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सास-ससुर से अलग रहने की मांग, तलाक़ और क़ानूनी पक्ष
सुप्रीम कोर्ट ने तलाक़ के एक केस पर फ़ैसला सुनाया है जिसकी भारत में बड़ी चर्चा हो रही है. ऐसा इसलिए क्योंकि इस फ़ैसले का तलाक़ के कई तरह के मामलों पर असर पड़ेगा.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई पत्नी, पति को उसके परिवार से अलग रहने पर मज़बूर करती है तो ये तलाक पाने का एक आधार हो सकता है.
इस फैसले के अनुसार जीवनसाथी का खुदकुशी करने की धमकी देना और एक-दूसरे पर झूठे आरोप लगाना भी तलाक के लिए आधार बन सकता है.
मुंबई में वरिष्ठ वकील वंदना शाह तलाक़ के मुद्दे पर काफ़ी सक्रिय रही हैं. वो इस मुद्दे पर काफ़ी कुछ लिखती भी रही हैं.
तलाक़ के अन्य मामलों पर इस फ़ैसले का क्या असर होगा. वरिष्ठ वकील वंदना शाह की राय, उनकी ही ज़ुबानी-
"सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से लोग काफ़ी हिल गए हैं. इसमें एक तो क्रूरता के बारे में बात की गई है. भारत में तलाक के लिए केस करने में क्रूरता को आधार बनाना सबसे आम वजहों में से एक है.
इस फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने तीन बातों की चर्चा की है. सबसे पहले कोर्ट ने कहा है कि परिवार को एक साथ बनाकर रखना ही पति-पत्नी की ज़िम्मेदारी होती है.
पहली बात तो ये कि सारे परिवार को एक साथ जोड़ कर रखने को अहमियत दी गई है. लेकिन यदि पत्नी कहे कि पति सारे परिवार को छोड़कर मेरे साथ संसार बसाए...?
अदालत के मुताबिक दूसरी वजह यह हो सकती है कि पत्नी बार-बार कहती हो- "मैं आत्महत्या कर लूंगी," जैसा कि इस केस में था.
इस केस में आत्महत्या करने की उन्होंने एक बार कोशिश भी की थी, लेकिन पड़ोसियों ने उन्हें बचा लिया था.
तीसरी वजह- "पत्नी ने पति के चरित्र पर सवाल उठाए हो," जैसा कि इस मामले में हुआ था.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर इन तीनों मुद्दों को एक साथ लें तो पति को तलाक मिल जाना चाहिए.
मैं इस फ़ैसले को इस तरह से लूंगी कि अगर सास बहू का एक साथ रहना मुश्किल हो जाता है, तो इस मुद्दे पर मैं सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से सहमत नहीं हूं.
अगर हम आर्थिक स्थिति की बात करें और पति के पास एक अलग घर ख़रीदने के पैसे नहीं हैं तो वो किराए पर घर ले सकते हैं. इससे शादी के चलने की संभावना काफ़ी बढ़ जाती है.
लेकिन बाक़ी दोनों मुद्दों पर मैं सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से सहमत हूं. अगर पत्नी बार-बार आत्महत्या की धमकी दे तो पति को तलाक़ मिल जाना चाहिए.
पत्नी अगर पति के चरित्र पर भी बार-बार सवाल उठाए, तो भी पति का पत्नी के साथ रह पाना काफ़ी मुश्किल हो जाएगा.
इस फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह संभावना नहीं छोड़ी है कि आर्थिक रूप से अच्छी स्थिति होने पर बेटा मां-बाप के लिए अलग से बेहतर व्यवस्था कर दे और बीवी के साथ अलग होकर रह ले.
मुझे लगता है कि इस आधार पर यह फ़ैसला रिव्यू भी हो सकता है या फिर इसे चुनौती भी दी जा सकती है.
सुप्रीम कोर्ट के जजों ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि पति के मां-बाप का अपनी बहू के प्रति कष्ट और पीड़ा देना वाला बर्ताव था. कभी-कभी ऐसा भी होता है कि बहू को बेटी की तरह नहीं देखा जाता है.
कई बार ऐसी बातें भी सामने आती हैं कि सास-ससुर का अपनी बहू के प्रति बर्ताव अच्छा नहीं होता है, फिर भी बहू अपना घर बचाना चाहती है, तो ऐसे में यह फ़ैसला अपील में जाएगा.
भारतीय समाज के लोग आम तौर पर तलाक के पक्ष में नहीं होते हैं, बल्कि शादी बनाए रखने के पक्ष में होते हैं.
कई बार पत्नी एक झूठा एफ़आईआर दर्ज करवा कर पति और उनके परिवार को परेशान करती है. कई बार पति भी ऐसा करता है और वह कहता है कि मेरी पत्नी का चरित्र ठीक नहीं है, ये भी क्रूरता की श्रेणी में आएगा.
इस लिहाज़ से सुप्रीम कोर्ट के पुराने फ़ैसले बहुत अच्छे हैं कि आप बिना सोचे समझे एक याचिका पर कुछ भी नहीं लिख सकते.
मां बाप को साथ नहीं रखने का आधार बनाकर तलाक के लिए याचिका डाली जा सकती है, लेकिन कोर्ट ने साफ़ कहा है कि जहां आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं हो, वहां मां-बाप को अकेले नहीं छोड़ा जा सकता है.
इसलिए मुझे लगता है कि इस फ़ैसले का कोई दुरुपयोग नहीं होगा. "
(बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन के साथ बातचीत पर आधारित)
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