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नोटबंदी: 'नोटों के लिए 5-6 माह और तरसना होगा'
- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नोटबंदी की घोषणा के दो महीने पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में कहा है कि तकलीफ़ के बावजूद आम लोगों ने नोटबंदी को दिल से स्वीकार किया है.
प्रधानमंत्री के संबोधन की जानकारी मीडिया को देते हुए केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा, "उन्होंने एक बात कही, हमारे समाज की एक परंपरा है कि वो अपने अंदर की ताक़त को पहचानता है और इससे बुराई के ख़िलाफ़ लड़ने की प्रेरणा मिलती है."
रविशंकर प्रसाद के मुताबिक़ प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में ये भी कहा, "मैंने स्वयं अपील की थी कि कुछ दिनों के लिए कठिनाई होगी. लेकिन देश की जनता ने नैसर्गिक रूप से बदलाव के इस ऐतिहासिक क़दम का स्वागत किया है."
सरकार और प्रधानमंत्री भले नोटबंदी को कामयाबी भरा फ़ैसला बता रहे हों, लेकिन कांग्रेस पार्टी नोटबंदी के फ़ैसले के ख़िलाफ़ छह जनवरी से ही देशव्यापी धरना प्रदर्शन शुरू कर चुकी है.
कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला नोटबंदी के लिए प्रधानमंत्री की आलोचना करते हुए कहते हैं, "नोटबंदी से देशबंदी वाली स्थिति हो गई है. ग़रीब किसान, मज़दूर, छोटे छोटे दुकानदार-व्यवसायी और बेरोज़गारों पर बुरा प्रभाव हुआ है. रोज़ी रोटी और रोज़गार दोनों नोटबंदी ने छीन लिए हैं."
वहीं वरिष्ठ अर्थशास्त्री अरुण कुमार के मुताबिक़ नोटबंदी के फ़ैसले से काली अर्थव्यवस्था पर कोई अंकुश नहीं लगी है.
उन्होंने कहा, "काले धन की अर्थव्यवस्था पर कोई असर होता तब तो कुछ फ़ायदा होता. ऐसा हुआ नहीं. काली संपत्ति अब नक़द के तौर पर में बैंक में आ गई है, काली कमाई बंद नहीं हुई है. लेकिन इससे देश की दूसरी अर्थव्यवस्थाओं को ज़बर्दस्त धक्का लगा है. निवेश गिर गया है, बेरोज़गारी बढ़ गई है, बैंक क्राइसिस में हैं."
रणदीप सुरजेवाला के मुताबिक़ नोटबंदी की मार देश के हर तबक़े पर पड़ी है. वे सवालिया लहजे में सरकार से पूछते हैं कि जिन लोगों पर असर पड़ा है, उसके लिए सरकार क्या कर रही है.
उन्होंने कहा, "क्या मोदी जी देश भर के किसानों को हुए नुक़सान का भरपाई करेंगे. साढ़े 25 लाख मज़दूरों की नौकरियां गई हैं, क्या उनको बेरोज़गारी भत्ता देंगे. ग़रीब बीपीएल महिलाओं के खाते में क्या 25- 25 हज़ार डलवाएंगे. छोटे कारोबारियों का नुक़सान हुआ, उसकी भरपाई के लिए क्या उन्हें एक साल तक सेल्स टैक्स और इनकम टैक्स में छूट देंगे."
इस नोटबंदी के फ़ैसले से होने वाले फ़ायदे का अनुमान अब तक सरकार नहीं बता पाई है. नोटबंदी के फ़ैसले के 50 दिन बाद के अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ना तो ये बता पाए कि सरकार ने कितना काला धन पकड़ा है और ना ही ये भरोसा दे पाए कि ये मुश्किल कब तक बनी रहेगी.
दो महीने बीतने के बाद भी सबसे बड़ी मुश्किल बैंकों में नोट की उपलब्धता को लेकर बनी हुई है. ऑल इंडिया बैंकिंग एम्पलाइज एसोसिएशन के महासचिव सी.एच. वेंकटचलम ने बीबीसी को बताया, "रिज़र्व बैंक वाले बोल रहे हैं, वित्त मंत्री बोल रहे हैं, प्रधानमंत्री बोल रहे हैं लेकिन लोगों को देने के लिए बैंकों के पास पैसा नहीं है."
वेंकटचलम के मुताबिक संकट की ये स्थिति देश के ग्रामीण इलाक़ों में भी बनी हुई है और शहरी इलाक़ों में भी. उनके दावे के मुताबिक़ अभी भी देश के आधे एटीएम में पैसा उपलब्ध नहीं हो पा रहा है.
इस बारे में अरुण कुमार कहते हैं, "नक़दी की समस्या पांच छह महीने तक चलेगी. इससे पहले इतने बड़े पैमाने पर नोटों को छापना संभव नहीं होगा. वैसे, देश की अर्थव्यवस्था पर इसका असर एक-दो साल तक दिखेगा."
वेंकटचलम के मुताबिक़ इससे आम लोगों के साथ साथ बैंक कर्मचारियों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.
वे कहते हैं, "आम लोगों को उनका ही पैसा बैंकों में नहीं मिल रहा है. 24 हज़ार की लिमिट जितना पैसा भी देने में मुश्किलें हो रही हैं. बैंक कर्मचारियों का वर्क लोड कई गुना बढ़ा हुआ है."
वेंकटचलम के मुताबिक़ जल्दी ही उनका संगठन देशव्यापी हड़ताल करने की योजना बना रहा है.
नोटबंदी का असर लंबे समय तक क्यों रहेगा, इसे स्पष्ट करते हुए अरुण कुमार कहते हैं, "जिस तरह की ख़बरें आ रही हैं, उसके मुताबिक़ निवेश गिरा है. 20 से 30 फ़ीसदी ट्रेड गिर गया है. ऐसी सूरत में बीते दो महीने के दौरान ग्रोथ निगेटिव में चली गई होगी, उससे उबरने में वक्त तो लगेगा."
बीते 8 नवंबर, 2016 को प्रधानमंत्री ने आधी रात 500 और 1000 रुपये के नोटों का चलन बंद कर दिया था. उसकी जगह रिजर्व बैंक ने 2000 और 500 रुपये के नए नोट जारी किए हैं, लेकिन जितनी मांग है, उतनी आपूर्ति नहीं हो पा रही है.
(रणदीप सुरजेवाला और सीएच वेंकटचलम से वात्सल्य राय की बातचीत पर आधारित)
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