क्या वाक़ई में महिला हितैषी है नीतीश सरकार?
- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
"मैडम आप किताब लिखने के लिए कहिएगा ना शराब की ख़ामियों पर, तो भी वो हम लिख देंगे.....क्या क्या बताएं शराब जब पति पीता है तो परिवार पर क्या गुज़रती है." 37 साल की मोनिका कृष्ण ने जब मुझसे ये कहा तो उनके चेहरे पर बीते वक़्त की पीड़ा और मौजूदा ख़ुशी दोनों थी.
13 साल पहले जब उनकी शादी छपरा के संदीप गुप्ता से हुई तो उनके सपने परवान पर थे. मोनिका ख़ुद ग्रेजुएट थीं और संदीप 12 वीं पास.
लेकिन शादी हो गई क्योकि संदीप की सोने चांदी की दुकान थी. शादी के बाद कुछ दिन गुज़रे तो मोनिका ने ख़ुद की ज़िंदगी को नरक सरीखा पाया. पति संदीप दिन- रात शराब पीते थे. घर में बच्चों को परेशान करना, पैसे के लिए पत्नी से लड़ाई, घर में भुखमरी के हालात थे.

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परेशान मोनिका ने राहत की सांस तब ली जब बिहार में शराबबंदी लागू हुई.
मोनिका बताती हैं, "मैंने पति को फुलवारीशरीफ़ के दिशा नशा मुक्ति केन्द्र में भर्ती कराया. शुरू में तो दिक्क़त हुई लेकिन अब ठीक हैं. अब पति ने अपना व्यापार फिर से शुरू किया है, बचत बढ़ी है और मेरा घर जो पैसे ना होने के चलते अधूरा रह गया था उसको हम पूरा करवाने की कोशिश में है."
मोनिका के पति संदीप से जब मैंने पूछा कि क्या अब शराब मिलेगी तो आप पिएंगें?
इसके जवाब में कान पकड़ कर वो कहते हैं, "मिलती तो अभी भी है शराब ऊंचे रेट पर लेकिन अब उस सुरंग में मैं नहीं लौटूंगा."
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीते एक साल के काम काज की समीक्षा करें तो शराबबंदी महिलाओं के बीच सबसे लोकप्रिय क़दम है.

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हालांकि शराबबंदी क़ानून के कड़े प्रावधानों को लेकर उनकी आलोचनाएं भी हो रही है. इसमें सुधार के लिए नीतीश कुमार ख़ुद लोकसंवाद भी कर रहे हैं.
समाजशास्त्री डीएम दिवाकर कहते हैं, "नीतीश कुमार की अपनी जाति का वोट बैंक बहुत नहीं है, इसलिए वो अपना वोट बैंक तैयार करते हैं. महिलाओं को पंचायतों में आरक्षण, साइकिल योजना, महादलित महिलाओं के नाम पर पर्चा, शराबबंदी, महिलाओं को नौकरी में आरक्षण ये कुछ ऐसे क़दम हैं जिससे वो विकास के ज़रिए अपना वोट बैंक बनाते और बढ़ाते हैं. इन क़दमों से निम्न वर्गीय महिलाओं में उनका वोट पुख्ता हुआ है लेकिन ऐसा उच्च वर्ग की महिलाओं के लिए कहना मुश्किल है."
राज्य सरकार की नौकरियों में महिलाओं के लिए 35 फ़ीसदी आरक्षण सरकार ने दिया है. 18 साल की तृप्ति इस फ़ैसले को नीतीश कुमार का बेहतरीन क़दम बताती हैं.
वो कहती हैं, "नौकरियों में आरक्षण देने का मतलब है कि वो लड़कियों को लड़कों से ज़्यादा तरजीह दे रहे हैं. फिर शराबबंदी से छेड़ख़ानी कम हुई है, हम अब ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं."
बीते एक साल में राज्य की क़ानून व्यवस्था को लेकर विपक्ष ने सरकार को घेरने की कोशिश की है.
महिलाओं में इसे लेकर अलग-अलग राय है.
रीना सिन्हा महाराष्ट्र की हैं. वो बीते चार साल से पटना में हैं.

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रीना कहती हैं, "हम जब बिहार के बाहर थे तो यहां के बारे में बहुत बुरा सुनते थे लेकिन यहां आकर ऐसा कुछ महसूस नहीं हुआ. लॉ एंड आर्डर को लेकर मीडिया में हाइप है, हालात उतने बुरे नहीं है. हम अभी भी देर रात पार्टी करते हैं, घूमते हैं, कहीं कोई दिक्क़त नहीं."
लेकिन इस दावे को ख़ारिज करने वाले भी कम नहीं हैं.
गर्दनीबाग धरना स्थल पर बीते 25 अक्तूबर से सामूहिक दुष्कर्म की शिकार एक 14 साल की बच्ची अपने परिवार के साथ धरने पर बैठी हैं. 14 साल की यह बच्ची चल-फिर नहीं पा रही है. परिवार का कहना है कि बार बार ज़ोर देने के बावजूद बच्ची का मेडिकल प्रशासन ने नहीं कराया है.

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इस बच्ची ने कहा, "सरकार बेटी बेटी करती है. लेकिन बेटी सड़क पर निकलती है तो क्या होता है. यही होता है ना जो मेरे साथ हुआ. ये बेटी चाहती है कि उसकी डॉक्टरी जांच हो, जिन्होंने ये काम किया उसको सज़ा हो, तो सरकार मौन है. हम यहां 20 दिन में पड़े हुए है खुले आसमान के नीचे, कोई देखने नहीं आया."
25 साल की अंजलि घर में झाडू पोछा लगाने का काम करती हैं. तीन बच्चों की मां अंजलि चार महीने की गर्भवती हैं.
वो कहती हैं, "हमको कोई दवाई अभी तक नहीं मिला है सरकारी अस्पताल में. सरकार क्या करती है हमारे लिए. हमारी फ़िक्र है तो हमे दवाई दें सरकार.

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वहीं पटना कॉलेज के पास फूल बेचने वाली 55 साल की सविता भी सरकार से नाराज़ हैं.
वो कहती हैं, "ग़रीब औरत रोड पर भटकती है सरकार कुछ नहीं करती. हमको अपनी सांस की जगह पीएमसीएच में नौकरी लगनी थी. कहां लगी, यहां से लेकर सचिवालय तक भागदौड़ करते रहे. हमारे पास घूस खिलाने को पैसे नहीं थे तो अब बस फूल बेचते हैं."
हालांकि ग़ुस्सा थोड़ा शांत होने पर वो मानती हैं कि बच्चियों को साइकिल और ड्रेस का फ़ायदा मिला है. सरकार ने कुछ क़दम तो बढ़ाए है लेकिन बहुत कुछ किया जाना अभी बाक़ी है.
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