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शुक्रवार, 01 दिसंबर, 2006 को 11:18 GMT तक के समाचार
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बॉलीवुड तो पश्चिम की फ़िल्मों की भद्दी नकल है
विजय दान देथा
विजय दान देथा साहित्य अकादमी के फ़ैलो हैं
विजय दान देथा ने जब पढ़ाई पूरी करने के बाद राजस्थानी में लिखने का फ़ैसला किया तब वह हिंदी में 300 कथाएँ लिख चुके थे और 13 सौ कविताएँ. लेकिन ज़िद थी कि राजस्थानी में ही लिखेंगे.

आज भी लिखते वे राजस्थानी में ही हैं और फिर हिंदी में उसका अनुवाद होता है.

आज वह हज़ारों लोककथाओं के लेखक हैं और उनकी कथाओं पर फ़िल्में बन चुकी हैं. ऑस्कर के लिए भारत से भेजी गई फ़िल्म ‘पहेली’ भी उनकी ही कहानी पर ही बनी थी.

वह मानते हैं कि बॉलीवुड की फ़िल्में पश्चिमी और ख़ासकर अमरीकी फ़िल्मों की नकल होती हैं. विजयदान देथा तो बॉलीवुड फ़िल्मों को यूरोपीय और अमरीकी फ़िल्मों का अपशिष्ट तक मानते हैं. वह कहते हैं कि रात के खाने का सुबह जो हश्र होता है वही पश्चिमी फ़िल्मों का बॉलीवुड में होता है.

पिछले दिनों वे दिल्ली आए तो विनोद वर्मा ने उनसे लंबी बात की. पेश है इस बातचीत के प्रमुख अंश –

लोककथाओं और लोकगाथाओं पर आप जैसा काम शायद भारतीय साहित्य में किसी और ने नहीं किया है....

हो सकता है कि किया हो और किसी को पता नहीं चला हो. एक उदाहरण था कि किस तरह रूसियों ने उन्नीसवीं शताब्दी में फ़्रेंच रचनाओं का अनुवाद कर-करके एक दिन रुसी लेखन को एक ऊँचा स्थान दिला दिया. मैंने भी एमए करने के बाद तय किया कि राजस्थानी में लिखूँगा बहुत मीडियॉकर लेखक बनकर रह जाउँगा. बचपन से पढ़ाई के चक्कर में राजस्थान से बाहर था तो राजस्थानी भाषा के संपर्क में नहीं था. तो मैं घर-घर जाकर बात करता रहा. मैं लोहार के घर जाता, जुलाहे के घर जाता और मोचियों के घर जाता और अपनी शब्द संपदा को बढ़ाने का प्रयास करता रहा. मैंने घर में औरतों से बात की. किसी भी समाज में महिलाओं की भाषा सबसे शुद्ध होती है.

लोककथाओं को शब्दों में पिरोना अपने आपमें एक कठिन काम था. मैं वह करता रहा. अगर मैं मौलिक कथाएँ भी लिखता तो चालीस-पचास कथाओं के बाद एक तरह से एकरसता आ जाती. कुछ बड़े लेखकों की तरह वही-वही कथानक घूमता रहता. एक कहानी पढ़ो चाहे पचास कहानी पढ़ो वही एकरुपता दिखती रहती है.

आज तक न मैंने किसी संपादक से अपनी रचना छापने का अनुरोध किया और न किसी प्रकाशक से किताब छापने का. मैंने किसी से अपनी कहानी पर फ़िल्म बनाने को भी नहीं कहा. लोग ख़ुद मेरे पास आए.

लेकिन यह तो कथाकार होने का कठिन रास्ता था. हो सकता था कि आपको लोकप्रियता मिलती ही नहीं...तो कितना कठिन रहा यह रास्ता?

कठिन तो बिल्कुल भी नहीं रहा. मेरे लिए तो यह साँस लेने और जीने की तरह से सहज है. मैं तो एक निमित्त मात्र था.

कलम उठाई और लिखने बैठ गया. बिना कुछ सोचे और बिना कोई योजना बनाई. न मैं काट-छाँट करता हूँ न अपने लिखे हुए को दोबारा पढ़ता हूँ. कहानी अपने आप बनती चली गई. जैसे कोई अदृश्य शक्ति लिखाती रहती है.

 अमरीका पूरी दुनिया की सांस्कृतिक विविधता को ख़त्म कर उसे एक ही साँचे में ढाल देना चाहता है. जो उन्होंने काँच दिखाया है वह पूरी दुनिया को लुभा रही है और सभी लोग उसके पीछे भागे चले जा रहे हैं

लोक लगातार हाशिए पर जाता हुआ दिखता है, क्या आपको भी ऐसा लगता है?

हाँ बिलकुल. ये जो मीडिया का जो तंत्र है, चाहे वह अख़बार हो या फिर टेलीविज़न सबने लोक को हाशिए पर डाल दिया है.

तो इसके लिए दोषी कौन है भारतीय समाज या फिर बाज़ार?

बाज़ार या कहें कि व्यावसायिकता. अमरीका पूरी दुनिया की सांस्कृतिक विविधता को ख़त्म कर उसे एक ही साँचे में ढाल देना चाहता है. जो उन्होंने काँच दिखाया है वह पूरी दुनिया को लुभा रही है और सभी लोग उसके पीछे भागे चले जा रहे हैं.

