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नोटबंदी: हालात सामान्य होने में चार महीने लगेंगे
- Author, अमरेश द्विवेदी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारतीय रिज़र्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक नोटबंदी के फैसले के बाद से अब तक 500 और 1000 के पुराने नोटों की शक्ल में बैंकों में कुल 5,44,571 करोड़ रुपए आए हैं.
इस आंकड़े के अनुसार 33,006 करोड़ रुपए बैंकों में बदले गए हैं जबकि 5,11,565 करोड़ रुपए जमा किए गए हैं.
रिज़र्व बैंक ने ये भी बताया है कि बैंकों के काउंटर या एटीएम से इस दौरान 1,03,316 करोड़ रुपए नक़द निकाले गए हैं.
एक अनुमान के मुताबिक भारतीय अर्थव्यवस्था में कुल क़रीब 14 लाख करोड़ पांच सौ और हज़ार के नोट हैं जिन्हें अवैध घोषित किया गया है और 10 नवंबर से अब तक हर दिन क़रीब साढ़े ग्यारह हज़ार करोड़ रुपए प्रतिदिन निकाले गए हैं.
ये तब है जब भारत के सभी बैंक दिन-रात पूरी क्षमता से लोगों को राहत देने में जुटे हैं.
अर्थशास्त्री धीरेंद्र कुमार के मुताबिक अगर यही रफ्तार रही तो कुल क़रीब साढ़े दस लाख करोड़ के पांच सौ और हज़ार के नोटों को बदलने में क़रीब 90 काम के दिन लग सकते हैं.
कहने का तात्पर्य ये कि अर्थव्यवस्था में पर्याप्त मात्रा में नकदी उपलब्ध होने में क़रीब चार महीने का वक्त लग सकता है.
धीरेंद्र कुमार बताते हैं कि नोटबंदी के फिलहाल कई नुकसान हो सकते हैं जो इस प्रकार हैं -
- कई लोग शहरों में काम करते हैं लेकिन उनके अकाउंट गांवों में हैं. उन्हें पैसे जमा करने के लिए अगर गांव जाने में दो-तीन हज़ार ख़र्च करने पड़ते हैं तो ये बड़ा नुकसान है.
- लोगों ने नकदी की कमी को देखते हुए खर्च करना बहुत कम कर दिया है. संभल-संभल कर खर्च कर रहे हैं जो कि अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी बात नहीं. लोगों की इस आदत को सामान्य होने में काफ़ी वक्त लग सकता है.
- नकदी के अचानक खत्म हो जाने से कई ऐसे लोग हैं जो बेरोज़गार हो गए हैं. ऐसे लोग अगर 10-15 दिन भी काम के बिना रहते हैं तो उनकी कमर टूट सकती है और असंगठित क्षेत्रों में काम करनेवाले ऐसे लोगों की संख्या लाखों में है.
- लोगों को अब ये समझ में आ गया है कि बैंक में खाता होना अब अनिवार्य है. साथ ही ये भी कि बैंक में रखा पैसा ब्याज कमाता है, अर्थव्यवस्था का हिस्सा होता है. लेकिन आपके घरों में जमा कर रखी गई नकदी कुछ कमा नहीं रही होती, बस रखी होती है.
- महिलाएं घर खर्च से काफी पैसे बचा कर घरों में जमा रखती हैं. संदूक में छिपा कर रखा ये पैसा लगातार कम हो रहा होता है. अकाउंट खुलने से और बैंकिंग सिस्टम से जुड़ने से इस पैसे पर कम से कम चार फ़ीसदी तो ब्याज मिलेगा. और फिर लोग अपने पैसे को बढ़ता देखने के प्रति जागरूक भी होंगे.
लंबे समय में असर -
- पिछले दो-तीन साल से रिएल एस्टेट में मंदी का रुख है जो कि अब और गहराएगा. सेकेंडरी मार्केट में मकानों की ख़रीद नकदी पर बहुत ज़्यादा निर्भर थी जो कि अब थम-सी जाएगी. इसका असर मकानों की कीमतों पर पड़ेगा. उसमें गिरावट आएगी. विमुद्रीकरण के बाद से मकानों की मांग लगभग थम-सी गई है क्योंकि लोगों के पास नक़द पैसे नहीं हैं. आनेवाले समय में भी इस मांग में तेज़ी आती नज़र नहीं आती.
- रिएल एस्टेट को निवेश का विकल्प मानने वालों के लिए निराशा की ख़बर है क्योंकि मकान ख़रीदना अब पैसे को तेज़ी से बड़ा बनाने का विकल्प नहीं रहेगा. लोगों को फिलहाल रिएल एस्टेट में निवेश करने से बचना चाहिए. बाज़ार थोड़ा स्थिर हो तभी निवेश के बारे में सोचना चाहिए.
- विमुद्रीकरण से लोगों का ईमानदारी में भरोसा बढ़ेगा. अभी तक कारोबार का एक बड़ा हिस्सा नकदी में होता था और कारोबारियों में इसे लेकर कोई अपराधबोध नहीं था. लेकिन लोग टैक्स देकर कारोबार करना पसंद करेंगे जो कि अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी बात होगी.
- अर्थव्यवस्था में निवेश को बढ़ावा मिलेगा. आज लोग अपने पैसे को बाज़ार में नहीं लगाते. शेयर बाज़ार में विदेशी संस्थागत निवेशकों की बड़ी भूमिका होती है. अब परिदृश्य बदलेगा और लोग बाज़ार में पैसे लगाएंगे जिसका फ़ायदा अर्थव्यवस्था को होगा.
- कंपनियों के मालिक पहले बेईमानी कर फ़ायदा कमाते थे. अब ईमानदारी से फ़ायदा कमाने की अर्थव्यवस्था का विकास होगा जो कि एक बहुत अच्छी ख़बर है.