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आख़िर क्यों हटाया गया सायरस मिस्त्री को?
- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
टाटा ग्रुप से इसके चेयरमैन सायरस मिस्त्री की बर्खास्तगी की अलग-अलग वजहें बताई जा रही हैं.
टाटा संस के एक बयान के मुताबिक़ मिस्त्री के कामकाज करने का तरीका टाटा ग्रुप के काम करने के परंपरागत तरीके से मेल नहीं खा रहा था.
और इसी वजह से बोर्ड के सदस्यों का मिस्त्री पर से भरोसा उठ गया.
मिस्त्री 2012 में कंपनी से जुड़े थे.
नमक से लेकर हवाई जहाज़ के व्यापार से जुड़ी टाटा ग्रुप देश की सबसे पुरानी कंपनियों में से एक है.
नए चेयरमैन को चुनने के लिए एक चुनाव समिति का गठन किया गया है और रतन टाटा को कंपनी का अंतरिम चेयरमैन बनाया गया है.
समिति में रतन टाटा, रॉनेन सेन, लॉर्ड कुमार भट्टाचार्य, वेणु श्रीनिवासन और अमित चंद्रा शामिल हैं.
150 सालों के टाटा के इतिहास में सायरस मिस्त्री मात्र छठे ग्रुप चेयरमैन थे.
मिस्त्री भारतीय निर्माण कंपनी के मालिक पैलोनजी मिस्त्री के छोटे बेटे हैं.
टाटा संस 100 अरब डॉलर के टाटा ग्रुप का होल्डिंग ग्रुप है. टाटा संस स्टॉक मार्केट में रजिस्टर्ड नहीं है.
टाटा संस पर सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट का नियंत्रण है और उसमें 66 प्रतिशत हिस्सा है.
रतन टाटा दोनों ट्रस्ट के चेयरमैन हैं और उनके पास चेयरमैन को नियुक्त करने और हटाने का अधिकार है.
शपूरजी एंड पलोनजी ग्रुप का टाटा संस में 18.5 प्रतिशत का हिस्सा है. ये ग्रुप टाटा संस में हिस्सा रखने वाली सबसे बड़ी ग़ैर-टाटा कंपनी है.
कितना बड़ा है टाटा ग्रुप
टाटा ग्रुप की 100 से ज़्यादा कंपनियां हैं जिनमें टाटा मोटर्स, टाटा पावर, जगुआर लैंड रोवर, टेटली चाय और आईटी कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ शामिल हैं.
इनमें से बहुत सारी कंपनियां सालों से आर्थिक संकट का शिकार हैं.
जगुआर लैंड रोवर और टाटा कंसल्टेंसी मुनाफ़ा कमा रही हैं लेकिन टाटा स्टील को ब्रिटेन में भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है.
टाटा मोटर्स को भारतीय और विदेशी कार कंपनियों से भारी चुनौती मिल रही है.
सायरस मिस्त्री को क्यों निकाला गया.
टाटा संस ने अपने वक्तव्य में कहा है कि सायरस मिस्त्री के कार्यकाल में टाटा ग्रुप की तहज़ीब और स्वभाव से बारबार हटकर काम हुए जिसकी वजह से बोर्ड का विश्वास मिस्त्री में नहीं रहा.
लॉर्ड कुमार भट्टाचार्य ने फ़ायनेंशियल टाइम्स को बताया कि ये फ़ैसला मिस्त्री की ख़राब कामकाज का नतीजा था.
इन वक्तव्यों को मीडिया में अलग-अलग तरीके से देखा गया.
1. माना जा रहा है कि अपने कार्यकाल में सायरस मिस्त्री ने आर्थिक नुकसान का सामना कर रही टाटा ग्रुप की हॉस्टपिटैलिटी कंपनी इंडियन होटल्स कंपनी लिमिटेड के अंतर्गत चल रहे होटलों में हिस्सेदारी कम की या उन्हें बेच दिया. इससे टाटा ग्रुप में नाराज़गी थी.
