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'पांच सौ का नोट कोई लेता नहीं, खुदरा है नहीं'
- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
केंद्र सरकार ने पांच सौ और एक हजार के नोट बंद कर दिया. इसके बाद चार दिन बीत चुके हैं.
लेकिन सरकार के इस फ़ैसले के कारण ग्रामीण इलाकों में भी कई तरह की परेशानियों का सामना लोग कर रहे हैं.
गांवों में छोटी-बड़ी खरीदारी आज भी लगभग नगद में ही होती है. लेकिन अभी गांवों में भी नगदी की बहुत कमी देखी जा रही है.
ऐसे में यहां के दुकानदार से लेकर खरीददार यानी कि गांव वालों के सामने अलग-अलग दिक्कतें पेश आ रही हैं.
पटना के संपतचक ब्लॉक के मित्तनचक के बटेश्वर मांझी बताते हैं, ''हाट-बाजार में दुकानदार खुदरा खोजते हैं. पांच सौवा नोट उ सब लेबे नहीं करते हैं और खुदरा हमनी के पास है नहीं.''
बटेश्वर के मुताबिक खुदरा नहीं होने के कारण वे बीते दो दिनों में घर के लिए किरासन तेल से लेकर अपने लिए बुखार की दवा तक नहीं खरीद सके.
साथ ही उन्हें यह भी अच्छे से नहीं मालूम कि उनके पास जो कुछ पांच सौ के नोट हैं, वे बदले कैसे जाएंगे.
वहीं सदानी चक गांव में दवा की दुकान चलाने वाले गौतम कुमार की परेशानी कुछ दूसरे तरह की है.
गौतम बताते हैं, ''मेरे पास आमतौर पर जान-पहचान वाले ही दवा खरीदने आते हैं. ऐसे में न तो उनसे पांच सौ और हजार के नोट लेते बना रहा है और न ही उन्हें उधार देने से मना कर पा रहा हूं.''
गौतम का कहना है कि बीते तीन दिनों से वे पहले के मुकाबले दोगुना दवा उधार में बेच रहे हैं. साथ ही उनकी परेशानी यह भी है कि दवा कंपनी वाले न तो अब उधार देने को तैयार हैं और न ही बंद हुए नोट लेकर दवा देने को.
गांव में सबसे ज्यादा चहल-पहल रोजमर्रा की जरूरतें पूरा करने वाली किराना दुकानों पर देखी जाती है.
भोगीपुर गांव में किराना दुकान चलाने वाले शिव प्रकाश गुप्ता ने बताया, ''ज्यादातर कस्टमर पांच सौ का नोट लेकर आ रहे हैं जिन्हें हम ले नहीं रहे हैं. ऐसे में बीते तीन दिनों से लोग बहुत कम खरीददारी कर रहे हैं. मेरी रोज की बिक्री करीब आधी रह गई है.''
साथ ही शिव प्रकाश को भी दवा दुकानदार गौतम की तरह अब उधार में कारोबार ज्यादा करना पड़ रहा है. महाजन उन्हें भी अब उधार में सामन देने से हाथ खड़े करने लगे हैं.
वहीं चकपुर गांव के अनिल पासवान की परेशानी पांच सौ के बंद किए नोट बदले जाने के बावजूद दूर नहीं हुई.
उन्हें पहले पांच सौ के बंद हुए नोट से जरूरी सामान खरीदने में दिक्कतें हो ही रही थीं. लेकिन आज जब उन्होंने बैंक जाकर नोट बदलवाया तो उन्हें दो-दो हजार के दो नोट थमा दिए गए.
अनिल ने बताया, ''मांगने पर भी मुझे सौ-सौ का नोट नहीं मिला. पांच सौ के नोट के चलते होने वाली परेशानी अब दो हजार के नोट के कारण और बढ़ जाएगी.
साथ ही अनिल की एक परेशानी यह भी है कि काम करने के बावजूद अभी उन्हें मजदूरी भी नहीं मिल पा रही है.
भेलवाड़ा गांव के मनीष कुमार के दादा की मौत बीते महीने के अंत में हो गई थी. अभी उनके यहां श्राद्ध-कर्म से जुड़े आयोजन होने बाकी ही थे कि 'नोटबंदी' लागू हो गई.
मनीष के बताया, ''अचानक बड़े नोट बंद किए जाने के कारण सब्जी खरीदने से लकर गैस सिलिंडर तक का दंतजाम करने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ा.''