक्षिण भारत से आते हों तो फिर उनकी खुराक उसी तरह होनी चाहिए. मगर यह सबकुछ यूनिट को ही करना पड़ता है. सेना की यूनिट हो तो फिर सेना की ज़िम्मेदारी होती है. और अगर अर्ध सैनिक बल की टुकड़ी हो तो फिर यह बल की ज़िम्मेदारी है.''
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