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संगीतकार ओपी नैयर का निधन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हिंदी फ़िल्मों के जाने-माने संगीतकार ओपी नयैर का मुंबई के पास थाणे में निधन हो गया है. 81 वर्षीय ओपी नैयर ने 50 और 60 के दशक में कई हिंदी फ़िल्मों में बेहतरीन और हिट गाने दिए. उनका जन्म लाहौर में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है. ओपी नैयर के दोस्त और वकील शैलेष सादेकर ने बीबीसी को बताया कि उन्होंने दिन में अपने रोज़मर्रा के काम सामान्य रूप से किए लेकिन दोपहर बाद जब वे बाथरूम में गए तो अचानक बेहोश हो गए. शैलेष सादेकर ने बताया कि डॉक्टरों ने कहा है कि ओपी नैयर को दिल का दौरा पड़ा था. ओपी नैयर के वकील ने ये भी बताया कि वे अकसर कहते थे कि उनके निधन के बाद उनके परिवारजनों को न बुलाया जाए और नैयर साहब की इस इच्छा का सम्मान किया गया है. हैदराबाद में रहने वाले उनके भाई को ही ओपी नैयर के निधन के बारे में बताया गया है. करीब 10 साल पहले वे अपने परिवार से अलग हो गए थे. फ़िल्मी सफ़र ओप नैयर ने 50 के दशक में अपना फ़िल्मी करियर शुरु किया और 1954 में आई गुरू दत्त की फ़िल्म आर-पार से उन्हें अपनी पहली सफलता मिली. इसके बाद उन्हें गुरु दत्त के मिस्टर और मिसिज़ 55 और सीआईडी में भी संगीत दिया. नया दौर, तुमसा नहीं देखा, कश्मीर की कली, मेरे सनम, एक मुसाफ़िर एक हसीना, फिर वही दिल लाया हूँ-उनके संगीत निर्देशन में बनी फ़िल्मों की लंबी सूची है. मेरा नाम है चिन-चिन चूँ (हावड़ा ब्रिज),बाबू जी धीरे चलना (आर-पार), उड़े जब-जब ज़ुल्फ़ें तेरी( नया दौर), पुकारता चला हूँ मैं...उन्होंने एक से एक हिट गाने दिए. उन्होंने ज़्यादातर फ़िल्मों में आशा भोंसले से गाने गवाँए और ये गाने बेहद मशहूर भी हुए. इसके अलावा गीता दत्त, मोहम्मद रफ़ी और महेंद्र कपूर ने भी उनके लिए कई गाने गए. अपने समय के टॉप संगीत निर्देशक होने के बावजूद ओपी नैयर ने उस समय की टॉप गायिका लता मंगेश्कर के साथ कभी काम नहीं किया. सत्तहर के दशक में वे धीरे-धीरे हिंदी संगीत के परिदृय से ग़ायब से होने लगे. हालांकि 90 के दशक के दौरान उन्होंने निश्चय और ज़िद जैसी कुछ हिंदी फ़िल्मों के लिए फिर संगीत दिया लेकिन वे अपना पुराना कमाल नहीं दिखा पाए. | इससे जुड़ी ख़बरें कमलेश्वर: एक अध्याय का अंत27 जनवरी, 2007 | पत्रिका संगीतकार नौशाद को एक श्रद्धांजलि05 मई, 2006 | पत्रिका सिने संगीत के मोर्चे पर ख़य्याम 02 अगस्त, 2006 | पत्रिका 'नौजवानों को गुमराह कर रही हैं फ़िल्में'08 मार्च, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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