दिल्ली दंगे: कपिल मिश्रा के ख़िलाफ़ दो शिकायतें, पर कोई FIR नहीं, अब स्पीच से भी इंकार- BBC Special

    • Author, कीर्ति दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

23 फ़रवरी की दोपहर, जाफ़राबाद-मौजपुर सीमा पर बीजेपी नेता और विधानसभा चुनाव में मॉडल टाउन सीट से उम्मीदवार रहे कपिल मिश्रा पहुँचते हैं. उनके पहुँचने से पहले उनके तमाम समर्थक और लोगों की भीड़ जमा रहती है. 'जय श्री राम के नारे' गूंजते हैं. कपिल मिश्रा लोगों को संबोधित करते हुए कहते हैं, "डीसीपी साहब हमारे सामने खड़े हैं, मैं आप सबके बिहाफ़ (की ओर से) पर कह रहा हूं, ट्रंप के जाने तक तो हम शांति से जा रहे हैं लेकिन उसके बाद हम आपकी भी नहीं सुनेंगे, अगर रास्ते ख़ाली नहीं हुए तो. ट्रंप के जाने तक आप (पुलिस) जाफ़राबाद और चांदबाग़ ख़ाली करवा लीजिए, ऐसी आपसे विनती है, वरना उसके बाद हमें रोड पर आना पड़ेगा."

जब कपिल मिश्रा तीन दिन का अल्टीमेटम देते हैं और पुलिस की भी ना सुनने की बात कर रहे थे तो उनके बग़ल में उत्तर पूर्वी दिल्ली के डिप्युटी कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (डीसीपी) वेद प्रकाश शौर्य मौजूद थे. लेकिन कपिल मिश्रा ने इसे स्पीच मानने से ही इंकार कर दिया है.

मैंने कोई स्पीच नहीं दी- कपिल मिश्रा

पुलिस की एफ़आईआर 59 यानी दिल्ली दंगों के पीछे साज़िश के मामले में दायर चार्टशीट के मुताबिक़ 28 जुलाई को कपिल मिश्रा से पूछताछ की गई जिसमें कपिल मिश्रा ने कहा कि उन्होंने कोई स्पीच नहीं दी.

कपिल मिश्रा ने कहा है- ''मैं उन लोगों की समस्याओं को पुलिस तक पहुँचाने और पुलिस की मदद से ब्लॉक रोड को खुलवाने की पेशकश के लिए वहां गया था. मैंने कोई स्पीच नहीं दी, केवल पुलिस को तीन दिन में रोड खुलवाने के लिए कहा था ताकि इलाक़े के लोगों की समस्याओं का निपटारा हो सके. मेरे बयान का अर्थ था कि रोड ख़ाली न कराने की सूरत में हम भी धरने पर बैठेंगे.''

शिकायतों पर FIR क्यों नहीं?

जिस दिन कपिल मिश्रा ने उस इलाक़े में जा कर रोड ख़ाली कराने का अल्टीमेटम दिया (जिसे अब वह भाषण मानने से इंकार कर रहे हैं.) उसी दिन यानी 23 फ़रवरी की शाम को उत्तर-पूर्वी दिल्ली जलने लगी. पूरे इलाक़े से एक के बाद एक हिंसा की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो सामने आने लगे. इसके साथ ही सोशल मीडिया पर इस विवादित भाषण की चर्चा शुरू हो गई, और एक तबक़े ने इस भाषण को हेट स्पीच और हिंसा भड़काने वाला बताया और कपिल मिश्रा की गिरफ़्तारी की माँग तेज़ हो गई. दंगों के लगभग सात महीने बाद भी कपिल मिश्रा को लेकर हुई तमाम शिकायतों के बावजूद कुल 751 एफ़आईआर में एक भी एफ़आईआर ऐसी नहीं है जो कपिल मिश्रा के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस ने दर्ज की हो.

