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बस्तर- 'छत्तीसगढ़ मेरी मातृभूमि है, कहते हैं इन्हें भगाओ'
- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, बस्तर से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
पखांजूर के खगेंद्रनाथ मंडल इन दिनों उदास हैं. उनकी उदासी का कारण उनके क़स्बे में लगे वो पोस्टर हैं, जिनमें बस्तर को 'बंगालीमुक्त' करने की बात कही गई है.
59 साल के मंडल 1970 में सातवीं में पढ़ते थे जब वह अपने भाई-भाभी के साथ बांग्लादेश से छत्तीसगढ़ के कांकेर आए थे. सरकार ने उन्हें परलकोट विलेज 122 में बसाया था.
मंडल कहते हैं, "बांग्लादेश मेरी जन्मभूमि थी पर अब मेरी मातृभूमि तो यही बस्तर है. अब हमें कहा जा रहा है कि 'बंगालियों' को यहां से भगाओ. तीन पीढ़ी बाद हमारे सामने सवाल खड़ा हो गया है कि आख़िर हमारी धरती है कहां?"
असल में, बस्तर के मूल निवासी और 46 साल पहले बांग्लादेश बनने के बाद छत्तीसगढ़ आए 'बंगाली समाज' के लोग आरक्षण के मुद्दे पर आमने-सामने हैं.
कई साल के आंदोलन के बाद बंगाली समाज की छह जातियों को पिछले महीने ही छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछड़ा वर्ग में शामिल करने का आदेश दिया है. मगर बस्तर के अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग के लोग इसके ख़िलाफ़ हैं.
कांकेर में सर्वआदिवासी समाज के नेता चंद्रकांत धुर्वा कहते हैं, "शरणार्थी के नाम पर इन्हें बस्तर में बसाया गया और आज इन्हें हमारे आरक्षण में भागीदार बनाकर हमारा हक़ छीना जा रहा है."
बांग्लादेश से आए लोगों को 46 साल पहले आदिवासी बहुल बस्तर में बसाया गया था. आज इनकी आबादी क़रीब तीन लाख है और वो बस्तर के क़रीब 150 गांवों में फैले हैं.
युवा आदिवासी नेता संतोष नाग का दावा है कि बस्तर में आदिवासी अल्पसंख्यक हो गए हैं. परलकोट में ही बंग शरणार्थियों के क़रीब 135 गांव हैं और आदिवासियों के 132.
हालांकि बस्तर में पिछले कुछ साल में आदिवासियों की जनसंख्या वृद्धि दर गिरी है. 2001 से 2011 के बीच राज्य की जनसंख्या वृद्धि दर जहां 22.59 फ़ीसदी थी, तो बस्तर के कई ज़िलों में यह इससे नीचे थी.
मसलन, बीजापुर में 2001 में आदिवासी जनसंख्या वृद्धि दर 19.3 प्रतिशत से गिरकर 2011 में 8.76 रह गई.
बस्तर के आदिवासी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम भी मानते हैं, "बेहद पिछड़े आदिवासी समाज की तुलना में पढ़े-लिखे बंगभाषियों ने पिछले चार दशकों में सरकार की तमाम योजनाओं का ख़ूब लाभ उठाया है. समाज की दूसरी जातियां भी इससे प्रभावित हुई हैं. सरकार के ताज़ा आरक्षण के फ़ैसले ने एक बार फिर यहां के मूल निवासियों में असुरक्षा की भावना भर दी है."
मगर 'बंगाली समाज' के नेता असीम राय मानते हैं कि उन्हें आरक्षण का लाभ देने से आदिवासियों को कोई नुक़सान नहीं होगा. उनका कहना है कि दूसरे कई राज्यों में बांग्लादेश से आई कुछ खास जातियों को आरक्षण मिला है और छत्तीसगढ़ सरकार ने भी वही किया है.
राय कहते हैं, "बस्तर के आदिवासियों और दूसरी जातियों के साथ हमारी दो पीढ़ियां शांति से रहती आई हैं. मगर कुछ नेता अपना अस्तित्व बचाने के लिए बस्तर के लोगों को भड़का रहे हैं."
इस बीच सरकार अपने फ़ैसले के साथ खड़ी है. आदिवासी नेता और राज्य के गृहमंत्री रामसेवक पैंकरा कहते हैं, "बंग समाज के लोगों की बात भी हमने सुनी और आदिवासियों की मांग भी अपनी जगह जायज़ है. जो भी क़ानूनी तौर पर सही होगा, सरकार वही निर्णय लेगी."
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