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चाय पीने से पहले ये ज़रूर जान लें
- Author, जस्टिन रॉलेट
- पदनाम, दक्षिण एशिया संवाददाता
अगर अभी यह लेख पढ़ते हुए आप चाय पी रहे हों तो चाय पीना छोड़कर कप को एक तरफ़ रख दें.
मैं अभी आपको जो बताने जा रहा हूं, उसे जानने के बाद शायद ही आपका दिल आपको चाय पीने की इजाज़त दे.
अक्सर आप मशहूर ब्रांडों की चायपत्ती के पैकेट पर बागान में चाय की पत्ती तोड़ती हुई एक महिला की ख़ुशनुमा तस्वीर देखते हैं.
लेकिन भारत के चाय बागानों में काम करने वाले मज़दूरों की हक़ीक़त इससे कोसों दूर है.
पिछले साल बीबीसी की टीम ने भारतीय चाय बागानों में काम करने वाले मज़दूरों की दुर्दशा पर एक रिपोर्ट की थी.
इन बागानों से दुनिया के बेहतरीन ब्रांडों के लिए चाय पत्ती भेजी जाती है.
हमारी रिपोर्ट के बाद मशहूर चाय कंपनियां टेटले, ट्विनिंग्स, लिप्टन्स, पीजी टीप्स और यॉर्कशयर टी ने कहा था कि वे भारतीय बागानों में क़ायम मौजूदा हालात को सुधारने पर ध्यान देंगे.
लेकिन इस हफ़्ते आई वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि इन बागानों में हालात अभी भी बदतर बने हुए हैं.
चाय उत्पादन के मामले में भारत दुनिया में दूसरे नंबर पर है. यहां के चाय बागानों का पचास फ़ीसदी हिस्सा टाटा के पास है. मशहूर टेटले टी ब्रांड भी टाटा का ही है.
वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि कम मज़दूरी, जीवन के बदतर हालात और दयनीय परिस्थिति में काम करने की मजबूरी की वजह से यहां काम करने वाले लोग कुपोषण के शिकार हैं और उनका स्वास्थ्य ख़राब है.
यह रिपोर्ट एमालगैमेटेड प्लांटेशन प्राइवेट लिमिटेड (एपीपीएल) के अधिग्रहण वाले चाय बागान की है. इस विशाल चाय बागान में क़रीब डेढ़ लाख लोग काम करते हैं.
कुछ ऐसा ही हमने पिछले साल असम के चाय बागान में पाया था.
भारत में चाय बागानों के मालिक क़ानूनी तौर पर बागान में काम करने वाले मज़दूरों को घर और टॉयलेट जैसी सुविधा देने को बाध्य हैं. इसके बावजूद हमने पाया कि यहां कामगारों के घर की छत से पानी गिरता है और साफ़-सफ़ाई की स्थिति बहुत ख़राब है.
कामगारों के कई परिवारों के पास टॉयलेट तक नहीं है और उनके पास चाय की झाड़ियों में मल-मूत्र त्यागने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.
यहां काम करने वाले मज़दूरों के स्वास्थ्य की स्थिति को भी हमने बहुत बुरी दशा में पाया. कइयों को जानलेवा बीमारी होने का ख़तरा था.
सुरक्षा के लिहाज़ से भी उनकी स्थिति बेहद ख़राब थी. बागान में बिना किसी सुरक्षा के मज़दूर कीटनाशकों का छिड़काव करते हैं और कुछ बागानों में तो बच्चे भी बड़ों के साथ काम करते हैं.
इस हफ़्ते आई वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट ने उसके ख़ुद के प्रयासों को ही धक्का पहुंचाया है.
इंटरनेशनल फाइनेंस कॉरपोरेशन (आईएफ़सी) के ज़रिए वर्ल्ड बैंक ने क़रीब अस्सी लाख डॉलर का निवेश मज़दूरों की हालत बेहतर बनाने के लिए किया था.
