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क्या उलझन में है उत्तर प्रदेश का मतदाता?
- Author, भानु जोशी और आशीष रंजन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
पिछले पांच (2012-2016) वर्षो में देश के सभी 29 राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र और उत्तराखंड को छोड़ दें, तो 26 राज्यों में किसी न किसी पार्टी या गठबंधन को स्पष्ट जनादेश मिला है. ये कहीं न कहीं संदेश देता है की वोटर आजकल किसी भी पार्टी को स्पष्ट जनादेश देने का पक्षधर रहा है.
क्या हम इस बार के उत्तर प्रदेश चुनाव को जाति, धर्म और क्षेत्रवाद के मापदंडों के अतिरिक्त कुछ और पहलुओं से भी देख सकते है?
समाजवादी पार्टी का वर्तमान द्वन्द्व
पिछले दिनों उत्तर प्रदेश की राजनीति एक परिवार के आसपास केंद्रित नज़र आई. कई विश्लेषक मानते हैं कि इस उठापटक में मतदाता की उम्मीदों को दरकिनार किया गया. तो वहीं कुछ इस पारिवारिक क्लेश को पार्टी का ख़ात्मा मान रहे हैं. ग़ौरतलब है कि एक बड़े राजनीतिक परिवार में इस तरह की घटना कोई नई बात नहीं है. तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार और महाराष्ट्र के ठाकरे परिवार में भी ऐसा देखा जा चुका है.
सेंटर फॉर पालिसी रिसर्च (CPR), ने भारत में चुनावी रुझानो का अध्ययन' करते हुए तीन राज्यों (बिहार, असम और पश्चिम बंगाल) के फील्ड वर्क के दौरान एक महत्वपूर्ण बात पाई - वो ये कि चुनाव का परिणाम सिर्फ़ जाति, या पार्टी के आधार पर ही तय नहीं होता है. अन्य कई पहलू जैसे कि स्थानीय नेता का व्यक्तित्व, तत्कालीन सरकार द्वारा किया गया विकास कार्य, अपने प्रदेश से बाहर रहने वाले प्रवासियों की अपने राज्य के सरकार से उम्मीदें आदि भी चुनाव का परिणाम तय करने में ज़रूरी भूमिका निभाती हैं.
उदहारण के लिए पिछले वर्ष हुए बिहार विधानसभा चुनाव में कई विधानसभा क्षेत्रों में देखा गया कि वहां एक से अधिक पार्टियो के उम्मीदवार एक ही जाति या एक ही धर्म के थे पर जीतने वाले उम्मीदवार नें अपनी जाति या धर्म के अलावा कई और चीज़ो को अपने चुनाव प्रचार में शामिल किया. इसकी वजह से उस उम्मीदवार की जीतने की संभावना प्रबल हुई.
बिहार के ही मोकामा विधानसभा क्षेत्र में महागठबंधन और NDA दोनों के उम्मीदवार भूमिहार जाति (नीरज कुमार और कन्हैया सिंह) के थे, वही अनंत सिंह भी भूमिहार जाति के ही लेकिन निर्दलीय उम्मीदवार होते हुए भी उन्हें जीत हासिल हुई. उसी तरह दानापुर क्षेत्र में भी टॉप तीन उम्मीदवार यादव जाति से थे और बिहार में महागठबंधन की लहर होते हुए भी वहां विजयी उम्मीदवार बीजेपी से थी. इसी तरह सीमांचल वाले इलाके में भी ओवैसी के सघन प्रचार-प्रसार करने के वाबजूद उनका एक भी उम्मीदवार जीत नहीं पाया.
उत्तर प्रदेश का संग्राम
उत्तर प्रदेश चुनाव में तीन राष्ट्रीय (भाजपा, बसपा और कांग्रेस) और एक क्षेत्रीय दल (सपा) का अपना जातिगत, धर्मगत और क्षेत्रवाद आधार होने के कारण चीज़ें काफी जटिल हैं.
पिछले कुछ महीनो में नेताओ का 'आया राम, गया राम', (जैसे बसपा के पूर्व महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्या और कांग्रेस अध्यक्षा रीता बहुगुणा जोशी का भाजपा में शामिल होना आदि), भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान में हुई सर्जिकल स्ट्राइक और समाजवादी पार्टी के अन्दर मचे पारिवारिक द्वंद्व से इस चुनाव का गणित थोडा और उलझा है.
पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया, गाजीपुर, बनारस और आजमगढ़ में फील्ड वर्क के दौरान बातचीत में लगा अभी मतदाताओं ने मन नहीं बनाया है. गाज़ीपुर जिले के जमनिया विधान सभा क्षेत्र में एक मुस्लिम बुज़ुर्ग ने हमें बताया, "चुनाव में अभी बहुत देर है और हम चुनाव के नज़दीक आने पर देखेंगे की क्या करना है."
तीन राज्यों में रिसर्च में भी यह देखने को मिला कि ऐसे कई वोटर चुनाव से कुछ दिन पूर्व अपने मत का निर्णय लेते हैं. 2014 लोकसभा चुनाव के लिए 2013 में गूगल द्वारा कराए गए एक सर्वे के मुताबिक 42% शहरी मतदाता अनिर्णय की स्थिति में थे की वे इस चुनाव में किसको वोट करेंगे.
इसके अलावा जाति, धर्म और क्षेत्रीयता के आधार पर मतदाताओं का किसी एक विशेष पार्टी को एकमुश्त वोट करने के पैटर्न में भी थोड़ा-बहुत बदलाव आ रहा है. एक जाति, धर्म और क्षेत्र के अन्दर भी अब अलग-अलग पार्टी के तरफ एक ही समुदाय के लोगो का झुकाव देखा गया है. असम चुनाव में रिसर्च के मुतबिक मुसलमान बहुसंख्यक 49 निर्वाचन क्षेत्र में एनडीए को 22, कांग्रेस को 14, और मुस्लिम केंद्रित AIUDF को 12 सीटें मिलना इसका एक प्रमाण है.
मिसाल के तौर पर उत्तर प्रदेश में भी बसपा द्वारा आयोजित आजमगढ़ रैली में ही आए एक व्यक्ति ने हमसे कहा कि गुजरात में हमारे दलित बच्चों को खुलेआम पीटा गया है, क्या हम ऐसे ही जिंदगी जिएंगे? उत्तर प्रदेश में भी ऐसा न हो इसलिए हमें फिर से इस बार बहनजी की सरकार बनानी है." उस रैली में आये ज़्यादातर लोगों से बात करने से हमें ज्ञात हुआ की उन्ना (गुजरात) कांड से दलित समुदाय के लोग काफी खिन्न है.
परन्तु शाम को इसी आजमगढ़ जिले के एक गांव में एक दलित बसपा कार्यकर्ता का कहना था कि उनके क्षेत्र में बसपा के संभावित उम्मीदवार की कार्यशैली से नाखुश होकर वह और उनके समर्थक इसी क्षेत्र के एक दुसरे नेता (जिन्हें बसपा से टिकट नहीं मिलने की वजह से अब वो भाजपा की टिकट के अभिलाषी है) को अपना समर्थन दे सकते हैं. यह जबाब एक संकेत है कि एक ही जाति/समुदाय के लोगों के लिए पहचान की राजनीति के अलावा उनके अपने स्थानीय मुद्दों का भी चुनाव पर बहुत असर पड़ता है.
निष्कर्ष
ग़ौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के पिछले दो विधानसभ चुनाव में उन्हीं दो पार्टीयों को पूर्ण बहुमत मिला है जो पहचान की राजनीति की उपज हैं फिर भी इन दोनों चुनावों में विजयी पार्टीया- बसपा और सपा के सिर्फ अपने जाति के ही विधायक जीत कर नहीं आये बल्कि उनके कई विधायक दूसरे जाति के भी थे.
इन दोनों चुनावो में न सिर्फ़ दलित और यादव जातियों ने क्रमश: बसपा और सपा के सवर्ण उम्मीदवारों को वोट दिया अपितु सवर्ण मतदाताओ ने भी इन पार्टियों को अपना समर्थन दिया. राजनीतिक शास्त्री जफ्फेरलोट और वर्निएर्स के उत्तर प्रदेश चुनावो पर रिसर्च में भी यह बात सामने आई है कि 2007 और 2012 के चुनाव में स्वर्ण समाज के क्रमश: 60 और 61 विधायक जीत कर आये. इसलिए हो सकता है कि कुछ महीने पहले की उत्तर प्रदेश की चुनावी आबोहवा भले ही खंडित जनादेश की ओर संकेत कर रही हो लेकिन चुनाव के नज़दीक आते ही ये किसी पार्टी को बहुमत के करीब ले जाएगी.
(भानु जोशी और आशीष रंजन सेंटर फॉर पालिसी रिसर्च सेजुड़े हैं)
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