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शिवाजी स्मारक का भूमि पूजन और मराठा राजनीति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुंबई में छत्रपति शिवाजी महाराज स्मारक का भूमि पूजन करेंगे. ये स्मारक अरब सागर में शिला पर बनाया जा रहा है. महाराष्ट्र सरकार की इस योजना पर 3600 करोड़ रुपये की लागत आने की बात कही जा रही है.
भूमि पूजन समारोह में शिवाजी के वंशजों को भी बुलाया गया है. समारोह को मराठा समुदाय को लुभाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है. हाल में मराठा समुदाय ने आरक्षण की मांग को लेकर महाराष्ट्र में मूक मोर्चे निकाले थे.
पढ़िए, इससे जुड़ी मराठा राजनीति पर वरिष्ठ पत्रकार समर खड़स का विश्लेषण:
महाराष्ट्र का पूरा बहुजन समाज शिवाजी को एक आइकॉन के रूप में देखता है. मुझे नहीं लगता कि सरकार सिर्फ़ मराठा समुदाय के लिए शिवाजी का स्मारक बना रही होगी.
इस स्मारक की चर्चा कई सालों से हो रही है. इसकी कल्पना सबसे पहले राष्ट्रवादी कांग्रेस के दौर में कई गई.
सरकार सही मायने में ये बनाना चाहती है ये केवल उसका उद्घाटन कर छोड़ देना चाहती है?
ये सही मायने में सवाल है क्योंकि ऐसे कई प्रोजेक्ट हैं जिसका इस सरकार ने उद्घाटन किया लेकिन बाद में उसमें कुछ नहीं हुआ है.
बीच समंदर में जहां ये स्मारक बनना है वहां एक बड़ा सा पत्थर है. प्रधानमंत्री यहां आएंगे और उस पत्थर पर भूमि पूजन करेंगे.
साल 2019 तक यहां कोई स्मारक बन जाएगा या उसका काम शुरू होगा ये मानने की कोई वजह नहीं है, क्योंकि सरकार की आर्थिक स्थिति बड़ी नाज़ुक है.
राज्य के विकास के लिए जो बड़ी महत्वपूर्ण परियोजनाएं आने वाली हैं उसके लिए सरकार की तिजोरी में पैसे नहीं हैं.
ऐसे वक़्त में सरकार इस स्मारक के लिए कितना पैसा देगी ये बड़ा कठिन सवाल लगता है.
जहां तक ये सवाल है कि सरकार इस कार्यक्रम के लिए भीड़ जुटा रही है तो उसका मक़सद सीधा है कि आनेवाले समय में महाराष्ट्र में ज़िला परिषद और महापालिका चुनाव होने हैं.
इसके नतीजे 2019 में होनेवाले विधानसभा चुनाव की प्रारंभिक परीक्षा होंगे.
नोटबंदी के बाद अभी जो स्थिति है उसमें बीजेपी का जनाधार घटता हुआ दिखाई दे रहा है. हालिया नगर पंचायत के चुनावों में बीजेपी नंबर वन रही.
लेकिन 2014 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव नतीजों में जहां बीजेपी को महाराष्ट्र में 41.8 फ़ीसदी वोट मिले थे, वो आंकड़ा इस चुनाव में घट गया है.
मुंबई महापालिका के चुनाव होने हैं उसमें मुंबई में रहनेवाले 30 फ़ीसदी मराठी वोटर के लिए शिवाजी की मूर्ति एक बहुत बड़ा आइकॉन है.
इस कार्यक्रम में मराठा आंदोलन की भूमिका नहीं है ऐसा मैं नहीं मानता. लेकिन मेरा ऐसा मानना है कि जब मराठा इकट्ठा होता है तो इसका असर दूसरे समाज पर भी पड़ता है और वो भी इकट्ठा होता है.
मराठा आंदोलन के कारण जिस तरह से ओबीसी और दलितों के मोर्चे निकले हैं उससे भाजपा को कोई बहुत बड़ा फायदा नहीं हुआ है.
लेकिन ये बात सही है कि इस स्मारक के कारण पूरे मराठा नहीं तो कम से कम एक वर्ग बीजेपी के प्रति नरम हो भी सकता है.
शिवसेना और भाजपा दोनों पार्टियों के बीच दोस्ती भी है और वे बार बार एक दूसरे को चुनौती देने की कोशिश भी करती हैं. दोनों के संबंध और इस कार्यक्रम को किस तरह से देखा जाना चाहिए?
इस सवाल का जवाब ये है कि 1987 में पहली बार शिवसेना और बीजेपी का गठबंधन हुआ और ये कई सालों तक चला. महाराष्ट्र में उस समय बीजेपी का कोई जनाधार नहीं था. शिवसेना के पास जनाधार था क्योंकि उसके पास बाला साहब ठाकरे जैसे लीडर थे.
लेकिन बीजेपी हमेशा से राजनीति की शातिर खिलाड़ी रही है. जैसे ही मोदी जैसा सिक्का बीजेपी को मिला और उसका वोट प्रतिशत बढ़ा उसने उसी दिन से शिवसेना को सबक सिखाने की ठान ली.
मुंबई महानगर पालिका में शिवसेना का अधिकार और सत्ता शिवसेना की जान है. बीजेपी के बड़े नेता कहते हैं कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह चाहते हैं कि मुंबई महानगर पालिका पर भाजपा का झंडा लहराये. ऐसे वक़्त में आनेवाले फरवरी या मार्च में ये दोनों पार्टियां आपस में भिड़नेवाली हैं.
शिवसेना का सबसे बड़ा आइकॉन जो यहां के मराठी मानुष में बहुत महत्वपूर्ण है वो हैं शिवाजी महाराज. उस आइकॉन को उड़ा ले जाने की कोशिश है ये पूरी कवायद ऐसा मानने की अभी पूरी गुंजाइश है.
(बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय की मुंबई में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार समर खड़स से बातचीत पर आधारित.)
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