बाज़ार की होड़ है. 18वीं-19वीं सदी में भौगोलिक रुप से कब्ज़ा कर लेने को ही गुलामी माना जाता था. लेकिन अब तो यदि आपने किसी देश के बाज़ार पर कब्ज़ा कर लिया तो ग़ुलाम बना लिया. यह अप्रत्यक्ष ग़ुलामी ज़्यादा ख़तरनाक है. पूरा समाज पागल कुत्ते की तरह पैसे के पीछे भाग रहा है.

अब जो कहानी और कविताएँ लिखी जा रही हैं उसमें लोकसाहित्य का कितना प्रभाव दिखता है?

साहित्य में न भाषा काम करती है न लोक काम करता हैं. आख़िर में लेखक की गुणवत्ता, उसकी निष्ठा और साधना काम करती है. बाक़ी लोक तो एक प्रतिशत में होता है.

मैं कह सकता हूँ कि यदि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने बांग्ला में नहीं लिखा होता तो उन्हें नोबेल नहीं मिल सकता था. हालांकि नोबेल उनकी योग्यता का दस प्रतिशत भी नहीं है. वैसे ऐसा भी नहीं है कि कोई भी बांग्ला में लिखेगा तो शरतचंद्र या रवीन्द्रनाथ टैगोर हो जाएगा. उसके लिए वैसी निष्ठा चाहिए और वैसी साधना चाहिए.

आप भाषा की इतनी चिंता से बात कर रहे हैं. चिंता तो हिंदी को लेकर भी हो रही है कि अंग्रेज़ी का प्रभाव बढ़ रहा है?

उसमें क़रियर बनता है. अंग्रज़ी से नौकरी मिलती है. अंग्रेज़ों के समय एक मैकाले आया था आज तो लाखों व्यक्ति मैकाले बने हुए हैं. नेता बने हुए हैं. उनके बच्चों को वहीं पढ़ाया जाता है जहाँ अंग्रेज़ी पढ़ाई जाती है.

आपकी कहानी पर फ़िल्में बनीं हैं. ऐसा लगता है कि हिंदी साहित्य से भाषा का जितना प्रचार हो रहा है उससे ज़्यादा सिनेमा से हो रहा है?

सिनेमा से कोई टूटी फूटी हिंदी सीख सकते हैं लेकिन न वे हिंदी पढ़ना सीख सकते हैं और न लिखना. बार-बार कोशिश करने से तो बंदर भी मोटरसाइकिल चला लेता है तो आदमी तो उससे ज़्यादा बुद्धिमान है.

 एक कहानी में जो अनुभव काम आता है उसकी तो कोई क़ीमत नहीं. लेकिन जो कागज़ लगता है उसकी क़ीमत होती है पाँच या दस रुपए. लेकिन फ़िल्म बनी 24 करोड़ रुपए में. अगर वह अपने हिसाब से कुछ तब्दीलियाँ न करे तो तीन फ़िल्म बनाकर दीवालिया हो जाएगा

हिंदी सिनेमा को शिकायत रहती है कि अच्छी कहानियाँ नहीं मिलतीं. हिंदी में इतनी तो कहानियाँ हैं फिर क्यों ऐसा होता है कि सिनेमा वालों को कहानियाँ नहीं मिलती?

बॉलीवुड तो अमरीका की नकल करता है. एक भद्दा उदाहरण देकर बताऊँ तो खाना खाने के बाद जो खाने की सुबह जो परिणति होती है उसी तरह भारतीय सिनेमा यूरोप और अमरीका का हिस्सा है. मौलिकता उनके पास है नहीं. पहले तो दर्शकों की आदतें बिगाड़ते हैं, फिर कहते हैं कि दर्शक यही देखना चाहता है. अरे, तुमने अच्छी फ़िल्में दिखाई ही कहाँ दर्शकों को. एक ज़माने में कलकत्ता और बॉम्बे में अच्छी फ़िल्में बनती थीं, लोग देखते थे. लेकिन अब तो रुचि ही विकृत कर दी गई है.

ऐसे सिनेमा उद्योग से जब आपके पास प्रस्ताव आता है कि आपकी एक कहानी पर फ़िल्म बनानी है तो आपको कैसा महसूस होता है?

जो मेरे पास आते हैं वो उस बाज़ार से बचकर आते हैं, लीक से हटकर आते हैं. बाक़ी कोई बाज़ार वाला मेरे पास फ़िल्म बनाने के लिए नहीं आता और उनको मैं देता भी नहीं हूँ. हालांकि पहेली के अंदर भी कुछ समझौते किए गए हैं. लेकिन वह विधा ही अलग है.

मेरी एक कहानी में जो अनुभव काम आता है उसकी तो कोई क़ीमत नहीं. लेकिन जो कागज़ लगता है उसकी क़ीमत होती है पाँच या दस रुपए. लेकिन फ़िल्म बनी 24 करोड़ रुपए में. अगर वह अपने हिसाब से कुछ तब्दीलियाँ न करे तो तीन फ़िल्म बनाकर दीवालिया हो जाएगा. तो कम से कम समझौते के साथ पहेली फ़िल्म बनी है. उसका प्रचार प्रसार भी हुआ है.

टेलीविज़न को आप किस तरह से देखते हैं?

कोई भी साधन किस तरह से भ्रष्ट किया जाए उसका एक उदाहरण है टेलीविज़न. इस माध्यम से मनुष्य को चंद्रमा की ऊँचाई तक ले जाया जा सकता है लेकिन यह माध्यम समाज को पाताल की ओर ले जा रहा है.

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