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'उर्दू में बिहार सरकार जवाब ही नहीं देती'
- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदीडॉटकॉम के लिए
उर्दू बिहार की दूसरी सरकारी जबान है. लेकिन सरकारी जबान में लिखे खतों का जवाब सरकार ही नहीं दे पा रही है.
विधायक शकील अहमद खां के बीते करीब एक साल के तर्जुबे से कुछ ऐसे ही हालात सामने आए हैं.
दरअसल उर्दू की कानूनी हैसियत के मुताबिक थानों से लेकर सचिवालय तक अगर कोई इस जबान में सरकारी काम-काज करना चाहे, स्कूलों से लेकर यूनिवर्सिटी तक पढ़ाई करना चाहे तो उसे कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए.
लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा. विधायक शकील बताते हैं, ''मैंने डीएम से लेकर सीएम तक को करीब दो सौ चिट्ठियां उर्दू में लिखीं. इनमें से केवल उर्दू निदेशालय से एक खत का उर्दू में जवाब आया है.''
शकील साफ़ करते हैं कि उर्दू सरकारी जबान है तो उर्दू में लिखे खतों का सरकारी जवाब भी उर्दू स्क्रिप्ट में ही आना चाहिए.
उर्दू में खतो-किताबत की अपनी इस मुहिम के जरिए शकील दरअसल उर्दू की बदहाली को सामने लाते हुए इसे सुधारने की सूरत निकालना चाहते हैं.
बिहार में जहां एक ओर स्कूल-कॉलेजों में उर्दू टीचर्स की भारी कमी है तो दूसरी ओर सरकारी महकमों में इसके लिए जरुरी तर्जुमानिगारों यानी अनुवादकों और दूसरे मुलाजिमों की.
सूबे में उर्दू के मौजूदा हाल से इस जबान के जरिए रोजगार की तलाश करने वाले नौजवानों में भी नाउम्मीदी घर कर रही है.
पटना यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रही अफ्शां बानो के मुताबिक इस कारण उर्दू से लोगों का नाता भी टूट रहा है.
वे कहती हैं, ''पोस्ट्स हैं लेकिन वेकेंसीज नहीं आ रही हैं. ऐसे में उर्दू के ज़रिए रोज़गार की तलाश में लगे लोगों के सामने बिजनेस या कोई दूसरा पेशा अख़्तियार करने का दबाव बढ़ता जा रहा है. उर्दू से उनका नाता-रिश्ता टूट रहा है.''
उर्दू को 1981 में दूसरी सरकारी जबान का दर्जा मिला था. जानकारों का कहना है कि सरकार की मदद से जबान की तरक्की के लिए जो काम होना चाहिए था, वो अब तक लगभग नहीं हुआ है.
मगध यूनिवर्सिटी में उर्दू के प्रोफेसर सफदर इमाम क़ादरी कहते हैं, ''उर्दू को दूसरी सरकारी जबान का दर्जा देना राजनीतिक तौर पर एक महत्त्वपूर्ण फ़ैसला था लेकिन प्रशासनिक स्तर पर इसे जमीन पर उतारने के लिए सरकार ने कभी ठीक से ध्यान नहीं दिया.''
सफदर के मुताबिक उर्दू की तरक्की के लिए जो इंस्टीट्यूशंस बनाए गए थे उनका कभी सही से इस्तेमाल नहीं हुआ.
वे बताते हैं कि एक दौर ऐसा था जब उर्दू एडवायजरी कमिटी में आठ गैर उर्दू भाषी लोग शामिल कर लिए गए थे.
हालांकि हालात धीरे-धीरे थोड़े सुधर रहे हैं. 28 नवंबर को असेंबली में उर्दू में सरकारी काम करने पर पूछे गए सवाल के जवाब में बिहार सरकार ने यकीन दिलाया कि ऐसा करने की पूरी कोशिश की जा रही है.
लंबी खींच-तान के बाद एजुकेशन डिपार्टमेंट ने नवंबर के महीने में सरकारी स्कूलों में करीब और चार हज़ार उर्दू टीचर्स को तैनात किया है. लेकिन इसके बावजूद अभी सरकारी स्कूलों में करीब दस हज़ार उर्दू टीचर्स की जरुरत है.
यूनिवर्सिटियों में सौ के करीब उर्दू लेक्चरर्स की बहाली की तैयारी भी चल रही है. वहीं उर्दू निदेशालय के डायरेक्टर इम्तियाज़ अहमद करीमी के मुताबिक सरकारी डिपार्टमेंट्स में भी खाली पड़े ओहदों पर बहाली का बात आगे बढ़ी है.
उन्होंने बताया, ''हमारे द्वारा दिए गए 365 वेकेंसी पर बहाली के लिए बिहार राज्य कर्मचारी चयन आयोग ने आवेदन मंगाए हैं. इस संबंध में अभी प्रतियोगिता परीक्षा होना बाकी है.''
वहीं एक अनुमान के मुताबिक इन बहालियों के बाद भी सरकारी महकमों में ऐसे करीब और सत्रह सौ मुलाजिमों की ज़रुरत पड़ेगी.
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