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शुक्रवार, 28 मार्च, 2008 को 22:03 GMT तक के समाचार
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मजाज़ लखनवी के सम्मान में डाक टिकट

मजाज़ की स्मृति में डाक टिकट
भारत के उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने मजाज़ की स्मृति में डाक टिकट जारी किया
उर्दू भाषा के कीट्स कहे जाने वाले शायर असरारुल हक़ मजाज़ की याद में शुक्रवार को एक डाक टिकट जारी किया गया.

उर्दू अदब के इस महान शायर की शायरी में प्रगतिशीलता भी मिलती है और रूमानियत भी. कई साहित्यकार मानते हैं कि पाकिस्तान में जो साहित्यिक करिश्मा फ़ैज़ करके दिखाते हैं, भारत में वो मजाज़ की कलम से पन्नों और इस तरह लोगों के दिलों में उतरा.

मजाज़ के सम्मान में डाक टिकट जारी करते हुए उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कहा कि मजाज़ का व्यक्तित्व बड़ा रंगमय था और उनकी शायरी की गूंज अपने ज़माने में सबसे बुलंद थी.

मजाज़ को लखनऊ बहुत पसंद था इसलिए इस डाक टिकट पर लखनऊ की स्काइलाइन दिखाई गई है और अलीग़ढ़ विश्वविद्यालय उनके तराने से गूंजता रहता है इसलिए बैकग्राउंड में अलीगढ़ यूनिर्सिटी को देखा जा सकता है.

इस मौक़े पर राज्यमंत्री शकील अहमद ने भी मजाज़ को याद किया और कहा कि मजाज़ पर डाक टिकट जारी होने पर उन्हें बेहद ख़ुशी हो रही है.

उन्होंने बताया कि पिछले दिनों जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाक़ात हुई थी तो उन्होंने पूछा था कि मजाज़ पर जारी होने वाले डाक टिकट की क्या स्थिति है. मजाज़ में उनकी दिलचस्पी को देखते हुए यह काम जल्दी-जल्दी किया गया.

इस मौक़े पर ख़ुद शायर मजाज़ की बहन हमीदा सालिम मौजूद थीं जिन्होंने मजाज़ की कहानी शुरू से आख़िर तक बयान की, बच्चों से उनके बे-इंतिहा लगाव और उनकी विशेष सिगरेट का भी ज़िक्र किया. भाई के सम्मानित किए जाने की ख़ुशी उनके चहरे से ज़ाहिर थी.

गीतकार और मजाज़ के भांजे जावेद अख़्तर भी इस मौक़े पर मौजूद थे. जावेद अख़्तर ने मजाज़ की रचनाधर्मिता और उनकी विविधता पर रौशनी डाली.

एक महान शायर, मजाज़

मजाज़ लखनवी
मजाज़ की शायरी में रूमानियत और प्रगतिशीलता, दोनों मिलते हैं

मजाज़ 19 अक्तूबर 1911 में बाराबंकी ज़िले के रुदौली गांव में पैदा हुए थे. अपना ज़्यादातर समय उन्होंने लखनऊ में गुज़ारा. लखनऊ, अलीगढ़ और आगरा से पढ़ाई की.

कम उम्र में ही मजाज़ ने उर्दू शायरी को उस दौर में जो दे दिया, उसके समानांतर कई दशक देख चुके शायर भी नहीं आ पाते.

मजाज़ की शायरी में एक ओर प्रेम और रूमानियत हिलोरे ले रही थी तो वहीं वर्जनाओं, विधानों को तोड़ती प्रगतिशीलता भी थी.

पाँच दिसंबर, 1955 में लखनऊ में उनका देहांत हुआ. उनकी शायरी का संग्रह आहंग के नाम से प्रकाशित हो चुका है.

राज्यमंत्री शकील अहमद ने इस मौके पर बताया कि इसी श्रंखला में बिसमिल्लाह ख़ाँ पर भी डाक टिकट जारी होना है और हिंदी के कहानीकार फणीश्वरनाथ रेणू को भी सम्मानित किया जाना बाक़ी है.

अलीग़ढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उपकुलपति पीके अब्दुल अज़ीज़ ने बीबीसी से कहा कि यह न सिर्फ़ मजाज़ के लिए सम्मान है बल्कि उर्दू और अलीगढ़ के लिए भी गौरव की बात है.

मजाज़ और अलीगढ़ के रिशते के बारे में उन्होंने कहा कि मजाज़ अलीगढ़ की रूह यानी आत्मा थे, जवान दिलों की धड़कन थे, उन्होंने न सिर्फ़ यहां का तराना लिखा बल्कि उन्होंने यहां काफ़ी शायरी की और लोकप्रियता प्राप्त की.

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