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आरएसएस को 'बापू का क़ातिल' बताने के पीछे मंशा?
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भिवंडी की एक अदालत ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कथित तौर पर महात्मा गाँधी का हत्यारा बताने वाले मुक़दमे में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी को ज़मानत दे दी है.
राहुल गाँधी ने साल 2014 के एक चुनावी मुहिम में कथित रूप से आरएसएस को गाँधी जी का हत्यारा कहा था.
कांग्रेस नेता के ख़िलाफ़ आरएसएस कार्यकर्ता राजेश कुंते ने मुक़दमा किया था
चुनावों में सियासी पार्टियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप आम बात है. आरएसएस को भी समय-समय पर सांप्रदायिक, फ़ासीवादी या नाज़ी कहा गया है लेकिन संघ ने इक्का-दुक्का को छोड़कर मामले में मुक़दमा नहीं किया.
राहुल के ख़िलाफ़ केस दायर करने का मक़सद क्या है?
संघ विचारक राकेश सिन्हा इसके जवाब में कहते हैं, "अगर आरएसएस के ख़िलाफ़ राजनितिक बयानबाज़ी करें तो चलेगा. लेकिन संगठन को राष्ट्रपिता का हत्यारा कहें तो ये निंदनीय है. वर्तमान पीढ़ी को नहीं मालूम कि गाँधी जी की हत्या कैसे हुई. तो ऐसे में एक राष्ट्रीय नेता के बयान का उनपर असर हो सकता कि संघ हिंसा पर विश्वास करता है, महात्मा गाँधी का हत्यारा है. ऐसे झूट बोलने वाले को बेनक़ाब करना हमारा दायित्व बनता है."
राकेश सिन्हा कहते हैं कि सालों पहले अदालत ने आरएसएस को इस मुद्दे पर क्लीन चिट दे दिया था, "अब राहुल गाँधी के पास कोई और सबूत है तो वो अदालत में पेश करें."
सिन्हा के अनुसार आरएसएस राष्ट्रपिता की हत्या जैसे इलज़ाम को बहुत गंभीरता से लेता है और इस तरह के इलज़ाम लगाने वालों के ख़िलाफ़ मानहानि का मुक़दमा करता है.
उन्होंने उदाहरण दिया 2001 में वरिष्ठ पत्रकार और वकील ऐ.जी. नूरानी के ख़िलाफ़ मुक़दमे का. "वो संघ के बारे में संघ-विरोधियों में सब से अधिक जानकारी रखते हैं. उन्होंने स्टेट्समैन अख़बार में छपे एक लेख में संघ को गांधी जी का हत्यारा कहा था. उनके ख़िलाफ़ मानहानि का मुक़दमा हुआ. उन्हें तो माफ़ी मांगनी ही पड़ी साथ ही अख़बार को प्रथम पन्ने पर माफ़ीनामा छापना पड़ा."
हालांकि ऐजी नूरानी ने माफ़ीनामे की बाात को झूठ बताया, "ये सरासर झूठ है. मैंने कोई माफ़ी नहीं मांगी. मेरे लेख के साथ एक कार्टून छपा था जिसमें आरएसएस को गाँधी का हत्यारा बताया गया था."
नूरानी के मुताबिक़ माफ़ी अख़बार ने मांगी जिसमें उनकी कोई रज़ामंदी नहीं थी.
वो कहते हैं, "उसके बाद मेरी एक किताब छपी है जिसमे गाँधी की हत्या पर एक पूरा चैप्टर है. अब बताइये मैं माफ़ी मांगता तो किताब कैसे लिखता?"
तो क्या वो अपने पुराने लेख का बचाव अब भी करते हैं?
इसपर नूरानी ने कहा, "देखिये कोई बेवक़ूफ़ ही होगा जो कहेगा कि आरएसएस ने नागपुर में कोई प्रस्ताव पारित किया था कि गाँधी की हत्या कर दो. किसी ने ये भी नहीं कहा कि नाथूराम गॉडसे ने आरएसएस के कहने से गांधी की हत्या की. लेकिन ये भी एक हक़ीक़त है जिसको कोई झुठला नहीं सकता कि गोडसे आरएसएस का आदमी था. इसे उनके भाई गोपाल गोडसे ने स्वीकार भी किया है."
लेकिन राकेश सिन्हा कहते हैं, "न्यायालय एक बार फ़ैसला कर चुकी है. तब नेहरू जी की सरकार थी. दूसरा 60 के दशक में जीवन लाल कपूर आयोग ने जांच और कई गवाहों से पूछ ताछ के बाद फ़ैसला दिया कि आरएसएस का गाँधी जी की हत्या से कोई लेना-देना नहीं."
तो क्या राहुल गाँधी और कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे को फिर से राजनीति की मुख्यधारा में लाने पर तुले हैं?
हाल में सुप्रीम कोर्ट ने जब राहुल गाँधी से कहा कि अपने बयान पर या तो माफ़ी मानगो या मुक़दमे का सामना करें, तो राहुल गाँधी ने न सिर्फ़ माफ़ी मांगने से इंकार किया बल्कि अपना आरोप एक बार फिर से दुहराया.
राहुल गाँधी के वकील ने सरकारी रिकॉर्ड और अदालती फ़ैसलों के आधार पर नाथूराम गॉडसे को आरएसएस का कार्यकर्ता बताया.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट का तर्क था कि ये कहना कि गॉडसे गाँधी के हत्यारे थे एक बात है लेकिन ये कहना कि आरएसएस का गाँधी की हत्या में हाथ था अलग बात है. पूरी संस्था और इसके सभी लोगों को हत्यारा कहना सही नहीं है.
सिन्हा के अनुसार कांग्रेस के पास मुद्दे की कमी है इसलिए आरएसएस के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी करती है, लेकिन वो जोड़ते हैं कि "संघ विरोध की जो राजनिति है वो 70 के दशक में ख़त्म हो चुकी है और कांग्रेस को इसपर जन समर्थन नहीं हासिल होगा.
राकेश सिन्हा का कहना है कि राहुल गांधी को "अंततः या तो माफ़ी मांगनी पड़ेगी या उन्हें सजा भुगतना पड़ेगी."