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राष्ट्रपति भवन का शाही ज़ायका और कूटनीति की बातें
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जब सन 2000 में बिल क्लिंटन भारत आए तो अटल बिहारी वाजपेई से उनकी बातचीत से ज़्यादा चर्चा इस बात पर थी कि उन्होंने मौर्य शैर्टन होटल के बुख़ारा रेस्तरां में खाया क्या?
रेस्तरां के मैनेजर ने उन्हें पहले ही चेता दिया, "यहाँ मेहमान कांटे छुरी से नहीं बल्कि हाथ से खाना खाते हैं." क्लिंटन को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ा. उन्होंने हाथ से ही खाना खाया और अपनी मेज़ पर परोसे हर व्यंजन का दो बार लुत्फ़ उठाया.
मीठे में उनको कुल्फ़ी और फ़ीरनी दी गई. आख़िर में उनसे मैनेजर ने औपचारिकता वश पूछा, "हुज़ूर कुछ और खाना चाहेंगें?" क्लिंटन का जवाब था, "अगर मैं एक और लुक्मा अपने मुंह में रखता हूँ, तो मुझे यहाँ से स्ट्रेचर पर ले जाना पड़ेगा."
यहाँ तो क्लिंटन की आवभगत एक निजी रेस्तराँ में हो रही थी लेकिन राजकीय भोजों में भोज कूटनीति के ज़रिए कई राष्ट्रीय हितों को साधने की कोशिश की जाती है.
एक मशहूर अंग्रेज़ राजनयिक अर्नेस्ट साटो का मानना था कि राजकीय भोज एक लक्ष्य के माध्यम होते हैं न कि स्वयं एक लक्ष्य. हिलेरी क्लिंटन कहती है कि भोजन सबसे पुराना कूटनीतिक हथियार है जबकि फ़्रेंच राष्ट्रपति फ़्रांसुआ ओलाँद का मानना है कि अगर ख़राब खाना परोसा जाए, तो कूटनीति कहीं अधिक मुश्किल हो जाती है.
कहा जाता है कि उन्होंने एलीसी पैलेस में पनीर परोसे जाने का चलन फिर से शुरू किया जिसे पूर्व राष्ट्पति सार्कोज़ी ने बंद करा दिया था. इसके बाद जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल और ओलाँ ने साथ मिल कर न सिर्फ़ पनीर का आनंद उठाया बल्कि अपने बहुत सारे मतभेद भी दूर किए.
हाल ही में सलमा हुसैन और एलिज़ाबेथ कलिंघम की एक किताब आई है, 'अराउंड इंडियाज़ फ़र्स्ट टेबिल : डाइनिंग एंड इंटरटेनमेंट इन राष्ट्रपति भवन' जिसमें उन्होंने इस बात की दिलचस्प जानकारी दी है कि किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष के सम्मान में दिए जाने वाले राजकीय भोज की तैयारी किस तरह की जाती है.
राष्ट्पति भवन में मुख्य शेफ़ रह चुके और इस समय भारतीय पर्यटन विकास निगम में एक्ज़क्यूटिव शेफ़ के पद पर काम कर रहे मचींद्र कस्तूरे बताते हैं, "विदेश मंत्रालय आने वाले मेहमान के बारे में राष्ट्पति भवन सचिवालय को सूचित करता है. उसकी पसंद और नापसंद और खाद्य एलर्जी के बारे में विस्तृत नोट आता है जिसे मुख्य शेफ़ तक पहुंचा दिया जाता है."
कस्तूरे के मुताबिक, "विदेश मंत्रालय की तरफ़ से बुलाए जाने वाले मेहमानों के बारे में भी सलाह दी जाती है. इसके बाद मुख्य शेफ़ और कंट्रोलर मिल कर राजकीय भोज का मेन्यू बनाते हैं जिसमें राष्ट्रपति भी अपनी सलाह देते हैं. पिछले साल जब क़तर के अमीर के सम्मान में जो भोज दिया गया था, उसमें मांस के व्यंजन अधिक परोसे गए थे, क्योंकि अमीर को माँस बहुत अधिक पसंद था. इससे पहले श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना को दिए गए भोज में शाकाहारी व्यंजनों की भरमार थी क्योंकि वो शाकाहारी थे."
