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भारत और पाकिस्तान की सरहद पर रहने वालों की तकलीफ़ें एक जैसी
- Author, विनीत खरे और शहज़ाद मलिक
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पंजाब सीमा के दोनों ओर से
भारत और पाकिस्तान के लोगों को सरहद भले ही अलग करती हो लेकिन कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' के बाद दोनों मु्ल्क के लोग एक ही तरह की तकलीफ़ों से गुज़र रहे हैं.
भारत के पंजाब और पाकिस्तानी पंजाब के कुछ सरहदी गाँवों का दौरा करने के बाद बीबीसी संवाददाताओं ने पाया कि दोनों ओर एक तरह की दहशत और एक तरह की अनिश्चितता बनी हुई है.
जिस तरह भारत के पंजाब में लोग अपने घर छोड़कर सुरक्षित जगहों पर जाने को मजबूर हुए हैं, पाकिस्तानी गाँवों में भी ठीक उसी तरह का दृश्य है.
बीबीसी संवाददाता शहज़ाद मलिक पाकिस्तानी गांव सकमाल गए. ये जगह नियंत्रण रेखा से ज़्यादा दूर नहीं है.
दिन ढलने को था. 50 साल के नज़ीर अहमद अपने घर के बच्चों को हिदायत दे रहे थे कि वे जल्दी करें और रात होने के पहले ही लौट आएं.
स्थानीय लोगों ने बीबीसी को बताया कि सरकारी अफ़सरों ने गांव के लोगों से कह दिया है कि वो यह इलाक़ा छोड़कर किसी सुरक्षित जगह चले जाएं.
गांव के बाशिंदे किसान हैं. वो खेती और पशुपालन करते हैं. सीमा पार से होने वाले गोलाबारी में उन्हें काफ़ी नुक़सान हो चुका है.
नज़ीर अहमद और उनके साथ के दूसरे लोग अपने गांव से क़रीब 15 किलोमीटर दूर एक दूसरे गांव में रह रहे हैं. आसपास के क़रीब सौ गावों के लोगों को पहले भी कई बार घर बार छोड़ दूसरी जगह जाना पड़ा है.
इस इलाक़े में जगह-जगह पर पाकिस्तान रेंजर्स के चेक पोस्ट बनाए गए हैं. रेंजर्स के लोग गांव के लोगों के लगातार संपर्क में रहते हैं.
ख़ुफ़िया सेवा के लोग भी इस इलाक़े में बाहरी तत्वों पर अपनी नज़र बनाए हुए हैं.
बीबीसी संवाददाता विनीत खरे भारतीय पंजाब में पाकिस्तान की सीमा से सटे कई गांवों में गए. उन्होंने पाया कि गांव ख़ाली कराने के सरकारी फ़ैसले का असर साफ़ दिख रहा है.
इससे लोग गुस्से में है. परेशान हैं. सरकार को कोस रहे हैं. लेकिन अपना गांव, घर-बार छोड़ कर जा भी रहे हैं.
सीमाई इलाक़ों में लोग बाग अपने अपने घरें में टीवी देख रहे हैं, पर वहां चुनिंदा हिंदी समाचार चैनल ही देखे जा रहे हैं.
लोगों की दिलचस्पी न गानों में है और न फ़िल्मों में. लोग दुकानों, घरों, होटलों और हर जगह समाचार चैनल देखते हुए मिले.
पाकिस्तानी सीमा पर बसे दाउके गांव के इंदरजीत सिंह अपना सामान एक गाड़ी में लाद रहे थे तब उनकी मुलाक़ात बीबीसी संवाददाता से हुई.
पास के ही गांव में मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल आए हुए थे. उनका हेलीकॉप्टर थोड़ी देर पहले ही वहां उतरा था. उसके आगे का सफ़र उन्होंने गाड़ी में तय किया.
यह पूछे जाने पर कि कौन कह रहा है कि कुछ हो सकता है, इंदरजीत सिंह ने कहा, "टीवी देखकर लग रहा है कि ख़तरा है, कुछ भी हो सकता है."
विश्लेषक और स्थानीय पत्रकारों ने बीबीसी से कहा कि जनता सरकार से नाराज़ है. भ्रष्टाचार के आरोपों और नशे के बढ़ते ख़तरों ने सरकार की छवि ख़राब की है.
अमृतसर जैसे महत्वपूर्ण शहर की हालत देखकर लगा कि यहां कितना काम होना बाक़ी है. अमृतसर शहर की हालत बेहद ख़राब है, अंदरूनी इलाक़ो में ज़्यादातर जगहों पर सड़के ही नहीं हैं, जो हैं भी, वो टूटी हैं.
स्वर्ण मंदिर के चारों ओर भारी काम चल रहा है, इससे लोगों को आने जाने में काफ़ी मुश्किल होती है.
स्थानीय लोगों ने बताया कि पिछले एक साल से काम चल रहा है. उनका कहना था कि ये काम चुनाव की वजह से हो रहा है.