बल्कि अब पुलिस ने दंगों से जुड़ी FIR 59 की चार्जशीट में लिए गए कपिल मिश्रा के बयान के ज़रिए ये बताया है कि उन्होंने स्पीच दी ही नहीं.

पहली शिकायत- ''सबक़ सिखाना है ताकि प्रोटेस्ट भूल जाएं- कपिल मिश्रा''

बीबीसी के पास ऐसी दो शिकायतों का कॉपी हैं जिनमें शिकायतकर्ताओं ने बीजेपी नेता कपिल मिश्रा का नाम लिया है और उनपर कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं लेकिन दंगों के लगभग सात महीने के बाद भी इन शिकायतों के आधार पर एफ़आईआर दर्ज नहीं की गई है.

जबकि क़ानून के तहत अगर कोई अपराध प्रथम दृष्टया कॉग्निज़ेबल अपराध (गंभीर व जिसमें गिरफ़्तारी के लिए पुलिस को वारंट की ज़रूरत नहीं होती) हैं तो ऐसे में पुलिस एफ़आईआर करने के लिए बाध्य होती है. लेकिन जिन शिकायतकर्ताओं ने कपिल मिश्रा के नाम वाली शिकायत दर्ज कराई है उन्होंने बीबीसी को बताया है कि पुलिस ने पहले तो उनकी शिकायत दर्ज करने से भी मना कर दिया था. हालांकि बाद में ये शिकायतें तो दर्ज हो गईं लेकिन इनका संज्ञान लेकर अब तक एफ़आईआर दर्ज नहीं हुई.

बीबीसी ने दिल्ली पुलिस को ऐसे ही सवालों की एक लिस्ट भेजी है जिनका हमें अब तक कोई जवाब नहीं मिला है. ये जवाब हमें जैसे ही मिलेंगे ये कहानी जवाबों के साथ अपडेट की जाएगी.

कमिश्नर और गृह मंत्रालय को है शिकायत की जानकारी

इनमें से यमुना विहार के रहने वाले एक शिकायतकर्ता ज़मी रिज़वी ने 24 फ़रवरी को एक शिकायत लिखी और इसे दिल्ली पुलिस कमिश्नर, गृह मंत्रालय, प्रधानमंत्री ऑफ़िस और दिल्ली के उप-राज्यपाल के दफ़्तर को भेजा.

इसमें लिखा है- 23 फ़रवरी, 2020 को 20-25 लोगों का एक झुंड नारे लगा रहा था, जिनके हाथों में बंदूक़ें, त्रिशूल, डंडे थे.

कपिल मिश्रा तुम लठ्ठ बजाओ, हम तुम्हारे साथ हैं

लंबे-लंबे लठ्ठ बजाओ, हम तुम्हारे साथ हैं

खींच-खींच कर लठ्ठ बजाओं, हम तुम्हारे साथ हैं

मुल्लों पर भी लठ्ठ बजाओ, हम तुम्हारे साथ हैं

च.....रों पर तुम लठ्ठ बजाओ, हम तुम्हारे साथ हैं

रिज़वी की इस शिकायत में आगे लिखा है, ''इसके कुछ देर बाद कपिल मिश्रा अपने कुछ और साथियों के साथ जिनके हाथों में भी बंदूक़ें, तलवारें, त्रिशूल, डंडे, पत्थर, बोतलें वग़ैरह थे आए. वहां खड़े होकर कपिल मिश्रा ने भड़काऊ भाषण देना शुरू कर दिया. जिसमें उसने कहा- यह हमारे घर के टॉयलेट साफ़ करने वालों को क्या अब हम अपने सिर पर बैठाएंगें, इसके जवाब में लोगों ने चिल्लाकर कहा 'बिल्कुल नहीं.' इसके बाद कपिल मिश्रा ने कहा- यह मुल्ले पहले तो CAA-NRC को लेकर प्रोटेस्ट कर रहे थे और अब यह आरक्षण के लिए भी प्रोटेस्ट करने लगे हैं, अब तो इन्हें सबक़ सिखाना ही पड़ेगा.''

