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मुलायम सिंह के पांच बड़े फ़ैसले
समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में कई अहम फ़ैसले लिए.
जवानी के दिनों में पहलवानी का शौक़ रखनेवाले मुलायम सिंह सक्रिय राजनीतिक में आने से पहले शिक्षक हुआ करते थे.
समाजवादी राजनेता राम मनोहर लोहिया के विचारों से प्रभावित रहे मुलायम सिंह ने अपने राजनीतिक सफ़र में पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यकों के हित की अगुवाई कर अपनी पुख्ता राजनीतिक ज़मीन तैयार की.
मुलायम सिंह ने राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश में 1967 में सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर सबसे कम उम्र में विधायक बनकर दमदार तरीके से अपने राजनीतिक करियर का आग़ाज़ किया था.
उसके बाद उनके राजनीतिक सफर में उतार-चढ़ाव तो आए लेकिन राजनेता के रूप में उनका क़द लगातार बढ़ता गया.
एक नज़र मुलायम सिंह के पांच महत्वपूर्ण फ़ैसलों पर -
1.अलग पार्टी - साल 1992 में मुलायम सिंह ने जनता दल से अलग होकर समाजवादी पार्टी के रूप में एक अलग पार्टी बनाई. तब तक पिछड़ा मानी जानेवाली जातियों और अल्प संख्यकों के बीच खासे लोकप्रिय हो चुके मुलायम सिंह का ये एक बड़ा क़दम था जो उनके राजनीतिक जीवन के लिए मददगार साबित हुआ. 2012 का विधानसभा चुनाव जीतने से पहले वो तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे और केंद्र की राजनीति में भी अहम भूमिका निभाते रहे.
2.अयोध्या में कार सेवकों पर गोली चलवाने का फ़ैसला - 1989 में मुलायम सिंह पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे. केंद्र में वी पी सिंह की सरकार के पतन के बाद मुलायम ने चंद्रशेखर की जनता दल (समाजवादी) के समर्थन से अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी बरकरार रखी. जब अयोध्या का मंदिर आंदोलन तेज़ हुआ तो कार सेवकों पर साल 1990 में उन्होंने गोली चलाने का आदेश दिया जिसमें एक दर्जन से ज्यादा लोग मारे गए थे. बाद में मुलायम ने कहा था कि ये फैसला कठिन था. हालांकि इसका उन्हें राजनीतिक लाभ हुआ था और उनकी मुस्लिम परस्त छवि बनी थी. उनके विरोधी तो उन्हें 'मुल्ला मुलायम' तक कहने लगे थे.
3.यूपीए सरकार को न्यूक्लियर डील में समर्थन - साल 2008 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार अमरीका के साथ परमाणु करार को लेकर संकट में आ गई थी जब वामपंथी दलों ने समर्थन वापस ले लिया था. ऐसे वक्त पर मुलायम सिंह ने मनमोहन सरकार को बाहर से समर्थन देकर सरकार बचाई थी. जानकारों का कहना था कि उनका ये क़दम समाजवादी सोच से अलग था और व्यवहारिक उद्देश्यों से ज़्यादा प्रेरित था.
4.अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने का फ़ैसला - साल 2012 में उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में 403 में से 226 सीटें जीतकर मुलायम सिंह ने अपने आलोचकों को एक बार फिर करारा जवाब दिया था. ऐसा लग रहा था कि मुलायम सिंह चौथी बार राज्य के मुख्यमंत्री पद की कमान संभालेंगे, लेकिन उन्होंने अपने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाकर समाजवादी पार्टी की राजनीति के भविष्य को एक नई दिशा देने की पहल कर दी थी. हालांकि उनके राजनीतिक सफ़र में उनके हमसफ़र रहे उनके भाई शिवपाल यादव और चचेरे भाई राम गोपाल यादव के लिए ये फ़ैसला शायद उतना सुखद नहीं रहा होगा. ख़ासतौर से शिवपाल यादव के लिए जो खुद को मुलायम के बाद मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक हक़दार मान कर चल रहे थे. लेकिन शायद यहीं समाजवादी पार्टी में उस दरार की शुरुआत हो गई थी, जिसका खाई रूप हमें आज देखने को मिल रहा है.
5.रामगोपाल की बर्खास्तगी - समाजवादी पार्टी में पिछले कुछ हफ्तों से जारी उठापटक में नया मोड़ तब आया जब रविवार को मुलायम सिंह ने अपने चचेरे भाई डॉक्टर रामगोपाल यादव को पार्टी से बर्खास्त कर दिया. समाजवादी खेमे में हाल के दिनों में तेज़ी से बदलते घटनाक्रम की ये सबसे नाटकीय परिणति थी जिसने मुलायम सिंह और उनके बेटे के बीच उभरे मतभेद को एकदम से सतह पर ला दिया है.