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गांधी की लाठी थामने वाला चला गया...
महात्मा गांधी की जितनी बेहतरीन तस्वीरें आपनी देखी होंगी, उनके पीछे जो शख़्स थे, वो अब इस दुनिया में नहीं रहे.
गांधी के पौत्र, बेहतरीन फ़ोटोग्राफ़र और नासा के पूर्व वैज्ञानिक कनु रामदास गांधी का सोमवार शाम निधन हो गया.
लंबे वक़्त से बीमार चल रहे कनु 87 बरस के थे. कनु का जन्म साल 1917 में महात्मा गांधी के भतीजे नारायण गांधी और जमुना गांधी के यहां हुआ था.
कनु जब छोटे थे, तो उनकी वो तस्वीर बेहद मशहूर हुई, जिसमें वो दांडी मार्च के दौरान महात्मा गांधी की लाठी पकड़े हुए आगे-आगे चल रहे हैं.
अक्टूबर में उन्हें दिल का दौरा पड़ा और ब्रेन हैमरेज भी हुआ, जिसकी वजह से वो कोमा में चले गए थे.
महात्मा गांधी के सेक्रेटरी के तौर पर काफ़ी साल काम करने वाले कनु ने उनकी 2,000 से ज़्यादा तस्वीरें ली थीं. हालांकि, इनमें से कई तस्वीरें सालों तक गुमनाम रहीं.
कई दशक पहले भारत में अमरीका के तत्कालीन राजदूत जॉन केनेथ गलब्रेथ, कनु को पढ़ाई के लिए अमरीका के एमआईटी ले गए.
बाद में उन्होंने नासा के लिए भी काम किया.
महात्मा गांधी की वो बेहद ख़ास तस्वीरें, जो कनु ने खींची:
कनु गांधी को उनके माता-पिता ने 20 साल की उम्र में गांधी की मदद करने को सेवाग्राम भेज दिया था. वो मेडिकल की पढ़ाई करना चाहते थे लेकिन फिर उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी में दिलचस्पी पैदा हो गई.
कनु, मेडिकल की पढ़ाई करना चाहते थे लेकिन फिर उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी में दिलचस्पी पैदा हो गई.
कनु गांधी आमतौर पर महात्मा गांधी के आस पास ही रहते थे. ऐसे में कई ऐसे अंतरंग और एकांत के पल उनके कैमरे में क़ैद हो गए.
उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में एक बार गांधी की गाड़ी कुछ ऐसे ही फंस गई थी. कनु गांधी ने महात्मा गांधी के साथ देश-दुनिया जगह जगह यात्राएं की.
गांधी के जीवन के अंतिम दशक में कई अहम घटनाएं और क्षण गुज़रे. कनु की तस्वीरों में उन सबकी कहानी क़ैद है.
तीन दिनों के उपवास के दौरान गांधी की मालिश करती हुई उनकी बड़ी बहन रालियातबेन और एक रिश्तेदार.
ये तस्वीर साल 1940 की है.
साल 1944 में पुणे के आगा़ ख़ा पैलेस के एक बिस्तर पर कस्तूरबा गांधी अचेत अवस्था में लेटी हुई हैं.
1938 की एक ऐतिहासिक तस्वीर जिसमें महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस हल्के-फुल्के अंदाज़ में बातचीत करते हुए. पीछे कस्तूरबा दिखाई दे रही हैं.
1940 में खिंची गई इस तस्वीर में गांधी और टैगोर चिंतन-मनन करते दिखाई दे रहे हैं.
महात्मा गांधी भारत में दलितों की मौजूदा दशा के प्रति ख़ासे चिंतित रहा करते थे. उन्होंने 1945-46 के दौरान तीन महीने लंबी रेल यात्रा की और जगह-जगह जाकर धन जुटाया था.
इसी संदर्भ में उन्होंने एक बार कहा था, "मैं बनिया हूं. मेरे लोभ का कोई अंत नहीं है."
(सारी तस्वीरेंः कनु गांधी, ©गीता मेहता, आभा और कनु गांधी की वारिस)