ज़मी रिज़वी ने 18 मार्च को कड़कड़डूमा के मैट्रोपॉलिटेन कोर्ट का दरवाज़ा भी खटखटाया और कोर्ट से आग्रह किया है कि सीआरपीसी 156(3) के तहत कोर्ट एफ़आईआर दर्ज करने के निर्देश दे लेकिन अब तक इस मामले में कुछ नहीं हो सका है.

रिज़वी ने अपनी शिकायत में ये भी लिखा है कि ''मिश्रा के भाषण को सुनते ही उनके साथियों ने प्रदर्शनकारियों पर पत्थरों से कर्दमपुरी में हमला कर दिया. पुलिस की मौजूदगी में मुसलमानों और दलितों को देशद्रोही, मुल्ले और जातिसूचक शब्द कहे गए. गाड़ियां तोड़नी शुरू कर दी गईं. इन सब लोगों को कपिल मिश्रा हाथ में बंदूक़ लहरा कर कह रहा था- छोड़ना नहीं है इन सालों को आज, ऐसा सबक़ सिखाना है कि यह प्रोटेस्ट करना ही भूल जाएं.''

एक ख़ास बात ये भी है कि इस अप्लीकेशन पर दिल्ली पुलिस कमिश्नर का 24 फ़रवरी की तारीख़ के साथ रिसीविंग स्टैंप है. यानी 24 फ़रवरी को दिल्ली पुलिस को ये अप्लीकेशन मिल गई थी और दिल्ली पुलिस के कमिश्नर को इसकी जानकारी है.

इतना ही नहीं इस अप्लीकेशन को गृह मंत्रालय ने भी रिसीव किया है जिसका मतलब है कि गृहमंत्रालय को भी इसकी जानकारी है.

रिज़वी की शिकायत में ये भी लिखा है कि- ''हद तो तब हो गई जब कपिल मिश्रा ने डीसीपी के सामने प्रोटेस्ट ख़त्म करने की धमकी दी. उसके बाद डीसीपी साहब ने गलियों में घूम-घूम कर लोगों को धमकाया कि हमें ऊपर से आदेश हैं कि दो दिन बाद क्षेत्र में कोई प्रोटेस्ट नहीं होना चाहिए और अगर तुमने प्रोटेस्ट ख़त्म नहीं किए तो यहां दंगे होंगे ना तुम बचोगे ना ही ये प्रोटेस्ट. ''

''कपिल मिश्रा व उसके साथियों ने कर्दमपुरी, ज़ाफ़राबाद, मौजपुर इलाक़े में अल्पसंख्यकों और दलितों को चिन्हित करके पकड़-पकड़ कर मारा है. कृपया दोषियों के साथ उचित धाराओं में एफ़आईआर करके सख़्त क़ानूनी कार्रवाई की जाए. ''

कपिल मिश्रा ने बीबीसी को क्या जवाब दिया?

हमने इन आरोपों के जवाब जानने के लिए बीजेपी नेता कपिल मिश्रा से संपर्क किया. उन्होंने बीबीसी को जवाब देते हुए कहा- "कुछ लोगों ने मेरे खिलाफ़ शिकायत दर्ज कराई है लेकिन मैं साफ़ कर दूं कि ये एफ़आईआर नहीं है बस कंप्लेन है. अपनी प्रथमिक जाँच में दिल्ली पुलिस ने पाया है कि ये शिकायतें झूठी और आधारहीन हैं. पुलिस कोर्ट में एक हलफ़नामें में अपना जवाब दे चुकी है. जिन लोगों ने इन दंगों को कराया है वो आए दिन पकड़े जा रहे हैं. ताहिर हुसैन और उनके साथी उमर ख़ालिद और ख़ालिद सैफ़ी पुलिस की गिरफ़्त में हैं. अब एक लॉबी दोषियों से ध्यान भटकाने के लिए मुझे टारगेट कर रही है, ये शिकायतें उन्हीं का हिस्सा हैं?"

