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शनिवार, 28 जुलाई, 2007 को 20:00 GMT तक के समाचार
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बाक़र मेंहदी के ख़्वाब और क़हक़हे

बम्बई आने से पहले मैं इस महानगर की सन् 1960-62 की साहित्यक पटकथा से परिचित था.

हिंदी में धर्मवीर भारती, मराठी में नारायण सुर्वे, उर्दू में साहिर लुधियानवी, गुजराती में सुरेश दलाल मेरे जाने पहचाने नाम थे.

इन नामों में एक और भी था-उर्दू के आलोचक शायर बाक़र मेंहदी...हिंदी-उर्दू के दूसरे कवि/लेखकों की तरह वह भी अपने उन ख़्वाबों की हक़ीक़त तलाश करने यहाँ आए थे, जो उन्होंने जवान आंखों की गहरी नींदों में देखे थे.

मेरी एक ग़ज़ल का एक शेर है,

मेज़ पर ताश के पत्तों सी सजी है दुनिया
कोई खोने के लिए है कोई पाने के लिए

बाक़र मेंहदी को महानगर के जीवन-खेल में कभी अच्छे कार्ड हाथ नहीं लगे और वह मुसलसल हारते रहे. उनके दोस्तों में साहिर यहाँ आए.

साहिर चंद महीने कथाकार कृष्णचंदर के वर्सुवा स्थित बंगले के एक कोने में बने मुसाफ़िरखाने में गुज़ार के फ़िल्मों में गीतकार बन गए थे. कृष्णचंदर के इस मुसाफ़िरखाने में साहिर के साथ मजाज़ लखनवी भी रहते थे. साहिर कृष्ण की कहानियों को फेअर करने की मज़दूरी करते थे और मजाज़ इस मजदूरी में उनके हिस्सेदार थे.

मजरुह सुल्तानपुरी को एक मुशायरे में उन दिनों के फ़िल्म निर्माता कारदार ने सुना, और उन्हें भी गीतकार बना दिया. जाँनिसार अख़्तर को इंदौर का एक पैसे वाला दोस्त टकरा गया और वह उसके धन से 'बहू बेगम' नाम की फ़िल्म के निर्माता बन गए.

मुंबई से शिकायत
 बम्बई किसी को नहीं बख्शती...अली सरदार जाफ़री को इसने क्राँतिकारी से तरकारी बनाकर मारा, साहिर को इसने शायर से फ़िल्मों का गीतकार बनाकर ख़त्म किया, कृष्णचंदर को इसने अच्छे लेखन से आराम के जीवन की तरफ मोड़ दिया
बाक़र मेंहदी

बाक़र मेहदी उम्र में भले ही दो-तीन साल कम हों मगर योग्यता, अध्ययन, चिंतन और शिक्षा की दृष्टि से उन सबसे कई साल आगे थे. वह उन साहित्यकारों में थे जो लिखने के लिए पढ़ना भी ज़रूरी समझते थे.

वह जहाँ भी रहे अंग्रेज़ी, फ़ारसी, उर्दू और अंग्रेज़ी के माध्यम से विश्व साहित्य की पुस्तकों के साथ रहे.

मेरी पहली मुलाक़ात उनसे, जेजे हॉस्पिटल के पास उर्दू किताबों की एक दुकान ‘मक्तबा जामेआ’ में हुई थी. भरा हुआ बदन, आँखों पर चश्मा, हाथ में सुलगता पाइप, गोरा रंग...किताब पढ़ते-पढ़ते एक ज़ोर का पुरजोर कहकहा और इसके साथ किताब बंद करके वापस शेल्फ पर रख दी गई और माचिस से पाइप को सुलगा दिया गया...पाइप का कश लेकर ख़ुद ही बोलने लगे.

दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई...जर्मन में गुंथर ग्रास क्या लिख रहा है... फ्रेंच में बोद्लियर कैसे लिख रहा है, अंग्रेज़ी में आडिन स्पेंडर की सोच क्या है, रूस में सोल्जे नित्सिन का फिक्शन किस तरफ जा रहा है...बीच में ही बिना परिचय के उन्हें टोकते हुए मैंने पूछ लिया...और आप क्या लिख रहे हैं?

एक अजनबी के सवाल पर वह चुप हुए, नाक से चश्मा ऊँचा किया, और पाइप के कश का ढेर सारा धुँआ छोड़ते हुए सवाल का जवाब देने के बजाय उल्टा सवाल किया...आपकी तारीफ़? मैंने कहा, 'निदा फ़ाज़ली'. मेरा नाम सुनकर वैसा ही शोर भरा क़हक़हा लगाया जो पढ़ती हुई किताब को बंद करके लगाया था. ग्वालियर से आए हो-, कहते हुए मेरे घर का नाम मुक़्तुदा हसन पुकारा...और फिर एक ज़ोर का कहकहा...मुझे बोलते की इजाज़त दिए बिना वह ख़ुद ही बोले जा रहे थे...जानते हो मुक़्तुदा हसन...वह किसी को भी उपनाम से नहीं पुकारते थे, हमेशा घर के नामों से पुकारते थे, साहिर को अब्दुल हई, क़ैफ़ आज़मी को अतहर हुसैन और मजरूह सुल्तानपुरी को हक़ीम कहकर संबोधित करते थे.

