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'एटीएम है नहीं और पेटीएम हम जानते नहीं'
- Author, माज़िद जहांगीर
- पदनाम, कश्मीर से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
कंपा देने वाली ठंड और हल्की धूप के बीच मैं ज़िला बडगाम के लोनउरा गांव पहुँचा, जिसे हाल ही में भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर का पहला 'कैशलेस' गांव क़रार दिया गया है. लोनउरा श्रीनगर से क़रीब 35 किलोमीटर दूर है.
मेन रोड से एक टूटे-फूटे रास्ते पर मौजूद लोनउरा में कोई गहमागहमी नहीं थी.
मुझे 45 साल के ग़ुलाम मोहमद डार परचून की दुकान पर मिले. बातचीत में मैंने जब उनसे पूछा कि आपके गांव को कैशलेस का दर्ज मिला है, तो वह हंसने लगे. फिर कहा, "हमारे यहाँ तो एटीएम ही नहीं है. पेटीएम हम जानते नहीं कि वह क्या होता है. हम बहुत ग़रीब लोग हैं. बैंक नहीं है, बिजली दो-तीन घंटे के लिए ही आती है."
हालांकि ग़ुलाम मोहम्मद ने कुछ दिन पहले ही पेटीएम चलाने की ट्रेनिंग ली है. वह बताते हैं, "कुछ लोग आए थे जिन्होंने कहा कि पेटीएम का बटन दबाओ और फ़ोटो पर क्लिक करो. बस इतना ही हुआ. मुझे मोबाइल चलाना नहीं आता है."
15 दिसंबर 2016 को बडगाम की सरकारी वेबसाइट पर "लोनउरा गांव को पहला 'कैशलेस' गांव घोषित करने की ख़बर दी गई. इसमें यह भी कहा गया है कि गांव के 13 व्यापारियों को ईपीएस (इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट सिस्टम) के तहत लाया गया, जबकि 150 परिवारों को ईपीएस की ट्रेनिंग दी गई है."
1000 के क़रीब आबादी वाले इस गांव की कुल पढ़ी-लिखी आबादी 10 से 15 फ़ीसदी है. गांव में कुल सात दुकानें हैं. किसी दुकान पर स्वाइप मशीन नहीं. 50 फ़ीसद माल ग़्राहक उधार लेते हैं. डिजिटल खरीदारी यहाँ के लोगों को पता नहीं.
गांव के ज़्यादातर लोगों का काम मज़दूरी, खेतीबाड़ी या कालीन बनाने से चलता है. चंद लोग ही सरकारी नौकर हैं, जो गांव में नहीं रहते.
गांव के पूर्व सरपंच ग़ुलाम हसन कहते हैं कि कुछ दिन पहले यहाँ कई लोगों को जमा किया गया था. वह बताते हैं, "जो आए थे वो तो टीवी वाले थे. मैं भी वहां गया था. यहाँ कोई सहूलियत नहीं है. उन्होंने शायद इसीलिए इस गांव को चुना. उन्हें लगा होगा कि उनके बाद फिर यहाँ कोई नहीं पहुँचेगा."
ग़ुलाम हसन कहते हैं कि क्रेडिट कार्ड तो दूर की बात, यहाँ तो एटीएम चलाना नहीं आता. लोनउरा गांव से क़रीब पांच किलोमीटर दूर बैंक और एटीएम है. गांव में एक मिडिल स्कूल और एक प्राइमरी हेल्थ सेंटर है.
हैंडीक्राफ़्ट का काम करने वाली गांव की 23 वर्षीया अनीस आफ़रीन का कहना था वह तो आज सुन रही हैं कि पेटीएम जैसी कोई चीज़ है. उन्होंने बताया, "जो लोग यहाँ आए, उन्होंने कहा कि आप छह-छह लड़कियां लाइन में रहो तो आप को अपने काम के लिए लोन मिलेगा."
गांव में इंटरनेट तो है पर बेहद सुस्त रफ़्तार. गांव के एक छात्र तजमुल कहते हैं कि उन्हें इंटरनेट चलाने के लिए दूसरे गांव जाना पड़ता है. 55 साल के ग़ुलाम क़ादिर बट मज़दूर हैं और पढ़े-लिखे नहीं हैं. वह कहते हैं कि उन्हें पेटीएम हरगिज़ नहीं चाहिए.
इन्फ़ॉर्मेशन और इलेक्ट्रॉनिक्स टेक्नॉलॉजी मंत्रालय के कॉमन सर्विस सेंटर ने इसी साल ट्रेनिंग का प्रोजेक्ट शुरू किया है. इसके अधिकारी मोहसिन आज़म के मुताबिक़ उन्होंने हर घर के एक व्यक्ति को पेटीएम की ट्रेनिंग दी है. हालांकि उन्होंने बताया कि वे ज़्यादातर पेटीएम चलाने की ट्रेनिंग देते हैं.
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