लेकिन जब हमने ये पूछा कि क्या उन्हें दिल्ली पुलिस की ओर से बुलाया गया है कभी पूछ-ताछ के लिए तो इसके जवाब में उन्होंने हां कहा. लेकिन जब हमने और जानकारी माँगी तो हमें कोई जवाब नहीं मिला.

दूसरी शिकायत- ''आज ज़िंदगी से ही आज़ादी दे देंगे''

रिज़वी की ये शिकायत अकेली नहीं है. चांद बाग़ की रहने वाली रुबीना बानो का कहना है कि अपनी शिकायत दर्ज करने जब वह थाने गईं तो उनकी शिकायकत नहीं दर्ज की गई. इसके बाद 18 मार्च को उन्होंने मुस्तफ़ाबाद के ईदगाह पर लगाए गए दिल्ली पुलिस के शिकायत केंद्र जाकर अपनी शिकायत दर्ज कराई. मुस्तफ़ाबाद में ईदगाह को दंगा पीड़ितों के लिए एक शिविर में तब्दील किया गया था.

आज तक इस शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने एफ़आईआर दर्ज नहीं की है. इस कंप्लेन को 19 मार्च को दयालपुर थाने में रिसीव किया गया है. रूबीना का आरोप है कि उन्हें और उनके परिवार को अपनी शिकायत में लिए गए नामों के कारण डराया-धमकाया जा रहा है. साथ ही उसे केस में फँसाने की धमकी भी दी जा रही है.

चांद बाग़ की रहने वाली रूबीना बानो ने 18 मार्च को लिखी गई शिकायत में कहा है, ''24 फ़रवरी 2020, सोमवार को, सुबह 11 बजे मैं धरना स्थल पर पहुँची तो वहां सारे पुलिस वाले व मिलिट्री के कपड़ों में काफ़ी सारे पुलिस वाले व एसीपी अनुज शर्मा, एसएचओ दयालपुर के साथ औरतों से बहस कर रहे थे, अपशब्द कह रहे थे और ये भी कह रहे थे कि आज तुम्हें ज़िंदगी से ही आज़ादी दे देंगे.''

''मैंने एसीपी अनुज कुमार से पूछा कि हम तो चुपचाप शांति से प्रदर्शन कर रहे हैं तो आप हमें क्यों उल्टा सीधा बोल रहे हो तो वो बोले कपिल मिश्रा और उसके लोग आज तुम्हें यहीं तुम्हारी ज़िंदगी से आज़ादी देंगे और फिर इतने में एसएचओ दयालपुर (तलकेश्वर) तेज़ी से आए और आकर फ़ोन देते हुए बोले कि साहब कपिल मिश्रा जी का फ़ोन है उनसे बात करते हुए एसीपी जी-जी बोल रहे थे और फिर फ़ोन रखते हुए बोले फ़िक्र मत करो लाशें बिछा देंगे इनकी पुश्तें याद रखेंगी. इसके बाद पुलिस वालों के साथ हमलावरों ने औरतों पर हमला शुरू कर दिया.''

शिकायत मिली लेकिन FIR नहीं दर्ज की- पुलिसकर्मी

बीबीसी ने दयालपुर थाने में कार्यरत एक पुलिस वाले से मुलाक़ात की. नाम ना छापने की शर्त पर उसने कहा, ''इस मामले में एफ़आईआर नहीं हुई है. जब 144 लगा था तो उस महिला को बाहर नहीं आना चाहिए था अगर उसे चोट लगी तो उसका ज़िम्मेदार कौन हो सकता है. हम उस महिला की भूमिका की भी जाँच कर रहे हैं."

