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'नोट बंदी से यूपी चुनाव की बदल जाएगी तस्वीर'
- Author, शरद प्रधान
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
500 और 1000 के नोटों को वापस लेने का प्रभाव उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर स्पष्ट रूप से पड़ेगा. इसका असर अभी से ही साफ दिख रहा है.
इन नोटों को वापस लेने के बाद उत्तर प्रदेश में नेताओं की बयानबाजी शुरू हो गई है. इनके बयानों से साफ जाहिर होता है कि ये भगदड़ की स्थिति में हैं. इलेक्शन के वक्त में इनके पांव तले से ज़मीन खिसक गई है.
अभी चुनाव का वक्त है और इनके पास हज़ारों करोड़ का कैश था. इन नकदी पैसों इस्तेमाल होना भी शुरू हो गया था.
इन नोटों को अचानक से वापस लिए जाने के बाद इन्हें एकदम से समझ में नहीं आ रहा है कि आने वाला चुनाव कैसे लड़ा जाएगा. अभी जो मायावती और समाजवादी पार्टी की रैली हुई थी उसमें पानी की तरह पैसे बहाये गए थे.
दोनों की रैलियों में तमाम गाड़ियां बिना नंबर प्लेट्स की दिख रही थीं. सारी गाड़ियां बिल्कुल नई और ब्रैंडेड थीं. कहा जा रहा है कि इन गाड़ियों की खरीद नकदी हुई थी.
यहां तक सुनने में आया है कि एक पार्टी में पार्टी प्रमुख तो पैसे लेकर टिकट बांट रहे हैं. कहा जाता है कि उस पार्टी में एक टिकट 50 लाख से चार करोड़ तक में बेचा जाता है.
कहा जा रहा है कि जिन लोगों ने टिकट के लिए पहले पैसे दे दिए थे उनसे पैसे वापस लेने को कहा गया है.
उनसे कहा गया है कि यदि टिकट चाहिए तो नई करेंसी दो. इन्होंने कहा कि वे नई करेंसी कहां से दें तो कहा गया कि सोना और डायमंड दे जाओ. उत्तर प्रदेश में यह आम चर्चा है.
यहां तक कि बीजेपी वाले भी परेशान हैं. उनके साथ दिक्क़त यह है कि वे खुलकर विरोध भी नहीं कर सकते हैं.
सारी सियासी पार्टियों का स्थिति पतली है क्योंकि पूरा चुनाव ब्लैक मनी के दम पर ही लड़ा जाता है.
इस बार चुनाव जैसे 50 और 60 के दशक मे होता था वैसा ही हो सकता है, क्योंकि ब्लैक मनी के बगैर वैसी ही स्थिति बन रही है. तब लोग ज़मीन पर उतरते थे और घर-घर जाकर मिलते थे.
उम्मीदवार ऐसा चुनावी अभियान चलाते थे जिसमें पैसों की बर्बादी नहीं होती थी. शराब नहीं बांटी जाती थी. ग़लत हरकतें नहीं होती थीं और न ही बंद़ूकों का इस्तेमाल होता था.
इस बार ऐसा लग रहा है कि चुनाव उसी दौर में लौटकर जाएगा. ज़ाहिर है इसका साफ असर पड़ेगा. यह मौका है जब दिखलाया जा सकता है कि बिना ब्लैक मनी के भी चुनाव लड़ा जा सकता है.
भारत में चुनाव बेहद खर्चीला हो गया है. यह बात किसी से छुपी नहीं है. टिकट लेने के लिए जब लोग एक-एक करोड़ रुपये दे रहे हैं तो उसी से खर्च का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
एक उम्मीदवार तीन से चार करोड़ रुपये खर्च करता है. लोकसभा में इसके तीन से चार गुना ज़्यादा खर्च होता है. जब एक उम्मीदवार पांच करोड़ रुपये विधायक बनने के लिए खर्च करता है तो उसका पहला उद्देश्य होता है कि इन पैसों की वसूली की जाए.
पहले वह पांच करोड़ रुपये वसूलने की जुगत में रहता है फिर उसे डबल करना चाहता है. पांच साल का कार्यकाल इसी में निकल जाता है. वह अपनी तिजोरी भरने में लगा रहता है और लोगों के बारे में सोचने की फुरसत ही नहीं मिलती. इसी का नतीजा है कि उत्तर प्रदेश की स्थिति इतनी बदतर है.
(बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से बातचीत पर आधारित)
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