चे गुएरा
चे गुएरा की तस्वीर बाक़र के कमरे का हिस्सा रही

वे कहने लगे, "मैं 1927 (उनके जन्म का वर्ष) से अब तक कई बार आत्महत्या कर चुका, पहली बार जब मैंने अपनी माँ के मरने के बाद, रदोली में अपने घर सौतेली माँ को देखा...दूसरी बार जब मैं अपने जागीरदार बाप जाफ़र मेंहदी की जागीर से रिश्ता तोड़कर पढ़ाई के लिए अलीगढ़ यूनीवर्सिटी गया था...तीसरी बार...1947 में सांप्रदायिक दंगों में दंगाइयों ने आत्महत्या करने में मेरी मदद की और मुझे जख़्मी करके चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया...लेकिन हर बार की तरह मैं इस बार भी बच गया..."

और इस तक़रीर के बाद फिर एक लंबा गूंजता हुआ कहकहा...और उसके बाद मुझे घूरते हुए सवाल..."तुमने कितनी बार खुदकुशी की कोशिश की?" मेरा जवाब सुने बिना आगे कहने लगे, "घबराओ नहीं बम्बई इस संबंध में तुम्हारी सहायता ज़रूर करेगा...बम्बई किसी को नहीं बख्शती...अली सरदार जाफ़री को इसने क्राँतिकारी से तरकारी बनाकर मारा, साहिर को इसने शायर से फ़िल्मों का गीतकार बनाकर ख़त्म किया, कृष्णचंदर को इसने अच्छे लेखन से आराम के जीवन की तरफ मोड़ दिया..."

वह हर नाम के एक कहकहा जोड़ते जा रहे थे.

प्रगतिशील बाक़र

बाक़र मेहदी का शेर है,

बस मेरा जिक्र आते ही महफ़िल उजड़ गई
शैताँ के बाद दूसरी शोहरत मिली मुझे
कुछ दिल ख़राश शेर कहे और चल बसा
हाँ ज़िंदगी में इतनी ही फ़ुरसत मिली मुझे

बाक़र मेंहदी इंकलाबी क़िस्म के मार्क्सवादी थे, वह प्रगतिशील थे...परंतु उर्दू के प्रगतिशील शायरों और लेखकों को पसंद नहीं करते थे...उनके आदर्शों में में चे-गुएरा, चारु मजुमदार और रिल्के ख़ास थे.

इनमें क्यूबा के बागी चे-गुएरा की फ़ौजी कैप और ढाढ़ी के साथ बड़ी सी तस्वीर आख़िर वक्त तक उनके नज़रों के सामने रही, उस समय भी जब वह भाइकला में लीडर प्रेस में एक खोली टाइप कमरे में रहते थे और उस वक़्त भी जब वह कार्टर रोड पर रविदर्शन के पाँचवें माले के फ्लेट में रहने लगे थे, चे-गवेरा पर उनकी एक नज़्म भी है,

बेकसी...हू का आलम है
और आकाश के पार
ज़ख़्मी, बेआसरा बाग़ियों की करा है
फिज़ा में लम्हा-लम्हा जागती सी

माँ का एक बहन के जन्म के समय देहांत और सौतेली माँ का घर में आना उनके बचपन के हादिसात थे, और घर से बेघर होकर सन 47 में चलती ट्रेन से बाहर फेंका जाना उनके बढ़ती उम्र के वाकिआत थे. इन सबने मिलकर उन्हें वह बना दिया जो वह शायद नहीं थे...लेकिन जीवन भर उनकी पहचान इसी से होती रही. सिवाए अपनी पत्नी के, जो अंत तक उनके साथ रही...कोई और उनसे एक दो मुलाक़ातों से ज़्यादा नहीं मिल पाता था.

हाँ, राजेंद्र सिंह बेदी, अख्तरुल ईमान और टाइम्स ऑफ इंडिया के पूर्व संपादक शामलाल इस में अपवाद थे-शामलाल ने अपनी अंग्रेज़ी किताब ‘ए हंड्रेड एनकाउंटर्स’ की अपनी लिखित भूमिका में लिखा है, "इस किताब के साथ मेरी वो बेशुमार शामें जुड़ी हुई हैं जो मैंने उर्दू के आधुनिक कवि/आलोचक बाक़र मेंहदी के साथ गुज़ारी हैं. उनकी कद्रो क़ीमत जो उर्दू में होनी चाहिए थी वह नहीं हुई."

बाक़र मेहदी जब बोलते थे तो यूँ लगता था जैसे किसी बड़ी लाइब्रेरी की सूची बोल रही है. हर भाषा और हर देश की नई से नई किताब इस बोलने में शामिल होती थी. वह घर हो या महफ़िल, सामने वाले केवल मौन श्रोता की तरह होते थे.

आख़िर में लगातार हर विषय पर बोलने वाले बाक़र मेंहदी जीभ पर फालिज के कराण लिखकर बातें करते थे.

उनकी अंतिम तहरीर एक नोट था. जिसमें उन्हें दफ़्न करने के बजाए जलाने की वसीयत थी...मगर दोस्तों ने उन्हें कब्र में सुला दिया.

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