बीबीसी ने ये पूछा कि जैसा कि शिकायतकर्ता ने आरोप लगाए हैं वह कॉग्निज़ेबल अपराध हैं ऐसे में दंड संहिता के मुताबिक़ एफ़आईआर तो दर्ज होनी चाहिए इस पर पुलिसकर्मी ने कहा, ''हां एफ़आईआर 60 इसी घटना की है.'' जब बीबीसी ने ये बताया कि एफ़आईआर 60 दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल शर्मा की हत्या से जुड़ी एफ़आईआर है और क्या इसमें शिकायतकर्ता रूबीना बानो की ओर से कपिल मिश्रा और एसीपी पर लगाए गए आरोपों की जाँच हुई है?

इस सवाल पर पुलिसकर्मी कुछ सेकेंड चुप रहे फिर बोले आपने देखा वो वीडियो जिसमें रतनलाल शर्मा पर हमला हुआ? हमने वो एफ़आईआर की है चार्टशीट भी फ़ाइल की गई है.

बीबीसी ने एफ़आईआर 60 की चार्टशीट पढ़ी है और इसमें योगेंद्र यादव, शाहीन बाग़ में लंगर लगाने वाले डी.एच बिंद्रा सहित कई जाने-माने बुद्धिजीवियों का नाम लिया गया है लेकिन कहीं भी शिकायतकर्ता रूबीना बानो का नाम या कपिल मिश्रा का नाम या फिर एसीपी अनुज कुमार के नाम का ज़िक्र तक नहीं किया गया है.

बीबीसी ने पुलिस वाले से एक बार फिर पूछा कि क्या रूबीना बानो की शिकायत पर कोई एफ़आईआर हुई है तो इस बार पुलिस वाले ने बताया- शिकायत हमें मिली है, हमने एफ़आईआर नहीं की.

मुझे-मेरे परिवार को डराया-धमकाया जा रहा -रूबीना

साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने ललिता कुमारी बनाम यूपी सरकार केस में फ़ैसला सुनाते हुए ये साफ़-साफ़ कहा था कि अगर शिकायत में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया कॉग्निज़ेबल अपराध (गंभीर, ऐसे अपराध जिसमें पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तारी कर सके) हैं तो पुलिस अधिकारी को एफ़आईआर दर्ज करनी ही होगी.

रूबीना बानो ने अपनी शिकायत में ये भी कहा है कि ''एसएचओ साहब कह रहे थे कि बिना नाम के कंप्लेंट करो, यह हम नहीं लेंगे और उल्टा मुझे केस में फँसाने की धमकी देने लगे.''

इस मामले में रूबीना बानो ने दिल्ली हाई कोर्ट में मैंडेमस रिट यानी परमादेश की याचिका दायर की है. परमादेश रिट याचिका के तहत अगर कोई लोक अधिकारी अपने कर्तव्यों के निर्वहन से इंकार करे तो इस रिट के तहत किसी लोक पद के अधिकारी, अधीनस्थ न्यायालय या निगम के अधिकारी को हाई कोर्ट ये आदेश दे सकता है कि वह उसे सौंपे गए कर्तव्य का पालन सुनिश्चित करे.

रूबीना ने अपनी रिट याचिका में लिखा है कि उन पर मार्च से लेकर जुलाई तक स्थानीय पुलिस ने डरा कर क़ानूनी कार्रवाई करने की धमकी देते हुए शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया.

रूबीना के मुताबिक़ 25 जुलाई को उनके पति को एक शख़्स ने बंधक बनाया और उन्हें धमकाते हुए कहा कि अगर रूबीना ने शिकायत वापस नहीं ली तो उनके परिवार को परिणाम भुगतना होगा.

कपिल मिश्रा के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं- दिल्ली पुलिस

13 जुलाई को दिल्ली पुलिस ने नेताओं के ख़िलाफ़ एफ़आईआर से जुड़ी याचिकाओं पर एक हलफ़नामा देते हुए कहा था, ''अब तक उन्हें ऐसे कोई सबूत नहीं मिले हैं जिनके आधार पर ये कहा जा सके कि नेताओं ने किसी भी तरह लोगों को 'भड़काया हो या दिल्ली में दंगे करने के लिए उकसाया हो.''

