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आम होना ज़्यादा ख़ास है: शाहरुख़ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
शाहरुख़ खान या कहें कि सुपरस्टार शाहरुख़ खान एक ऐसे अभिनेता हैं जिन्होंने दिल्ली के एक आम शख्स से हिंदी सिनेमा के बेहद ख़ास अभिनेता बनने तक का सफ़र तय किया है. पिछले हफ़्ते उनकी फ़िल्म बिल्लू रिलीज़ हुई जिसकी कहानी भी एक आम इंसान की और कैसे वो आम होकर भी बनता है एकदम ख़ास. बतौर पत्रकार शाहरुख़ का इंटरव्यू करना अलग तरह का अनुभव रहता है क्योंकि उनकी सूझबूझ और हाज़िरजवाबी ऐसी होती है कि वे सामने वाले से एक क़दम आगे रहते है जिससे बातचीत का लुत्फ़ और चुनौती दोनों दोगुनी हो जाती है. सर्जरी से तीन दिन पहले शाहरुख़ लंदन आए थे.लंदन में हुए इंटरव्यू में शाहरुख़ ने अपनी फ़िल्म, पुराने दोस्तों समेत कई यादों को टटोला. फ़िल्म बिल्लू की टैगलाइन है कि इट्स स्पेशल टू बी ऑर्डिनरी यानी आम होना भी बहुत ख़ास होता है. आप इस बात में यक़ीन रखते हैं? मुझे लगता है कि आम इंसान होना, आम काम करना, आम चीज़ों का शौक रखना बहुत ख़ास होता है क्योंकि कोई भी चीज़ ख़ास अपने आप पैदा नहीं होती. आम चीज़ को प्यार करें या आम तरह से ज़िंदगी जीएँ, यही चीज़ें स्पेशल बन जाती हैं. शुरुआत हर चीज़ की आम ही होती है. मैं तो यही मानता हूँ कि आम होना ज़्यादा ख़ास है क्योंकि ख़ास तो आप बाद में बनते हैं पहले तो आप साधारण ही होते हैं. बिल्लू दो दोस्तों के मिलने की भी कहानी भी है- एक आम इंसान है और दूसरा अब सुपरस्टार बन गया है. क्या आपको मौका मिलता है उन दोस्तों से मिलने का जो उस समय आपके साथ थे जब आप सुपरस्टार नहीं थे?
दोस्त शोहरत या ओहदे पर आधारित नहीं होते. स्कूल के समय के कई दोस्त हैं, कुछ यहाँ फ़िल्मों में काम करते-करते बने हैं. कहीं पर भी ये बात आड़े नहीं आती कि मैं एक्टर हूँ. मेरे दोस्त भी अपने-अपने क्षेत्र में बहुत कामयाब हैं फ़र्क़ यही है कि वो टीवी पर नहीं आते, अख़बार में नहीं आते. फ़िल्मस्टार को लोग कामयाब इसलिए समझते हैं क्योंकि वे टीवी पर दिखते हैं. कामयाबी तो बहुत निजी मामला है. मेरे दोस्तों से अब भी मेरा बहुत प्यार है और हम मिलते हैं. जब भी मिलते हैं तो वहीं से शुरुआत होती है जहाँ से चीज़ें छोड़ी थीं. दुनियादारी के हिसाब मैं बहुत अच्छा नहीं हूँ, ज़्यादा संपर्क में नहीं रहता हूँ लेकिन मेरे दोस्त इस बात को समझते हैं और वो भी ऐसे ही हैं. बचपन के चार-पाँच दोस्त हैं, बड़े होने के बाद नए दोस्त बने हैं वो सब बहुत अज़ीज़ हैं. आप अभिनेता के साथ-साथ अब निर्माता भी हैं. बतौर निर्माता जब किसी फ़िल्म के लिए हाँ कहते हैं तो किन बातों पर ग़ौर करते हैं? बतौर अभिनेता और बतौर निर्माता जब मैं किसी फ़िल्म के लिए हाँ कहता हूँ तो ये सोचकर कि वो कहानी थोड़ा मनोरंजन करेगी, थोड़ी ख़ुशी देगी, थोड़ा सा नाच-गाना होगा, हँसी-मज़ाक होगा और जब लोग घर जाएँगे तो कुछ घर ले जाने वाली बात होगी उस फ़िल्म में. यही बातें ध्यान में रखता हूँ. इरफ़ान खान के साथ शायद आपने पहली बार काम किया है. किस तरह की केमिस्ट्री रही उनके साथ? स्लमडॉग मिलियनेयर में भी इरफ़ान हैं, फ़िल्म के बारे में आपकी क्या राय है