मिस्त्री के नेतृत्व में ताज बॉस्टन होटल, ब्लू सिडनी होटल को बेच दिया गया. अपने पत्र में मिस्त्री ने कहा था कि न्यूयॉर्क के मशहूर पियर होटल के लीज़ की शर्त इतनी कष्टदायक हैं कि होटल को बेचना चुनौतीपूर्ण होगा.
2. टाटा केमिकल्स ने अपना यूरिया का व्यापार नॉर्वे की एक कंपनी को बेच दिया था. इससे कई लोग खुश नहीं थे.
3. सायरस मिस्त्री के नेतृत्व में टाटा ग्रुप ने ब्रिटेन में नुकसान उठा रहे स्टील ऑपरेशंस को बेचने की घोषणा की. हालांकि ये कैसे होगा, अभी इस पर आखिरी फ़ैसला नहीं लिया गया है. इससे भी टाटा में नाराज़गी बताई जाती है. जब टाटा ग्रुप ने विदेश में टेटली चाय या कोरस जैसी कंपनियां खरीदी थीं, तब इसे टाटा के लिए बेहद गौरवपूर्ण बताया गया था.
4. माना जाता है कि टाटा ग्रुप और जापान की कंपनी एनटीटी डोकोमो के बीच न्यायिक विवाद भी सायरस मिस्त्री के खिलाफ़ गया. जब रतन टाटा चेयरमैन थे तभी डोकोमो टाटा साथ आए थे. लेकिन जब ये मामला अदालत पहुंचा, तो रिपोर्टों के अनुसार रतन टाटा इससे खुश नहीं थे. इस मामले में आया एक लंदन की एक अदालत का फ़ैसला टाटा के खिलाफ़ गया है और उसे 1.2 बिलियन डॉलर्स डोकोमो को देने को कहा गया है. लेकिन टाटा ने इस फैसले को विदेश मुद्रा पर भारतीय कानून का हवाला देते हुए दिल्ली की अदालत में चुनौती दी.
5. सायरस मिस्त्री नैनो कार को बनाने में बढ़ते घाटे के कारण उसे बंद करना चाहते थे. अपनी बर्खास्तगी पर बोर्ड को भेजी चिट्ठी में भी मिस्त्री ने इसका ज़िक्र किया. नैनो को रतन टाटा ने सालों इंतज़ार के बाद लांच किया था.
6. इकॉनोमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक जब से सायरस मिस्त्री टाटा संस चेयरमैन बने थे तबसे टाटा कंपनियों के शेयर डिविडेंड अनियमित हो गए थे. मिस्त्री ने इसका कारण ग्रुप कंपनियों पर कर्ज़ के बढ़ते भार को बताया. लेकिन डिविडेंड के सहारे जीवन बिता रहे कई लोगों पर इससे विपरीत असर पड़ा. ये लोग सायरस मिस्त्री के जाने से खुश हैं.
हटाने के तरीके पर सवाल
जिस तरीके से सायरस मिस्त्री को पद से हटाया गया, इसे लेकर कई विश्लेषकों, राजनीतिज्ञों ने नाराज़गी जताई है.
मणिपाल ग्लोबल एजुकेशन के मोहनदास पाई ने कहा उन्हें मिस्त्री को हटाने के तरीके से आश्चर्य है और निवेशकों के लिए ये चिंताजनक है.
समाचार चैनल एनडीटीवी से बातचीत में मिस्त्री परिवार की नज़दीकी और राजनीतिज्ञ सुप्रिया सूले ने कहा कि ये कहना गलत होगा कि मिस्त्री ने अच्छा काम नहीं किया.
सूले का कहना है कि जिस तरीके से उन्हें हटाया गया वो अपमानजनक था.
उधर टाटा ग्रुप के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने एनडीटीवी से कहा ये बोर्ड का अधिकार था कि वो किसे कंपनी का चेयरमैन नियुक्त करे और क़ानूनी तौर पर कतई ज़रूरी नहीं कि चेयरमैन को हटाने का कारण बताया जाए.
