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गीत गुमसुम है ग़ज़ल चुप है..... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दुनिया भर में उर्दू की शायराना परंपरा के लिए मश्हूर शंकर-शाद मुशायरे में हिंदी के प्रसिद्ध कवि गोपालदास नीरज ने जब ये शेर पढ़ा... मेरा मक़सद है कि महफ़िल रहे रौशन यूं ही तो उससे जहां मुशायरे का तेवर तय हुआ वहीं उस वक़्त उर्दू मुशायरे में एक और नया पहलू भी जुड़ गया जब उन्होंने यह शेर पढ़ा... गीत गुमसुम है, ग़ज़ल चुप है, रुबाई है दुखी शंकर-शाद मुशायरा विश्व भर में उर्दू का सबसे बड़ा और सबसे लोकप्रिय मुशायरा रहा है और भारत की आज़ादी के बाद से दिल्ली की सांस्कृतिक पहचान रहा है. डीसीएम का यह मुशायरा दो हिंदू शायरों सर शंकरलाल शंकर और लाला मुरलीधर शाद की याद में आयोजित किया जाता है जो उर्दू के सेकूलर चरित्र को पेश करता है. यह 45वां मुशायरा कई ऐतबार से यादगार कहा जाएगा, इस में जहां भारत के नामवर उर्दू शायरों ने शिरकत की वहीं पाकिस्तान के बड़े नाम अहमद फ़राज़ और ज़हरा निगाह भी मौजूद थीं. मुशायरे की परंपरा
मुशायरे का आरंभ परंपरागत तौर पर दीप जलाकर किया गया और यह शमा पाकिस्तान की सुप्रसिद्ध शायरा ज़हरा निगाह ने रौशन की. साथ में फ़िल्मी जगत की मानी जानी हस्ती शबाना आज़मी भी थीं. मुशायरे की अध्यक्षता दिल्ली के सब से बुज़ुर्ग शायर बेकल उत्साही ने की जो हमेशा ही इस मुशायरे की शान रहे हैं. मुशायरे के शुरू में परंपरागत तौर पर शंकर और शाद की ग़ज़लों की कुछ पंक्तियां भी सुनाई गईं. दोनों के एक एक शेर नमूने के तौर पर इस तरह हैं. दुनिया-ए-मुहब्बत में शंकर हम आस लगाए बैठे हैं और दुनिया सिमट के आ गई मय्यत पे शाद की शाद और शंकर के बारे में उर्दू में कहा जाता है कि वो एक शेर के दो मिसरों की तरह हैं जहां दोनों मिसरे पढ़े जाते हैं वहीं शेर पूरा हो जाता है. साझा संस्कृति
आज की दौड़ती भागती ज़िंदगी में जब सारे मूल्यों को हमारी अर्थ-व्यवस्था तय करती है और जहां हम अपने जिस्म के लिए सारी कोशिश में लगे हैं वहीं हम अपनी रूह यानी आत्मा को कैसे नकार सकते हैं. शायरी वास्तव में हमारी आत्मा की ग़ज़ा है और यह ज़रूरत पूरी होती है ऐसे मुशायरों से. भारत की साझा संस्कृति और मूल्यों की अभिव्यक्ति इस प्रकार के मुशायरों में उभर कर सामने आती है और हम अपने अतित के धरोहर की क़ीमत पहचानते हैं. मलिकज़ादा जावेद ने जब ये पंक्तियां पढ़ीं तो लोगों ने ख़ूब दाद दी. ज़रा सा नर्म हो लह्जा ज़रा सा अपनापन और उठाओ कैमरा तस्वीर खींच लो इनकी मूल्यों की शायरी उर्दू शायरी में घटते बढ़ते मूल्यों का हर घड़ी मूल्यांकन तो होता ही रहता इसकी एक ख़ूबी यह भी है यह वास्तविकता का आईना बन जाती है और इस के ज़रिए हर उस चीज़ पर चोट की जाती है जो समाज और इंसानियत के ख़िलाफ़ हो. मुशायरों की जान वसीम बरेलवी के यह शेर कुछ इसी जानिब इशारा करते हैं. चैन से बैठे हैं आपस में लड़ाने वाले या मुझको गुनाहगार कहे और सज़ा न दे या लिहाज़ आँख का, रिश्तों का डर नहीं रहता इक ऐसा मोड़ इसी ज़िंदगी में आना है पसंदीदा शेर शनिवार को दिल्ली में आयोजित मुशायरे में पढ़े गए कुछ पसंदीदा शेर आप भी देखते चलिए हादसों की ज़द में हैं तो मुस्कुराना छोड़ दें तुमने मेरे घर न आने की क़सम खाई तो है प्यार के दुश्मन कभी तू प्यार से कह के तो देख दूरी हुई तो उन से क़रीब और हम हुए ख़्वाब का रिश्ता हक़ीक़त से न जोड़ा जाए अब भी भर सकते हैं मैख़ाने के सब जामो-सुबू मौत आई हमें ख़बर न हुई ज़िंदगी बाप की मानिंद सज़ा देती है जुनूँ के नग़्मे वफ़ाओं के गीत गाते हुए कोई है जो हमें दो-चार पल को अपना ले मुझको तआक़ुब में ले आई एक अंजान जगह ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना हामी भर लेना मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है | इससे जुड़ी ख़बरें मजाज़ लखनवी के सम्मान में डाक टिकट28 मार्च, 2008 | मनोरंजन एक्सप्रेस मजाज़: कुछ अनछुए पहलू04 दिसंबर, 2005 | मनोरंजन एक्सप्रेस भारत-पाक के बीच जुड़ा सुर का रिश्ता27 सितंबर, 2005 | मनोरंजन एक्सप्रेस भारत की शायरी बनाम पाकिस्तान की शायरी05 अगस्त, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'मैं झूठ के दरबार में सच बोल रहा हूँ...'19 नवंबर, 2005 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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