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मोदी हों या केजरीवाल, बीबीसी का काम है पूछना सवाल
बीबीसी में रिपोर्टिंग के कुछ उसूलों पर ख़ासा ज़ोर दिया जाता है, उनमें से चार बातें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को नागवार गुज़रीं.
पहला-- जो मामला अदालत में है, उस पर जज से पहले फ़ैसला सुनाना या किसी और को ऐसा करने देना, बीबीसी की नीतियों के ख़िलाफ़ है.
दिल्ली के मुख्यमंत्री खुलेआम रिश्वतख़ोरी के आरोप लगा रहे थे जिसे सिर्फ़ अदालत में साबित किया जा सकता है, किसी फ़ेसबुक लाइव में नहीं. जब तक आरोप अदालत में सिद्ध नहीं होते, तक उन्हें 'आरोप' ही कहना होगा, जो बार-बार किया गया क्योंकि उन्होंने बार-बार आरोप लगाए. इस पर नाराज़ होकर उन्होंने बीबीसी की पत्रकारिता पर कई टिप्पणियाँ कीं. बीबीसी सिर्फ़ अपने पाठकों / श्रोताओं और दर्शकों के प्रति ज़िम्मेदार है.
( जब बीबीसी पर भड़के दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल- पूरी कहानी यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं)
दूसरा-- जिस किसी व्यक्ति पर आरोप लगाया जाता है, उसे सफ़ाई का मौक़ा दिए बिना कुछ भी प्रसारित-प्रकाशित करना बीबीसी की नीतियों के अनुरूप नहीं है.
ये एक इंटरव्यू था और फ़ेसबुक पर लाइव था इसलिए ये ज़रूरी था कि उन्हें ऐसे आरोप न लगाने दिए जाएँ जिनका जवाब देने के लिए दूसरा पक्ष मौजूद न हो. अगर हालात इसके ठीक उलट होते यानी केजरीवाल पर इस तरह के आरोप लगाए जा रहे होते, तो भी हम यही कहते कि ये आरोप हैं और अदालत में साबित नहीं हुए हैं. अगर ये पैनल डिस्कशन होता तो वो अलग स्थिति होती जब दूसरा पक्ष जवाब या सफ़ाई दे पाता.
तीसरा-- बिना वेरिफ़ाई किए हम कुछ भी प्रकाशित-प्रसारित नहीं करते. हम ये कहने में नहीं शर्माते कि बीबीसी को ये बात पता नहीं है.
नोटबंदी की वजह से देश भर में 55 जानें गई हैं, ये कहना सही नहीं है क्योंकि किसी ने इन सभी मौतों के कारणों और परस्थितियों की जाँच करके पुख्ता रिपोर्ट तैयार नहीं की है. ये तय कर पाना कठिन है कि कौन-सी मौत स्वाभाविक है और किसकी वजह नोटबंदी है. हमें कहना पड़ेगा कि ये अरविंद केजरीवाल का दावा है, यानी अकाट्य सत्य नहीं है. जो हमने कहा, जिस पर वे नाराज़ हो गए, और पूछने लगे कि आप ही बताइए कितने लोग मरे हैं, जिसका हमने यही जवाब दिया-- हम पक्के तौर पर कोई संख्या नहीं बता सकते क्योंकि हम नहीं जानते.
चौथा-- सेहतमंद लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका 'पब्लिक प्रॉसिक्यूटर' की ही होती है, जनता की जानकारी-समझदारी के लिए सवाल पूछना उसके पेशे का ज़रूरी हिस्सा है.
अगर पत्रकार मनमाफ़िक सवाल नहीं पूछ रहा इसका ये मतलब नहीं है कि वो आपके विरोधियों का समर्थक है. ठीक वैसे ही, जब वह आपके विरोधियों से कड़े सवाल पूछता है तो वो आपका समर्थक नहीं हो जाता.
बहरहाल, ये बात सिर्फ़ अरविंद केजरीवाल की नहीं है, मुश्किल सवाल पूछने वालों को दिक्क़तों का सामना करना पड़ता है लेकिन हमारा काम सवाल पूछना है जो हम पूछते रहेंगे, हर उस व्यक्ति से, जिससे जनहित में जवाबतलब किया ही जाना चाहिए.
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