इस रिपोर्ट के आने के बाद लगता है कि ये कोशिश असफल साबित हुई है.
वर्ल्ड बैंक की जांच रिपोर्ट में पाया गया है कि चाय बागान में काम करने वाले मज़दूरों को हानिकारक रासायनिक तत्वों के बीच बिना किसी सुरक्षा उपाय के काम करना पड़ता है.
इस रिपोर्ट में टाटा की ओर से साल 2014 में तैयार की गई एक रिपोर्ट के हवाले से कहा गया है कि कम मज़दूरी मिलने की वजह से मज़दूर कुपोषण और कई तरह की बीमारियों के शिकार बन रहे हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक़ उन्हें अपनी मांगों को लेकर यूनियन बनाने का भी हक़ हासिल नहीं है. उन्हें न तो बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं और न ही बुनियादी तालीम मयस्सर है.
आईएफ़सी ने रिपोर्ट में कही गई कई बातों से अपनी सहमति जताई है.
टाटा ने एपीपीएल से जुड़े इन मुद्दों पर 'गहरी चिंता' जताई है और मज़दूरों के हालात सुधारने को लेकर एपीपीएल के प्रयासों की सराहना की है.
लेकिन चाय उद्योग में शामिल हर कोई जानता है कि इस उद्योग में काम करने वाले मज़दूरों की ग़रीबी और ख़राब स्वास्थ्य से निपटना एक बहुत मुश्किल काम है.
एपीपीएल के मज़दूरों का साथ देने वाली एक संस्था अकाउंटेबिलिटी काउंसिल के अनिरुध नागर कहते हैं कि भारत में पहली बार चाय बागान 1830 के दशक में शुरू हुए थे और उस वक़्त से लेकर अब तक यहां काम करने वाले मज़दूरों की स्थिति थोड़ी-बहुत ही बदली है.
उनका कहना है, "यहां काम करने वाले मज़दूर एक तरह से अपने मालिक के बंधक होते हैं. कम दिहाड़ी में काम करने को मजबूर ये मज़दूर रोज़मर्रा की ज़िंदगी में तमाम तरह की कठिनाइयों का सामना करते हैं. पढ़ाई-लिखाई की ख़राब व्यवस्था होने की वजह से इनके बच्चों के पास भविष्य में मज़दूर बनने के अलावा कोई विकल्प मौजूद नहीं है."
तो आख़िर इस हालात को बदलने के लिए क्या किया जा सकता है? सबसे पहले तो अपने चाय की प्याली को पीने के लिए फिर से उठा लें. चाय पीना छोड़ देना इसका कोई समाधान नहीं है.
इस मुहिम से जुड़े कार्यकर्ताओं की दलील है कि चाय काफ़ी सस्ती है. बड़े ब्रांडों को चाय की कहीं ज़्यादा क़ीमत मिलनी चाहिए ताकि वो मज़दूरों की अच्छी दिहाड़ी दे सकें और मज़दूरों के हालात ठीक करने पर ध्यान दे सकें.
वे यूनियन और एनजीओ की भूमिकाओं को भी इस दिशा में अहम मानते हैं. चाय बागानों में यूनियन बनाने को लेकर प्रतिबंध है और कभी-कभी एनजीओ को भी बागान में काम करने नहीं दिया जाता है.
इन कार्यकर्ताओं का यह भी मानना है कि चाय पीने वालों को चाय कंपनी के मालिकों को इस संबंध में दबाव डालना चाहिए कि वो अपने कामगारों की बेहतरी पर ध्यान दें. क्योंकि यह उनके उपभोक्ताओं के लिए भी काफ़ी मायने रखता है.
जब आप यह संदेश टेक्सट, ई-मेल और ट्वीट के मार्फ़त उन तक पहुंचा दें तो फिर आराम से तसल्ली के साथ अपनी चाय की प्याली चुस्की लेते हुए ख़त्म करें.
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