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हवा है ज़हरीली, और मास्क भी नहीं
- Author, विकास पांडेय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
प्रदूषण के ख़तरनाक स्तर पर पहुंचने से घबराए दिल्ली के लोग मास्क की तलाश में दुकानों के सामने लंबी क़तारे लगा रहे हैं लेकिन अचानक से बढ़े डिमांड की वजह से फ़ेस मास्क की भारी कमी हो गई है.
ख़ान मार्केट की एक ऐसी ही दुकान के बाहर लाइन में खड़े एक ग्राहक ने गुस्से में कहा, "मैं दिन भर इंतजार कर सकता हूं, पर बग़ैर मास्क लिए नहीं लौटूंगा."
लेकिन दुकान में स्टॉक ख़त्म हो गया और वहां शोरगुल होने लगा, दुकानदार लोगों को समझाने की कोशिश कर रहा था लेकिन लंबी क़तारों में घंटों से खड़े लोग बेहद नाराज़ थे.
ये दुकान ऊंची क़ीमत वाला ब्रांड 'वोगमास्क' बेचता है लेकिन दुकानदार ने साफ़ शब्दों में लोगों से कह दिया कि उन्हें दोपहर बाद तक इंतजार करना पड़ेगा.
फ़ेस मास्क कई रंगों और डिज़ायनों में आते हैं, पर स्टॉक की कमी की वजह से लोग जो मिल रहा उसी से संतोष कर रहे हैं.
जयधर गुप्त पूरे दक्षिण एशिया में वोगमास्क सप्लाई करते हैं. लेकिन उनका कहना है कि वे इस साल मांग पूरी करने के लिए जूझ रहे हैं.
उन्होंने कहा, "हम सिंगापुर और हॉंगकांग जैसी जगहों से स्टॉक लाने की कोशिश कर रहे हैं, पर फिर भी मांग पूरी नहीं हो रही है. हम पिछले दस दिनों में लाखों मास्क बेच चुके हैं. इस साल प्रदूषण का स्तर बहुत ऊंचा है."
यह हाल सिर्फ़ दुकानों तक सीमित नहीं है. ऑनलाइन मास्क बेचने वालों का पास भी मांग बहुत ज़्यादा है.
बीते कुछ दिनों से दिल्ली में प्रदूषण का स्तर ख़तरनाक ढंग से बढ़ गया है.
हवा में मौजूद छोटे छोटे कण, 'पार्टिकुलेट मैटर' 2.5 का घनत्व बीते हफ़्ते 800 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हो गया था - ये विश्व स्वास्थ्य संगठन की तय सीमा से 30 गुणा अधिक.
ये कण हवा के साथ सीधे फेफड़े तक पंहुच जाते हैं.
स्कूल बंद कर दिए गए, लोगों से कहा गया है कि वो बिना ज़रूरत घर से न निकलें. अधिकतर लोगों का कहना है कि उनके पास मास्क और एअर प्यूरीफ़ायर खरीदने के अलावा कई चारा नहीं है.
दिल्ली के ऐसे ही एक बाशिंदा मृत्युजंय कुमार ने पूछा, "मैं और क्या कर सकता हूं? हमारी सुरक्षा के लिए सरकार तो कुछ कर नहीं रही है. लिहाज़ा, अपने पूरा परिवार के लिए मैं फ़ेस मास्क ख़रीद रहा हूं."
गुप्त मृत्युजंय की बात से सहमत हैं, "सरकार पटाख़ों पर रोक लगाने, डीज़ल कार और फसल के अवशेष जलाने वाले किसानों को ज़ुर्माना लगाने का काम भी नहीं कर सकी."
वे आगे कहते हैं, "मुझे ऐसा लगता है मानो किसी ने हमारे शहर में रसायनिक जंग छेड़ रखी है."
दिल्ली में रहनेवाले विदेशी भी फ़ेस मास्क की दुक़ानों के बाहर लगी क़तारों में मिल जाते हैं.
अमरीकी नागरिक जोश हॉफ़मैन दिल्ली में लंबे समय से हैं. उनके मुताबिक़, "यह साल कुछ ज़्यादा ही ज़हरीला लग रहा है."
पर, क्या फ़ेस मास्क और एअर प्यूरीफ़ायर दि्ल्ली की प्रदूषण समस्या का हल है?
पर्यावरण के लिए काम करने वाले बरुण अग्रवाल कहते हैं, "नहीं. ये चीजें सिर्फ़ फ़ौरी राहत के लिए हैं और हर कोई इसे नहीं ख़रीद सकता. स्थाई समाधान की ज़रूरत है. इसकी शुरुआत प्रदूषित हवा में सांस लेने से होने वाले नुक़सान के प्रति लोगों को जागरूक बनाने से की जा सकती है."
वे कहते हैं लोगों को समझाना होगा कि वे पेड़ न काटें और डीज़ल कार न ख़रीदें.
अग्रवाल कहते हैं कि दिल्ली की हवा जाड़ों में प्रदूषित हो जाती है. लेकिन "इसका मतलब यह नहीं कि बाकी समय हम साफ़ हवा में सांस लेते हैं."
उनकी कंपनी के पास भी फ़ेस मास्क की ज़बरदस्त मांग है, पर वे इससे खुश नहीं हैं.
उन्होंने कहा, "यह आपको अजीब लग सकता है. पर इसकी ज़रूरत है कि हम एअर प्यूरीफ़ायर और मास्क जैसी चीजों से परे की सोचें. मसलन, मास्क को ही लें. उसमें लगा फ़िल्टर साल भर में बेकार हो जाता है. अधिकतर मामलों में वे अंत में जला दिए जाते हैं, जिससे और अधिक समस्या खड़ी होती है."
अग्रवाल के मुताबिक़, दिल्ली की प्रदूषण समस्या के स्थाई समाधान की ज़रूरत है. ऐसा नहीं हुआ तो मास्क की दुकानों के सामने लगी लाइन लंबी होती चली जाएगी.