''अगर कोई ऐसा सबूत मिलता है जिसमें कथित आपत्तिजनक भाषण का अपराध से कोई लिंक सामने आए तो उचित एफ़आईआर दर्ज की जाएगी.''

यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि 23 फ़रवरी और 24 फ़रवरी की घटनाओं को लेकर कपिल मिश्रा के नाम वाली शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने कोई एफ़आईआर दर्ज नहीं की है. ये तथ्य है कि 23 फ़रवरी को कपिल मिश्रा के भाषण देने के बाद शाम को पहली हिंसा की ख़बर सामने आई.

FIR पर तुषार मेहता के तर्क और जस्टिस मुरलीधर की फटकार

26 फ़रवरी, हर्ष मंदर और फ़राह नक़वी की एक याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस एस. मुरलीधर और जस्टिस तलवंत सिंह ने सुनवाई शुरू की. ये याचिका आपत्तिजनक बयान देने वाले बीजेपी के तीन नेताओं- कपिल मिश्रा, बीजेपी सांसद परवेश वर्मा और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर की तुरंत गिरफ़्तारी को लेकर थी.

इसकी सुनवाई चीफ़ जस्टिस को करनी थी चूंकि इस मामले में तुरंत सुनवाई की माँग की गई थी ऐसे में ये मामला जस्टिस मुरलीधर के पास आया.

सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट को बताया कि दिल्ली के उपराज्यपाल ने दिल्ली पुलिस के वकील के तौर पर उन्हें चुना है. हालांकि दिल्ली सरकार के वकील राहुल मेहरा ने इस पर आपत्ति जताई थी क्योंकि नियमों के मुताबिक़ ये फ़ैसला मंत्रियों की काउंसिल मिल कर करती है.

साथ ही इस मामले में केंद्र सरकार कोई पार्टी नहीं थी ऐसे में एसजी के केस में शामिल होने पर सवाल उठाए गए.

तुषार मेहता ने कोर्ट से कहा, ''बीजेपी नेताओं के कथित हेट स्पीच को लेकर गिरफ़्तारी करना अभी ज़रूरी नहीं है. इसके लिए कल चीफ़ जस्टिस का इंतज़ार किया जा सकता था.''

इसके जवाब में जस्टिस मुरलीधर ने तुषार मेहता से पूछा था, "क्या दोषियों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज होना ज़रूरी मुद्दा नहीं लगता आपको? दिल्ली की हालत बेहद ख़राब है. हमें ये तय करना होगा कि क्या अति आवश्यक है."

"सैकड़ों लोगों ने वो वीडियो देखा है, क्या आपको अब भी ये मुद्दा अत्यधिक ज़रूरी नहीं लगता?''

इस सवाल पर कोर्ट में तुषार मेहता ने कहा कि उन्होंने वीडियो नहीं देखा है. जस्टिस मुरलीधर ने ये सवाल कोर्ट में मौजूद पुलिस अधिकारी से पूछा जिस पर अधिकारी ने कहा कि उसने कपिल मिश्रा का वीडियो नहीं देखा है.

जस्टिस ने इस जवाब पर कहा, ''ये चिंता की बात है कि आपके दफ़्तर में इतनी टीवी होने के बावजूद पुलिस ये कह रही है कि उसने वीडियो नहीं देखा. दिल्ली पुलिस का ये रवैया हैरान करने वाला है.''

इसके बाद जस्टिस के निर्देश पर कपिल मिश्रा, परवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर के भाषणों की क्लिप कोर्ट में सुनाई गई.

सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा कि एफ़आईआर रजिस्टर करने का ये उचित समय नहीं है.

