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अलगाववादी नेता यासीन मलिक की रिहाई, कश्मीर वार्ता की पहल?
- Author, रियाज़ मसरूर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर
भारत प्रशासित कश्मीर के चर्चित अलगाववादी नेता यासीन मलिक को तीन महीने की क़ैद के बाद रिहा कर दिया गया है.
52 साल के यासीन मलिक जम्मू-कश्मीर लिब्रेशन फ़्रंट के नेता हैं और कश्मीर में अलगाववादियों के बीच वैचारिक एकता स्थापित करने के उन्होंने अहम भूमिका निभाई है.
यासीन मलिक को दिल और गुर्दे की बीमारी हैं. पिछले महीने उनकी सेहत ख़राब होने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया था.
बीते दिन जब उन्हें अस्पताल से दोबारा जेल शिफ़्ट किया गया तो राजनीतिक, सामाजिक और दूसरे हलकों के लोगों ने इसकी तीखी आलोचना की जिसके बाद यासीन मलिक को रिहा कर दिया गया.
उनकी रिहाई से पहले प्रशासन ने अलगाववादी नेता मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ को भी जेल से रिहा कर के घर में नज़रबंद कर दिया था.
लेकिन सैयद अली शाह गिलानी को अभी नज़रबंद ही रखा गया है और उनके परिजनों को उनसे मुलाक़ात की इजाज़त नहीं दी गई है.
यासीन मलिक, मीरवाइज़ उमर फारूक़ और शैयद अली शाह गिलानी क़रीब चार महीने से जारी भारत विरोधी प्रदर्शनों का नेतृत्व कर रहे हैं.
यासीन मलिक और मीरवाइज़ की रिहाई ऐसे वक़्त हुई है जब पूर्व केंद्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के नेता यशवंत सिन्हा के नेतृत्व में पाँच सदस्यों का एक दल कश्मीर का लंबा दौरा करके वापस दिल्ली पहुंचा है.
यशवंत सिन्हा के दल ने मीरवाइज़ और गिलानी के साथ वार्ता की है लेकिन यासीन मलिक ने उनसे मिलने से इंकार कर दिया था.
लेकिन इस दल में शामिल पत्रकार भारत भूषण यासीन मलिक का हालचाल पूछने अस्पताल गए थे.
भूषण यासीन मलिक के गहरे दोस्त हैं और उनका कहना है कि यासीन मलिक से उनकी मुलाक़ात निजी थी.
यासीन मलिक का कहना है कि पहले भी इस तरह के दल कश्मीर आते रहे हैं लेकिन इससे कश्मीर के ज़मीनी हालात में कोई बदलाव नहीं आया है.
मलिक कहते हैं कि भारत सरकार ने रिटायर्ड राजनयिकों, एनजीओ के कार्यकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक फ़ायर फ़ाइटिंग टीम रखी हुई है जो कश्मीर की आग को बुझाने का काम तो करती है लेकिन सरकार उसकी सिफ़ारिशों पर ध्यान नहीं देती है.
यासीन मलिक ने ही इस साल की शुरुआत में मीरवाइज़ और सैयद अली शाह गिलानी से वार्ता कर एक संयुक्त रणनीति तैयार करने पर सहमति बनाई थी.
हालांकि अभी ये स्पष्ट नहीं है कि इन तीनों नेताओं ने यशवंत सिन्हा से मुलाक़ात के पहले कोई वार्ता की थी या नहीं.
मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ ने बीते शनिवार यशवंत सिन्हा के दल के साथ एक घंटे की मुलाक़ात के बाद हुई प्रेस कांफ्रेंस में बताया कि उन्हें सैयद अली शाह गिलानी ने ही फ़ोन पर बताया था कि वो भी यशवंत सिन्हा के वार्ता दल के साथ मुलाक़ात करके उन्हें अलगाववादियों के सर्वसम्मत स्टैंड के बारे में बताएंगे.
इससे पहले सितंबर में भी भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह के नेतृत्व में भारतीय सांसदों का एक दल कश्मीर गया था.
उस दल में शामिल असदउद्दीन ओवैसी, सीताराम येचुरी, डी राजा और शरद यादव ने गिलानी और मीरवाइज़ के साथ मुलाक़ात की कोशिश की थी लेकिन दोनों अलगाववादी नेताओं ने उन लोगों से मिलने से इंकार कर दिया था.
सैयद अली शाह गिलानी ने तो दल के आने पर अपने घर का दरवाज़ा ही बंद कर दिया था जबकि मीरवाइज़ ने उन्हें दरवाज़े से लौटने को कहा था.
बाद में राजनाथ सिंह ने कहा था कि वार्ता की उन कोशिशों में सरकार की कोई भूमिका नहीं थी और अलगाववादी नेताओं से मिलने का फ़ैसला दल के सदस्यों ने निजी तौर पर लिया था.
लेकिन अबकी बार यशवंत सिन्हा की तरफ़ से बातचीत की ताज़ा कोशिश को सार्थक कहा जा रहा है. ख़ास तौर पर उनके यहां आने पर अलगाववादियों की रिहाई को सरकार की ओर से भरोसा हासिल करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.
कश्मीर के व्यापारिक प्रतिष्ठानों ने यासीन मलिक की रिहाई को सही दिशा में उठाया गया क़दम बताया है. उन लोगों ने दूसरे नेताओं, ख़ास तौर पर, मानवाधिकार कार्यकर्ता ख़ुर्रम परवेज़ की रिहाई की मांग की है.
भारत विरोधी प्रदर्शनों को दबाने के लिए सरकार ने कश्मीर के चप्पे-चप्पे पर सेना, पुलिस और अर्धसैनिक बल फैले हुए हैं.
रात के दौरान घरों की तोड़फोड़ और ज्यादतियों की ख़बरों से विश्वास बहाली के प्रयासों का महत्व कम हो रहा है. सुरक्षाबलों की ओर से क्रैकडाउन का सिलसिला भी जारी है.
पुलिस ने स्वीकार किया है कि उसने 6000 लोगों को गिरफ्तार किया है जिनमें से 400 को सख्त क़ानून 'सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम' के तहत कश्मीर से बाहर जेलों में क़ैद किया गया है.
यासीन मलिक पिछले 32 साल से भारत विरोधी आंदोलन में सक्रिय हैं. उन्हें 1984 में पहली बार क़ैद किया गया था और इस दौरान उन्हें शारीरिक यातनाओं का भी शिकार होना पड़ा था.
वे 1988 में दूसरे युवाओं के साथ सशस्त्र प्रशिक्षण के लिए पाकिस्तान गए और वापसी पर भारत विरोधी सशस्त्र समूह जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के प्रमुख बन गए.
उन्होंने 1994 में सशस्त्र संघर्ष का रास्ता छोड़ कर शांतिपूर्ण राजनीतिक संघर्ष का नारा दिया और लिबरेशन फ्रंट को एक राजनीतिक दल के रूप में पेश किया.
लेकिन यासीन मलिक कहते हैं कि भारत सरकार ने कश्मीरियों से शांतिपूर्ण प्रयासों को कभी नहीं सराहा है.
वो कहते हैं, "संघर्ष विराम के बाद मेरे 600 साथियों को हिरासत में क़त्ल किया गया और आज हालात ये हैं कि महज़ बात करने पर यहां लोगों को जेल भेज दिया जाता है."
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