रतन टाटा का वापस आना कितना सही?
सायरस मिस्त्री को हटाने के बाद रतन टाटा को टाटा ग्रुप का अंतरिम चेयरमैन बनाया गया है.
रतन टाटा के समर्थक कह रहे हैं कि रतन टाटा का कंपनी प्रमुख के पद पर वापस आने से निवेशकों में भरोसा बरकरार रहेगा और डोकोमो जैसे विवादों से निपटने में टाटा ग्रुप को मदद मिलेगी. आखिर रतन टाटा का नाम एक जाना माना नाम है.
लेकिन दूसरा तर्क है कि अगर सायरस मिस्त्री को हटाना ही था तो किसी दूसरे युवा नेतृत्व को उनकी जगह लाया जा सकता था.
पत्रकार सुषमा रामचंद्रन कहती हैं, "निवेशक देख रहे हैं कि रतन टाटा तो पुरानी पीढ़ी के हैं. सायरस मिस्त्री अपनी चिट्ठी में दावा कर रहे हैं कि रतन टाटा ने कई ग़लत काम किए. टाटा ग्रुप में कई कंपनियां नुकसान उठा रही हैं और निवेशक सोच रहे हैं कि हम इनमें निवेश क्यों करें."
टाटा ब्रैंड पर कितना असर?
ब्रैंड टाटा को विश्वास और विश्वसनीयता से जोड़कर देखा जाता है. सुषमा रामचंद्रन कहती हैं कि टाटा ग्रुप में इस बात पर गर्व किया जाता है कि वो काम करवाने के लिए रिश्वत नहीं देंगे.
लेकिन सुषमा कहती हैं कि सायरस मिस्त्री ने टाटा ग्रुप में कथित गड़बड़ियों की ओर इशारा किया. इसके कारण इन कंपनियों को नुकसान हो रहा है. वो कहती हैं कि इस पत्र से निवेशकों के विश्वास पर असर पड़ेगा.
वो सवाल उठाती हैं, "अगर आपका कॉर्पोरेट गवर्नेंस इतना अच्छा है तो (टाटा ग्रुप की) कंपनियां नुकसान क्यों उठा रही हैं?"
उधर टाटा संस ने अपने पत्र में सायरस मिस्त्री के आरोपों को निराधार बताया है.
कंपनी ने लिखा है, अपने इतिहास में कंपनी को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा है लेकिन टाटा का तरीका परेशानियों से भागने का नहीं उनसे निपटने का है.
पीढ़ियों का टकराव?
सुषमा रामचंद्रन कहती हैं कि सायरस मिस्त्री की परिकल्पना भावनात्मक नहीं है और वो व्यापार को फ़ायदे और नुकसान के तराज़ू पर तौलते हैं. इसके विपरीत रतन टाटा की सोच अलग है.
वो कहती हैं, "सायरस मिस्त्री ये नहीं देख रहे कि रतन टाटा ने कोरस स्टील को खरीदा और इससे उनकी बहुत तारीफ़ हुई. वो देख रहे हैं कि कोरस नुकसान उठा रही है. इसका असर टाटा संस पर पड़ रहा है और इसे बेचना ही सही रास्ता है. रतन टाटा देख रहे हैं कि अरे, इसे मैंने कितनी मेहनत से खरीदा और और मिस्त्री इसे गंवा रहे हैं."
आप और हम पर क्या असर?
सुषमा रामचंद्रन बताती हैं कि रतन टाटा जब टाटा संस के चेयरमैन के पद से हटे तो उन्होंने एक मिसाल दी थी कि कैसे उन्होंने कंपनी को एक युवा नेतृत्व दिया था. लेकिन जो परिवार कंपनियों को चला रही हैं, उनके लिए वो मिसाल खत्म हो गया है. इसका असर सीधा आम व्यक्ति पर पड़ता है क्योंकि ये बड़ी कंपनियां हैं और इनमें ढेर सारा पैसा लगा है.