इस बात पर जस्टिस मुरलीधर ने पूछा, ''उचित समय कौन सा होगा, ये शहर जल रहा है?''

इसका जवाब देते हुए सॉलिसिटर जनरल ने कहा, "स्थिति अनुकूल होने पर एफ़आईआर दर्ज किया जाएगा."

इसके बाद जस्टिस मुरलीधर की कोर्ट ने कहा, "दिल्ली पुलिस एफ़आईआर दर्ज करने को लेकर ''कॉन्शियस डिसिज़न'' ले.

इसके बाद देर रात केंद्र सरकार ने एक आदेश जारी किया और जस्टिस मुरलीधर का ट्रांसफ़र पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में कर दिया गया. अगले दिन इस याचिका की सुनवाई दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस डी.एन पटेल की कोर्ट में की गई और जैसा कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का कहना था कि इस मामले को अति-आवश्यक मुद्दे की तरह तरजीह ना दी जाए कोर्ट ने इसी पक्ष में बातें कहीं.

दिल्ली पुलिस के आंकड़े और निष्पक्षता के दावों के बीच विरोधाभास

पूर्व आईपीएस अधिकारी जूलियो फ्रांसिस रिबेरो ने चिट्ठी लिख कर दिल्ली पुलिस की जाँच पर सवाल उठाए, उन्होंने कहा, "हमारी जाँच तथ्यों और सबूतों पर आधारित होती है. यह इससे प्रभावित नहीं होती कि जाँच के दायरे में आया शख़्स कितना नामी है या कितने बड़े व्यक्तित्व वाला है."

दिल्ली पुलिस के कमिश्नर एस.एन श्रीवास्तव ने रिबेरो की चिट्ठी का जवाब देते हुए कुछ आंकड़े पेश किया. जिसके मुताबिक़ दिल्ली दंगों में 410 एफ़आईआर मुस्लिमों की शिकायतों के आधार पर दर्ज की गई हैं और 190 हिंदू शिकायतकर्ताओं के कहने पर दर्ज की गई हैं.

इससे पहले 13 सितंबर को दिल्ली पुलिस ने एक प्रेस रिलीज़ जारी की थी और यहां भी कुछ आंकड़े बताए गए थे कि कुल 751 एफ़आईआर में से 250 एफ़आईआर में चार्जशीट फ़ाइल की गई है और 1153 लोग अभियुक्त बनाए गए हैं, जिनमें 571 हिंदू और 582 मुस्लिम हैं.

यानी हिंदुओं की एफ़आईआर की संख्या 190 है जैसा कि ये एक सांप्रदायिक हिंसा का मामला था तो ऐसे में ये माना जा सकता है कि हिंदुओं ने अपनी एफ़आईआर में मुसलमानों पर आरोप लगाया होगा. यानी 190 एफ़आईआर के आधार पर 582 मुसलमानों को अभियुक्त बनाया गया है और मुस्लिम समुदाय के 410 शिकायतों पर आधारित 410 एफ़आईआर पर 571 लोगों को अभियुक्त बनाया गया है.

13 जुलाई को हाईकोर्ट में दायर दिल्ली पुलिस के हलफ़नामे के मुताबिक़, मारे गए लोगों में से 40 मुसलमान और 13 हिंदू थे.

यानी दिल्ली पुलिस के ये आंकड़े कह रहे हैं कि मरने वालों की संख्या भी मुसलमानों की अधिक है और अपेक्षाकृत संख्या में कम एफ़आईआर होने पर भी अभियुक्त मुस्लिम समुदाय के ही ज़्यादा हैं. यानी अगर ये सारे आंकड़े और तथ्य माने जाएं तो दिल्ली हिंसा में मुसलमानों ने अपने ही धर्म के लोगों को हिंसा में मारा है?

ये सवाल जब मैंने दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी से पूछा तो उसने जवाब दिया, ''आप कोर्ट में जाएं और क़ानून के तहत हम वहां जवाब देंगे.''

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