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समलैंगिकों की परेड में दिल्ली हुई सतरंगी
रविवार को दिल्ली में आयोजित नौंवी दिल्ली क्वीर प्राइड में कई रंग देखने को मिले. परेड में भारत में इस समुदाय के सामने खड़ी दिक्कतों की ओर ध्यान दिलाया गया.
सालाना परेड में हिस्सा लेने वाले कुछ लोगों ने बताया कि हालिया साल में काफ़ी-कुछ बदला है. लोग उन्हें स्वीकार करने लगे हैं. लेकिन दूसरों ने कहा कि भारत की सरकार समलैंगिकों को अधिकार देने के ख़िलाफ़ है.
साल 2009 में जब दिल्ली हाई कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता के सेक्शन 377 को असंवैधानिक क़रार दिया था, तो गे समुदाय की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. लेकिन चार साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने ये फ़ैसला बदल दिया.
इस क़ानून के तहत गे संबंध बनाने पर 10 साल क़ैद की सज़ा हो सकती है. ज़ाहिर है, हर साल इस परेड में इस क़ानून को निरस्त करने की मांग उठती है.
इस परेड में लेस्बियन, गे, बाईसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर (एलजीबीटी) समुदाय के सदस्यों और समर्थकों ने शिरकत की. परेड में सैकड़ों गे राइट्स कार्यकर्ताओं ने उनके साथ होने वाले भेदभाव के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई.
दुनिया के कई हिस्सों में समलैंगिकों को लेकर अब समाज के रुख़ में बदलाव आ रहा है. लेकिन कई देश ऐसे हैं, जहां इसकी क़ानूनी इजाज़त नहीं है और ना ही समाज इसे स्वीकारता है.
परेड में हिस्सा लेने वाले 33 साल के सौरव जैन ने कहा, ''काफ़ी बदलाव आया है, लेकिन हम पीछे की तरफ़ भी गए हैं.''
भारत में गे होने को अब भी शर्म की नज़र से देखा जाता है और ज़्यादातर होमोसेक्सुअल इसे छिपाए रखना पसंद करते हैं.