BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
शुक्रवार, 28 मार्च, 2008 को 13:20 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
फ़ौजी बूटों ने दबा दी घुँघरुओं की झंकार

कथक नृत्य
जयपुर में कथक नृत्य ने समाँ बाँध दिया
भारतीय शास्त्रीय नृत्य कथक उत्तर भारत में राजमहलों और नवाबों के संरक्षण मे पला बढ़ा और अपना खास मुक़ाम बनाया. लेकिन पाकिस्तान मे उसे अपनी जगह बनाने मे बहुत संघर्ष करना पड़ रहा है.

पाकिस्तान की नामवर कथक नृत्यांगना नाहीद सिद्दीक़ी कहती हैं, "किसी भी फन को विकसित होने और ऊंचाई का मकाम छूने के लिए समाज में शांति बहुत जरुरी है. मेरे मुलक में अभी कथक के लिए बहुत सी मुश्किलें हैं".

नाहीद ने जयपुर मे एतिहासिक आमेर किले के दीवाने-आम में अपने कथक के फन का मुजाहिरा किया और लोगों की खूब दाद पाई.

उनके कथक मे लाहौर के महाराज गुलाम हुसैन की छाप थी तो बिरजू महारज का भी प्रभाव था क्योंकि नाहीद ने इन दोनों गुरुओं से कथक के गुर सीखे हैं.

 जब से पाकिस्तान बना है, अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रहा है. फिर कला तो वहाँ पनपती है जहाँ सुकून हो. अमन हो. अब इतने बाहर के असर आ गए है वहाँ की कला पर ध्यान ही नहीं है"
नाहीद सिद्दीक़ी

एक दौर था जब पाकिस्तान मे ज़िया उल हक की सरकार ने उनके नृत्य प्रदर्शन पर रोक लगा दी थी और नाहीद को एक लंबा समय विदेश में गुज़ारना पड़ा.

अब नाहीद लाहौर में कथक सिखाने वाले लोगों को ये नृत्य सिखा रही हैं.

पाकिस्तान मे कथक का क्या भविष्य है? इस पर नाहीद कहती हैं, "जब से पाकिस्तान बना है, अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रहा है. फिर कला तो वहाँ पनपती है जहाँ सुकून हो. अमन हो. अब इतने बाहर के असर आ गए है वहाँ की कला पर ध्यान ही नहीं है".

"मैंने वहाँ रहा कर महाराज गुलाम हुसैन साहिब से कथक सीखा फिर बिरजू महाराज से भी सीखा".

"मेरा फर्ज़ है की गुरुओं के इस काम को आगे बढ़ाऊँ. मैंने लाहौर में अपना केंद्र बनाया है. अब लोगों को मालूम हुआ कि कथक भी कोई चीज़ है. हाँ मुश्किलें आईं, मुझ पर प्रतिबंध भी लगा. लेकिन अगर आप दर्द से न गुजरें तो आप के फ़न मे निखार नही आता है".

नाहीद सिद्दीक़ी
नाहीद सिद्दीक़ी को कई सम्मान मिल चुके हैं

नाहीद को कई अवार्ड मिले और उनके काम को दुनिया भर में सराहा गया.

वे कहती हैं,"मेरे साथ बहुत लोग है. सहानुभूति रखते हैं. सम्मान देते है. मगर सरकार का कोई संरक्षण नही है इस कला को. जो भी रहनुमा आते है, उन्हें शास्त्रीय कला का ज्ञान नही होता. उन्हें लोक संगीत का फिर भी थोड़ा ज्ञान होता है. मगर कथक को स्वीकार्यता नहीं मिलती है. फिर कट्टरपंथी भी बीच में है जो औरत के रोल पर कुछ न कुछ कहते रहते हैं".

नाहीद कहती हैं, "धमाकों के बीच कला को कैसे जगह मिलेगी. सब लोग अमन चाहते हैं, हम तो दुआ ही कर सकते हैं. कुछ लोग है जो मुझ से कथक सीखने आते है. फिर लाहौर तो कला-संस्कृति का गढ़ है. पहले भी था और अब भी है".

उनके साथ आए लाहौर के हसन कथक के भविष्य को लेकर बहुत मायूस थे.

 जब हर वक़्त फ़ौजी बूटों की पदचाप सुनाई देती हो तो वहाँ घुंघरू की आवाज़ दब कर रह जाती है. शायद अब ये झंकार सुनाई देने की दिन आ रहे है. वहाँ लोकतंत्र की राह हमवार हो रही है
मोहम्मद बख़्श

उनका कहना था कि यह एक कमज़ोर पड़ती कला है. जमाना कमर्शियल हो गया है. फिर एक फ़न के लिए सुकून चाहिए. जब माहौल में धमाके हो तो फ़न कैसे आगे बढेगा.

पाकिस्तान के एक अन्य फ़नकार मोहम्मद बख़्श अब 70 साल के हो गए हैं.

पहले अलवर में रहते थे, बंटवारा हुआ तो पाकिस्तान चले गए. पर अब पहली बार भारत आए हैं. वे हारमोनियम बजाते हैं.

उनका कहना है, "दोनों मुल्कों के कथक में कोई फर्क नहीं है. हाँ हम इसे अपने नाम से करते हैं. क्योंकि कलाकार जहाँ गया वहीं का हो गया".

"पाकिस्तान में न तो कला की कोई कमी है और नही ही फ़नकारों की. लेकिन जब हर वक़्त फ़ौजी बूटों की पदचाप सुनाई देती हो तो वहाँ घुंघरू की आवाज़ दब कर रह जाती है. शायद अब ये झंकार सुनाई देने की दिन आ रहे है. वहाँ लोकतंत्र की राह हमवार हो रही है".

इससे जुड़ी ख़बरें
भांगड़ा के ज़रिए कसरत का नया तरीक़ा
10 अक्तूबर, 2004 | मनोरंजन एक्सप्रेस
पढ़ाई करने का बल्ले-बल्ले आइडिया
29 मार्च, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस
यॉर्कशायर में छाया बॉलीवुड डांस
01 मार्च, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस
मैं अच्छा शागिर्द हूँ: बिरजू महाराज
12 नवंबर, 2005 | मनोरंजन एक्सप्रेस
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>