इरफ़ान बहुत ही बेहतरीन अभिनेता हैं. शूटिंग से पहले मैं एक-दो बार ही मिला था उनसे लेकिन फिर एक साथ काम किया और सेट्स पर काफ़ी वक़्त एक साथ गुज़ारा. हालांकि फ़िल्म में ज़्यादा सीन साथ में नहीं हैं. इरफ़ान चुपचाप खामोशी से अपना काम करते रहते हैं, उनका सेंस ऑफ़ ह्मूमर ग़ज़ब का है.स्लमडॉग मिलियनेयर मुझे काफ़ी पसंद आई. निर्देशक डैनी ब्यॉएल का काम बहुत ही पसंद आया, वे मेरे दोस्त भी हैं. फ़िल्म बिल्लू के नाम को लेकर विवाद हुआ- बिल्लू बारबर से बिल्लू दरअसल हेयरड्रेसर्स को बारबर शब्द पसंद नहीं था. हमने सोचा कि उनको क्यों दुख पहुँचाए तो हमने हटा दिया नाम. बुरा तो लगता है कि फ़िल्म के रिलीज़ के मौके पर ऐसी कोई हरकत हो जाए. लेकिन हमारे दिल में, दिमाग़ में ऐसी कोई बात नहीं थी कि किसी को आपत्ति हो. आप इतने लंबे अरसे से फ़िल्मों में काम कर रहे हैं. क्या फ़िल्म रिलीज़ होने के दिन घबराहट होती है या इतने सालों के अनुभव के बाद वो छू मंतर हो गई है?
हर फ़िल्म के साथ एक जुड़ाव होता है. एक-डेढ़ साल तक आप उस फ़िल्म के साथ जुड़े होते हैं. शुक्रवार वो दिन होता है जब फ़िल्म की किस्मत तय होती है और वो दिन भी होता है जब हमें फ़िल्म को छोड़कर आगे बढ़ना होता है. तो जिस दिन किसी ऐसी चीज़ को छोड़ना पड़ता है जो प्यारी होती है, जो अच्छी लगती है और जिसे प्यार से बनाया गया होता है तो उस दिन दुख भी होता है लेकिन उत्साह भी रहता है क्योंकि एक नई चीज़ की शुरुआत होने वाली है. हर शुक्रवार मेरे लिए उत्साह से भरा हुआ, दिलचस्प, रोमांचक होता है और साथ में बहुत सारी घबराहट भी लेकर आता है. वेलेन्टाइन डे था 14 फ़रवरी को. आप मनाते हैं ये दिन? मैं तो नहीं मनाता वेलेन्टाइन डे लेकिन मुझे लगता है कि कोई भी त्योहार हो तो लोग ख़ुशी और प्यार से मनाएँ. होली है, दीवाली है वैसे ही वेलेन्टाइन डे भी एक दिन है, लोग दोस्तों से मिलें और प्यार करें. मैं तो वेलेन्टाइन डे तभी मनाउंगा जब मेरी फ़िल्म हिट हो जाएगी. | इससे जुड़ी ख़बरें 'शाहरुख़ के बंगले पर बोतलें फेंकीं'13 फ़रवरी, 2009 | मनोरंजन एक्सप्रेस ये कैसा मुक़ाबला06 फ़रवरी, 2009 | मनोरंजन एक्सप्रेस रब को मिली अच्छी ओपनिंग12 दिसंबर, 2008 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'अल्लाह और मुल्ला का इस्लाम'06 दिसंबर, 2008 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'मेरे जीवन का अहम हिस्सा है पाकिस्तान'30 जून, 2008 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'चक दे इंडिया' का लंदन में प्रीमियर10 अगस्त, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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