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शायरी से आवाज़ बुलंद करती कश्मीरी औरतें
- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
'हमारे ख़्वाब अजब कहकशां बनाते हैं, ज़मीन को तारों भरा आसमां बनाते हैं.
मैं भूल जाती हूं उनकी कहानियां कितनी, ज़रा सी बात को वो दास्तां बनाते हैं.'
ये अशआर हैं कश्मीर की शायरा रुख़्साना ज़बीन के.
भारत प्रशासित कश्मीर की रुख़साना बीते 40 सालों से शायरी कर रही हैं.
60 साल की रुख़साना की तरह ही निगहत साहिबा, महमीत सईद और परवीन, भारत प्रशासित कश्मीर की वो औरतें हैं जो शेरो-शायरी और गायकी के ज़रिए कामयाबी की नई दास्तान लिख रही हैं.
कश्मीर पिछले कई बरसों से हिंसा का शिकार रहा है. रुख़साना, निगहत या फिर परवीन आज़ाद, इन सभी औरतों की अहमियत इसलिए बढ़ जाती है कि इन्होंने इस दौरान भी अपनी आवाज़ को दबने नहीं दिया.
रुख़साना कहती हैं, "जब शुरू में मैं रेडियो स्टेशन शेर पढ़ने जाती थी तो मुझे झूठ बोलना पड़ता था कि मैं रेडियो नहीं गई थी बल्कि रेडियो वाले यूनिवर्सिटी में रिकॉर्डिंग करने आए थे. अब सोच में तब्दीली तो आ रही है लेकिन सुस्त रफ़्तार से."
कश्मीर में बरसों से जारी हिंसा का उनकी शायरी पर क्या असर हुआ?
इस सवाल का जवाब देते हुए वो कहती हैं, "फ़न और फ़नकार पर हालात का असर तो पड़ता ही है. चाहे वो किसी कश्मीरी माँ का दर्द हो जिसका बेटा खो गया है या चाहे उन आधी बेवाओं की बात हो जिनके पतियों के बारे में कुछ पता ही नहीं कि वे कहां हैं, ज़िंदा हैं भी या नहीं? वह दर्द भी शेरों में आ ही जाता है."
मसलन वो लिखती हैं, "भरम है सदियों का, पल भर में टूटने वाला, ये बात वक़्त के सब हुकमरां समझते हैं."
कुलगाम की रहने वाली 28 साल की निगहत साहिबा कश्मीर की उभरती हुई शायरा हैं.
निगहत बताती हैं, "दरअसल हमारे समाज की सोच ये है कि महिलाएं वह सब कुछ नहीं कर सकती हैं जो मर्द कर सकते हैं. जब मैंने शेर कहना शुरु किया था तो घर में भी शाबाशी नहीं मिली और जब बाहर लोग सुनते थे कि ये लड़की शायरी करती है तो वो भी सदमे में आ जाते थे."
लेकिन कश्मीर में सियासी हालात और शायरी पर उसके प्रभाव के बारे में निगहत की राय थोड़ी अलग है.
वो कहती हैं, "मैंने जानबूझकर इस बात की कोशिश नहीं कि मैं इस बारे में लिखूं क्योंकि हमारी सियासी समस्याएं वक़्ती होती हैं. शायरी में इन विषयों को जगह नहीं मिलनी चाहिए. हाँ अगर आपको कांटे चुभते हैं तो ज़ाहिर है दर्द होगा ही, आप महसूस भी करेंगे और फिर न चाहते हुए भी आपकी शायरी में वो चीज़ें आ ही जाएंगी."
शायरी के अलावा गायकी के क्षेत्र में भी कश्मीरी महिलाएं अपने फ़न का लोहा मनवा रही हैं. 35 साल की परवीन आज़ाद के कई एलबम आ चुके हैं. परवीन कहती हैं कि जब उन्होंने गाना शुरु किया था तो घर में सभी ने उनका विरोध किया, लेकिन उन्होंने किसी की भी परवाह किए बग़ैर अपना गाना जारी रखा.
वह कहती हैं, "मेरे अंदर गाने का जो जुनून था, वह कम नहीं हो पाया. मेरी जब शादी हो गई तो मेरे पति ने भी मुझे गाने से नहीं रोका." लेकिन परवीन को इस बात की शिकायत है कि जब कश्मीर में जब कोई महिला गायकी में आती हैं तो उसको लोग नीची नज़र से देखते हैं.
परवीन ने अनु मलिक और एआर रहमान के साथ भी कंसर्ट्स किए में भाग लिया है. श्रीनगर की रहने वाली 28 साल की महमीत सईद भी सुरों की साथी हैं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बताया, "मेरी माँ ने ही मुझे संगीत की दुनिया में क़दम रखने के लिए कहा था. हम गायकी के ज़रिए कश्मीरी साहित्य को विदेशों में रहने वाले कश्मीरियों तक पहुंचाते हैं."
हालांकि रुख़साना जैसे फ़नकारों को अफ़सोस है कि अगर कश्मीर में हालात नहीं सुधरे तो महिला फ़नकारों पर इसका बुरा असर पड़ेगा. हालांकि कैफ़ी आज़मी के उन लफ्ज़ों को याद करते हुए रुख़साना कहती हैं कि उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी है.
'क़दर अब तक तेरी तारीख़ ने जानी ही नहीं, तुझ में शोले भी हैं बस अश्क़-फ़शानी ही नहीं.
तू हक़ीक़त भी है, दिलचस्प कहानी ही नहीं, तेरी हस्ती भी है एक चीज़, जवानी ही नहीं.'
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