सलमा हुसैन बताती हैं, "ठीक आठ बजे मेहमान बैंक्वेट हॉल में जमा होने शुरू हो जाते हैं. जैसे ही राष्ट्रपति और विदेशी राष्ट्राध्यक्ष का भाषण समाप्त होता है बटलर सूप परोसना शुरू कर देते हैं. इनको इस बात के लिए प्रशिक्षित किया जाता है कि वो बिना ज़्यादा हस्तक्षेप किए हुए मेहमानों की हर ज़रूरत का ख़्याल रखें."
हुसैन आगे बताती हैं, "बैंक्वेट हाल में लगे हर तैल चित्र के ऊपर तीन लाइट्स होती हैं. नीली लाइट जलने का मतलब है सारे बटलर सर्विस करने के लिए तैयार हो जाएं. हरी लाइट जलते ही खाना परोसना शुरू हो जाता है. हर बटलर को छह मेहमानों को भोजन खिलाने की ज़िम्मेदारी दी जाती है जबकि राष्ट्रपति और मुख्य अतिथि के लिए अलग से एक बटलर होता है. जैसे ही हेड बटलर लाल बत्ती जलाता है. इसका मतलब होता है कि सभी बटलर आगे बढ़ें और मेज़ों से प्लेट उठाना शुरू कर दें."
15 फ़रवरी, 1931 को जब राष्ट्रपति भवन का उद्घाटन हुआ तो उसके दो दिनों बाद ही वहां महात्मा गांधी, लार्ड इरविन के पहले सरकारी मेहमान के तौर पर वहाँ पधारे. नमक सत्याग्रह के बाद जेल की अवधि काट कर पहुंचे महात्मा गाँधी को जब वायसराय ने चाय पिलानी चाही, तो महात्मा गांधी ने बहुत शरारतपूर्ण अंदाज़ में कहा कि वो नींबू पानी पीना पसंद करेंगे, वो भी एक चुटकी 'नमक' के साथ.
वायसराय हाउज़ की भोज परंपरा का एक और ज़िक्र मार्च 1947 में मिलता है जब लार्ड माउंटबेटन वहाँ आखिरी वायसराय के रूप में पधारे थे.
उनकी बेटी पामेला माउंटबेटन अपनी किताब 'इंडिया रिमेंबर्ड' में लिखती हैं, "जब एडविना माउंटबेटन मार्च 1947 में राष्ट्पति भवन पहुंचीं तो उन्होंने इच्छा प्रकट की कि उनके कुत्ते को कुछ खाना दिया जाए. तुरंत चाँदी की प्लेट में पका हुआ मुर्ग पेश किया गया. दूसरे विश्व युद्ध में खाने के सामान की किल्लत की आदी हो चुकी एडवीना ने वो मुर्ग अपने कुत्ते को नहीं दिया. उन्होंने अपने आप को बाथरूम में बंद किया और उसे खुद खा गईं."
आज़ादी के बाद भारत के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद को राजकीय भोज को समय मेहमान राष्ट्राध्यक्ष की सलामती का जाम पिए जाने की प्रथा पर घोर आपत्ति थी, ख़ासतौर से उस समय जबकि राष्ट्पति के किसी भोज में शराब नहीं परोसी जाती.
सलमा हुसैन बताती हैं, "एक शाम आकाशवाणी पर समाचार सुनते हुए राजेंद्र प्रसाद को पता चला कि सऊदी बादशाह के भोज में अमरीकी राष्ट्रपति आइज़नहावर ने उनकी सेहत की सलामती का जाम नहीं पिया. उन्होंने कहा कि राष्ट्पति भवन को भी आइज़नहावर का अनुसरण करना चाहिए लेकिन विदेश मंत्रालय ने उनके इस सुझाव को ये कहते हुए नहीं माना कि पूरी दुनिया में ये एक सर्वमान्य प्रोटोकॉल है."
सलमा के मुताबिक, "डाक्टर राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रपति भवन के भोज में थाली में भोजन परोसने की परंपरा भी शुरू की लेकिन थोड़े दिनों बाद इसे इसलिए बंद कर देना पड़ा कि उसमें खाने की बहुत बरबादी हो रही थी. कहा जाता है कि उस ज़माने में बचे हुए खाने को गोल मार्केट के एक ढाबे में भेजा जाता था जिसके मेन्यू में लिखा रहता था - राष्ट्रपति भवन का खाना."
