'नोटबंदी का राजनीतिक असर नसबंदी जैसा होगा'

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    • Author, नितिन श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

आर्थिक विश्लेषक परंजॉय गुहा ठाकुरता का मानना है कि केंद्र सरकार की नोटबंदी मुहिम आम लोगों को तकलीफ़ ही पहुंचा रही है जबकि काले धन पर ज़्यादा असर नहीं पड़ा.

बीबीसी से हुई बातचीत में उन्होंने कहा, "इस क़दम का राजनीतिक असर पड़ेगा जैसा इंदिरा और संजय गाँधी के दौर में नसबंदी के बाद हुआ था. मैं समझता हूँ नसबंदी की जगह आज नोटबंदी ने ले ली है, जिसका असर आगे दिखेगा."

आठ नवंबर को भारत में 500 और 1000 के नोटों पर पाबंदी लगाने की घोषणा के समय सत्ताधारी एनडीए सरकार का दावा था कि इसका उद्देश्य काले धन का ख़ात्मा और नक़ली नोटों का आतंकवादी गतिविधियों में इस्तेमाल को रोकना है.

हालांकि पिछले दिनों सरकार की तरफ़ से जैसे बयान आए हैं उनसे एक इंटरनेट पर आधारित कैशलेस अर्थव्यवस्था यानी क्रेडिट-डेबिट कार्ड या पेटीएम जैसे मानकों को बढ़ावा देने की बात ज़ाहिर हो रही है.

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कई जानकारों का मानना है कि सरकार ने इस बात पर पहले ही विचार कर रखा था कि आख़िरकार नोटबंदी के बाद एक कैशलेस अर्थव्यवस्था पर ही ज़ोर देना है.

वरिष्ठ आर्थक विश्लेषक गुरचरण दास के अनुसार, "कैशलेस अर्थव्यवस्था में कोई हर्ज नहीं है और सरकार की दूरगामी सोच भी हो सकती है. लेकिन बुनियादी सवाल ये है कि अभी देश इसके लिए तैयार कहा हैं."

परंजॉय गुहा ठाकुरता मानते हैं कि सरकार का कैशलेस अर्थव्यवस्था का उद्देश्य अच्छा हो सकता है, लेकिन कदम हड़बड़ाहट में ही लिया गया है.

उन्होंने कहा, "सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ भारत में 18 वर्ष से ज़्यादा की आयु के क़रीब 85 करोड़ लोग हैं. इनमें से 45% के पास बैंक खाता नहीं है. सरकार ने कैसे मान लिया कि ये कैशलेस इकॉनोमी में बदल जाएंगे या सब्ज़ी वाले, चाय-ठेले वाले, रिक्शे वाले और किसान प्लास्टिक मनी में रातोरात तब्दील हो सकेंगे. हरगिज़ नहीं".

ग़ौरतलब है कि जब से केंद्र सरकार ने नोटबंदी की घोषणा की है उसके बाद से बैंकों और एटीएमों के बाहर लंबी क़तारें देखने को मिलती रही हैं.

तमाम राजनीतिक दलों ने भी इस फ़ैसले के विरोध किया जबकि जबकि आम लोगों में राय बंटी नज़र आई है.

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नोटबंदी पर दायर हुई एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब माँगा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कार्यक्रम को लागू करने के चंद दिन बाद कहा था कि लोगों को जो शुरुआती दिक्कतें आ रहीं हैं उन्हें ठीक करने के लिए उन्हें 50 दिन का समय चाहिए.

सरकार ने नोटबंदी लागू करने के बाद से कई ऐसे फ़ैसले भी लिए है जिनसे आम लोगों की मुश्किलें थोड़ी कम हो सकें.

लेकिन परंजॉय गुहा ठाकुरता को लगता है कि ये क़दम, "भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक धक्का है, जीडीपी पर विपरीत असर पड़ेगा और ये संकट जल्द ख़त्म होने वाला नहीं है."