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बॉलीवुड को हो रहा है राजनीतिज्ञों से फ़ायदा | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विपुल शाह की फ़िल्म 'सिंह इज़ किंग' को मुफ़्त में भारी पब्लिसिटी मिल गई है और ऐसा हुआ है भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की वजह से. चौंक गए न आप. जी हाँ, मनमोहन सिंह के संसद में विश्वास प्रस्ताव पर जीत हासिल करने के बाद सिंह इज़ किंग जुमले का उनके लिए इतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ. इससे फ़िल्म के प्रचार को ज़बरदस्त बल मिला है. विश्वास मत जीतने के बाद जीत की खुशी का इज़हार करने के लिए फ़िल्म के गाने बजाए गए. गानों से फ़िल्म को दर्शकों तक पहुंचने में ज़बरदस्त कामयाबी मिली है. फ़िल्म विश्लेषकों का कहना है कि इस काम के लिए फ़िल्म के प्रोड्यूसर को करोड़ों रुपए खर्च करने पड़ते. फ़िल्म लेखक संजय चौहान भी कहते हैं कि जिस तरह से विश्वास मत में जीत के बाद इस फ़िल्म के टाइटल का प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए इस्तेमाल हुआ है उससे फ़िल्म की पब्लिसिटी पर काफ़ी असर पड़ेगा. इस फ़िल्म में काम कर चुकीं चर्चित अभिनेत्री नेहा धूपिया का भी कुछ यही विचार है.
वैसे देखा जाए तो राजनीति से फ़िल्मों का रिश्ता काफ़ी पुराना है. फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रम्हात्मज भी मानते हैं कि ये काफ़ी पहले से होता रहा है. वो कहते हैं कि अगर आप पीछे निगाह डालें तो पंडित नेहरु के दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद से अच्छे संबंध थे. नरगिस के साथ भी उनके पारिवारिक संबंध थे और उन्होंने नरगिस को संसद का सदस्य भी बनवाया था. वो इन लोगों की फ़िल्में भी देखते थे लेकिन राजनीति ने पहले कभी फ़िल्मों का इतना सहारा नहीं लिया था जितना कि आजकल के दौर में हो रहा है. संसद में हाल ही में हुए विश्वात मत के दौरान एक बात जिसने सबका ध्यान अपनी तरफ़ खींचा वो था रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव का भाषण. संसद के गरमाते माहौल में लालू के दिलचस्प बयानों ने अलग ही रंग भर दिया. लालू ने वामदलों से अपने रिश्ते की बात करते हुए कहा, 'सौ साल पहले हमें तुमसे प्यार था, आज भी है और कल भी रहेगा'. ये गाने की पंक्तियां देव आनंद की फ़िल्म 'जब प्यार किसी से होता है' की हैं. उन्होंने लेफ्ट के यूपीए की तरफ़ रवैये के बारे में चुटकी लेते हुए कहा, 'तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं, तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी'. ये पंक्तियां राजकपूर की फ़िल्म 'दिल ही तो है' की हैं. अभी हाल ही में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने अमेठी में अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए इंदिरा जी के उस नारे की तरफ़ उनका ध्यान खींचा जिसमें उन्होंने रोटी,कपड़ा और मकान की बात की थी. राहुल ने कहा कि वो भी इसी लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ना चाहते हैं. ज़ाहिर सी बात है कि ये टाइटल मनोज कुमार की फ़िल्म 'रोटी, कपड़ा और मकान' का है जो बड़ी आसानी से लोगों की ज़बान पर चढ़ जाता है. वैसे कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला धीरे से इसके पीछे की सच्चाई भी बयान कर देते हैं. उनका कहना है कि आप लोगों के दिलों से बॉलीवुड को अलग नहीं कर सकते हैं. ऐसे में आमतौर पर नेतागण अपनी बात को असरदार तरीके से जनता तक पहुंचाने के लिए फिल्मी जुमलों और गानों का सहारा लेते हैं. इतना ही नहीं किसी भी फिल्मी शख़्सियत का इस्तेमाल भीड़ जुटाने के लिए भी धड़ल्ले से किया जाता है और ऐसा पहले से हो रहा है, इसमें कोई नई बात नहीं है. राजनीतिक वर्ग तो अपनी बातों के लिए फ़िल्मों और फ़िल्मी लोगों का इस्तेमाल काफ़ी पहले से कर रहा है लेकिन अब धीरे-धीरे इसका फ़ायदा फ़िल्मों को भी होना शुरु हो गया है और 'सिंह इज़ किंग' फिल्म इसका ताज़ा उदाहरण है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'फ़िल्मों में टिकना है तो असीमित धैर्य चाहिए'04 अगस्त, 2008 | मनोरंजन एक्सप्रेस सलमान-शाहरुख़ झगड़े का असर कटरीना पर03 अगस्त, 2008 | मनोरंजन एक्सप्रेस ज़िंदगी ज़िंदादिली का नाम है...30 जुलाई, 2008 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'वर्ल्ड टूर का सिलसिला मैंने शुरु किया'29 जुलाई, 2008 | मनोरंजन एक्सप्रेस सल्लू मियाँ का नया रूप24 जुलाई, 2008 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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