1988 में जब चीन के प्रधानमंत्री ली फंग भारत आए तो उन्हें राष्ट्पति भवन में ठहराया गया. उनके सम्मान में राष्ट्पति वैंकटरमन ने मुग़ल गार्डेन में शामियाने के नीचे दोपहर के भोज का आयोजन किया.
आर. वैंकटरमन अपनी आत्मकथा, 'माई प्रेसिडेंशियल इयर्स' में लिखते हैं, "अपने मेहमानों को खुश करने के लिए राष्ट्पति भवन के रसोइयों ने भारतीय व्यंजनों के साथ साथ कुछ चीनी व्यंजन भी बनाए थे. ली फ़ंग को वो इतने अच्छे लगे कि उन्होंने उन्हें दूसरी बार मांग कर खाया. और फिर वो बोले- इतना स्वादिष्ट चीनी खाना मैंने चीन के बाहर पहली बार खाया है."
"भोजन के दौरान भारतीय और चीनी नेताओं के बीच की करीबी देख कर ये बिल्कुल भास नहीं मिलता था कि इनके बीच सालों से गहरे मतभेद रहे हैं. ये फ़ूड डिप्लोमेसी का बेहतरीन उदाहरण था."
सलमा हुसैन बताती है कि जब राष्ट्रपति मंडेला 1990 में भारत आए तो उन्हें राजस्थानी सफ़ेद मांस और मशरूम झालफ़्रेज़ी परोसा गया. राष्ट्रपति वैंकटरमन के समय में पहली बार दक्षिण भारतीय इडली को राष्ट्रपति भवन के मैन्यू में स्थाई जगह दी गई, जबकि पहले औपचारिक मौकों पर इडली परोसने से परहेज़ किया जाता था.
1990 में जब यासेर अराफ़ात भारत आए तो उन्हें मुग़लई बिरयानी और मटर पनीर के साथ साथ इडली, वड़ा और साँभर भी परोसा गया. जब 2001 में परवेज़ मुशर्ऱफ़ भारत आए तो उन्हें नेपाल के चिकन डंपलिंग, अमृतसरी मछली और तमिलनाडु के चिकन चेट्टीनाड के साथ साथ डोसा भी परोसा गया जिसे उन्होंने बहुत पसंद किया.
मचींद्र कस्तूरे को अभी भी वो दिन याद है जब उन्होंने राष्ट्पति ओबामा के लिए खाना बनाया था. कस्तूरे कहते हैं, "मैंने उन्हें पानी जैसा सूप दिया ताकि उनका पेट जल्दी न भर जाए और वो ज़्यादा खाना खा सकें. आमतौर से राष्ट्रपति भवन के भोज में 90 से 100 लोगों को आमंत्रित किया जाता है लेकिन ओबामा के खाने में 140 लोगों को बुलाया गया."
कस्तूरे कहते हैं, ये भोज बैंक्वेट हॉल में आयोजित न कर मुग़ल गार्डेन में आयोजित किया गया. ज़िक्र करने लायक बात ये है कि एक दिन पहले राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के सामने इस भोज का पूरा ड्रेस रिहर्सल हुआ.
उन्होंने हमारा इम्तेहान लिया कि कहीं मुग़ल गार्डेन में खाना परोसते परोसते वो ठंडा तो नहीं हो जाएगा. ओबामा साहब को मैंने मेन कोर्स में राने आलीशान सर्व किया. इसमें बकरे की टांग को मैंने कई घंटों तक मेरीनेट करने के बाद, सजा कर लटकाई हुई दही के सॉस के साथ उनके सामने पेश किया.
इसके अलावा मैंने उनके लिए एक महाराष्ट्रियन व्यंजन पोरनपोली भी बनाया, जिसे भी उन्होंने बहुत पसंद किया. भोज के बाद उन्होंने हम सभी के साथ तस्वीर खिंचवाई.
राष्ट्रपति भवन में दिया जाने वाला हर भोज, विदेशी मेहमान के लिए भारतीय संस्कृति की खिड़की खोलता है...और इसको सफल बनाने में एक नहीं कई लोगों का हाथ होता है.... रसोइए, बेकर्स, हलवाई, बटलर...मेज़ और कमरों को साफ़ करने वाले लोग 'फ़ूड डिप्लोमेसी 'का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं.
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