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दास्तानगोई को मिली नई ज़िंदगी | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उर्दू साहित्य की मौखिक परंपरा दास्तानगोई का साहित्य में अहम स्थान था. अब इसे फिर से ज़िंदा करने की कोशिश की जा रही है. दास्तानगोई प्राचीन भारतीय संस्कृति में क़िस्से सुनाने का एक ख़ास तरीक़ा था. इसमें कहानी कहने वाले अभिनय करते हुए कहानी कहते थे. 11वीं सदीं से लेकर 19वीं शताब्दी के अंत तक के उर्दू साहित्य पर इनका ख़ासा असर था. 'अमीर हमज़ा' और 'तिलिस्म होशरुबा' ऐसी कहानियाँ हैं जिन्होंने ज़बर्दस्त संस्पेस, उतार-चढ़ाव और कॉमेडी की बदौलत न सिर्फ़ मुगल दरबार बल्कि पुरानी दिल्ली की चौक और गलियों में जनता का मनोरंजन किया. लेकिन 19वीं सदीं के आख़िर में दास्तानगोई का चलन धीरे-धीरे ख़त्म हो गया. अब अदाकारी के साथ कहानी सुनाने के नायाब चलन दास्तानगोई को दिल्ली के कुछ थिएटर अदाकार दोबारा ज़िंदा करने की कोशिश कर रहे हैं. दास्तानगोई की परंपरा पुराने समय के भारत के अलावा अल्जीरिया, बोस्निया और इंडोनेशिया जैसे देशों की संस्कृति का हिस्सा रही है. इन कहानियों का मूल स्रोत तो फ़ारसी साहित्य था जिनमें ये लिखी जाती थीं. 1881 में पहली बार लखनऊ के नवलकिशोर प्रकाशन ने इन दास्तानों को प्रकाशित करवाया था उससे पहले ये सिर्फ़ मौखिक रूप से ही प्रचलन में थीं. तक़रीबन एक सदी पहले दास्तानगोई का चलन धीरे-धीरे ख़त्म हो गया और इन कहानियों को सुनाने वाले दास्तानों की आवाज़ धीरे-धीरे मद्दिम होने लगी. कोशिश
कुछ बरस पहले मशहूर उर्दू आलोचक शम्सुर्रहमान फारूक़ी ने अपने भतीजे और थियेटर अदाकार महमूद फारूक़ी को दास्तानगोई के चलन को दोबारा ज़िंदा करने के लिए कुछ दास्तानें दीं. जिसे पढ़कर महमूद फारूक़ी ने प्राचीन दास्तानों को आम जनता के सामने अभिनीत करना शुरू कर दिया. महमूद फारूक़ी का कहना है कि दास्तानगोई का चलन उपनिवेशवाद के आने के साथ-साथ ख़त्म होने लगा. महमूद फारूक़ी ने जब अपने दोस्त और थियेटर कलाकार हिमांशु त्यागी के साथ मिलकर दिल्ली के लोगों के सामने दास्तानें पेश कीं तो बरसों पुरानी इस परंपरा को लोगों ने बहुत पसंद किया. महमूद फारूक़ी और उनके साथी दानिश हुसैन ने हिंदुस्तान और पाकिस्तान में दास्तान का फ़न पेश किया है. दानिश कहते हैं कि हिंदुस्तान में दास्तानगोई के फ़न का दोबारा ज़िंदा होने की सबसे बड़ी वजह उनके कहानी कहने का अंदाज़ है. दास्तानों को जनता के सामने पेश करते वक़्त दास्तानगो स्थान और श्रोता के मद्देनज़र कहानी और उसकी ज़ुबान में छोटी-छोटी तब्दिलियाँ करते थे. दास्तानगोई शुरू में भले ही हिंदुस्तान के अवध में फली फूली हो लेकिन इसको दोबारा ज़िंदगी दिल्ली शहर में मिली. दिल्ली के जामा मस्जिद उर्दू बाज़ार के एक किताब विक्रेता का कहना है,‘‘हाल ही में दास्तानगोई को एक नया जन्म मिला है. और इसलिए अब दास्तानों को दोबारा बड़ी संख्या में आगे बढ़ाया जा रहा है.’’ इस फ़न को नई ज़िंदगी देने वाले महमूद और दानिश न सिर्फ़ पुरानी कहानियाँ याद करके हिंदुस्तान की जनता का मनोरंजन कर रहे हैं बल्कि इन दास्तानों को अंग्रेज़ी में अनुवाद कर रहे हैं ताकि वो उर्दू न जानने वाले श्रोताओं भी मनोरंजन कर सकें. | इससे जुड़ी ख़बरें सम्बलपुर एक्सप्रेस28 सितंबर, 2006 | पत्रिका उन्नीसवीं शताब्दी की लघु कथाएँ22 सितंबर, 2006 | पत्रिका आधुनिक समाज के समय का एक सच02 नवंबर, 2006 | पत्रिका तीन मौन दृश्य और एक पीला फूल23 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका ऑस्कर का अतीत26 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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