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गुरुवार, 30 नवंबर, 2006 को 13:33 GMT तक के समाचार
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लंदन में तमिल साहित्य का भंडार

साहित्य
लंदन के ईस्ट हैम इलाके में कई दुकानें ऐसी हैं जहाँ दक्षिण भारतीय साहित्य सजा हुआ है
कहते हैं कि व्यक्ति के वजूद की पहचान उसके साहित्य से होती है. साहित्य में छिपे ज्ञान भंडार से आप उसकी सभ्यता और संस्कृति की गहराई का पता लगा सकते हैं.

यदि किसी व्यक्ति का साहित्य उससे दूर हो तो वह अधूरा महसूस करता है. कुछ ऐसा ही महसूस करते थे साठ के दशक में मदुरई से लंदन आकर बस चुके वेणु गोपालन.

लेकिन अब यह यह अधूरापन खत्म हो चुका है. इन दिनों लंदन के ईस्ट हैम इलाके में कई दुकानें ऐसी हैं जिनकी रैकों में दक्षिण भारतीय साहित्य सजा हुआ है.

इन दुकानों में आप तमिल अखबार से लेकर, पत्रिकाएं और तमिल किताबें देख सकते हैं.

तमिल साहित्य

 हमारे अधिकतर ग्राहक बंधे हुए हैं. ये लोग हर महीने की पहली तारीख से नई पत्रिकाओं का इंतज़ार करते हैं
गोपी दास

अपने घर से दुकान चलाने वाले दक्षिण भारतीय मार्क्स की दुकान में तमिल साहित्य का भंडार है

इनकी दुकान में न सिर्फ़ मूल तमिल भाषी साहित्य है बल्कि अनेक अन्य भाषाओं की किताबों का तमिल अनुवाद भी उपलब्ध है.

इसमें मशहूर उपन्यासों से लेकर, योग किताबें और ओशो साहित्य शामिल है.

मार्क्स बताते हैं “ तमिल की कखगड़ी की ख़ासी माँग रहती है. ये बाल किताबें लंदन में जन्मी नई पीढ़ी का अपनी जड़ों से साक्षात्कार कराती हैं ”.

किताबों के अलावा कई ऐसी दुकानें हैं जहाँ प्रमुख तमिल पत्रिकाओं के अंक हमेशा मौजूद रहते हैं.

ऐसी ही एक लाइसेंस डेली-नीड्स की दुकान चलाने वाले गोपी दास हर महीने भारत से प्रमुख तमिल पत्रिकाएं मंगवाते हैं.

इनके पास कुमुदम, देवी, रानी, कुमकुमम, नक्कीरन, विघटन से लेकर इंडिया टुडे जैसी राजनीतिक पत्रिकाओं के तमिल में नवीन अंक देखे जा सकते हैं.

गोपी दास कहते हैं “ हमारे अधिकतर ग्राहक बंधे हुए हैं. ये लोग हर महीने की पहली तारीख से नई पत्रिकाओं का इंतज़ार करते हैं.”

इसी दुकान में पत्रिकाओं के पन्ने पलट रहीं पद्मा लक्ष्मी दो साल पहले ही लंदन आई हैं.

वे मानती हैं कि उनके पति की व्यस्त दिनचर्या के चलते किताबें ही खाली वक्त में उनकी साथी हैं.

पद्मा लक्ष्मी बताती हैं, "मझे तो पता ही नहीं था कि लंदन में दक्षिण भारतीय साहित्य इतनी सरलता से मिल जाएगा. मैं जब तक देवी और रानी के नए अंक नहीं पढ़ लेती चैन नहीं आता. ये पत्रिकाएं नए देश में मुझे अपनेपन का अहसास कराती हैं."

बदलती पसंद

पत्रिका
वैसे नई पीढ़ी की पसंद पुरानी पीढ़ी की पसंद से काफ़ी अलग है

साहित्य के इन मुरीदों से बात करने पर यह भी पता चलता है कि नई पीढ़ी की पसंद तेज़ी से बदल रही है. अब गंभीर तमिल साहित्य की जगह हल्की-फ़ुल्की पत्रिकाओं और फिल्म पत्रिकाओं की माँग ज़्यादा रहती है.

वैसे भी भारत में तमिल भाषी फिल्मों का बाज़ार बॉलीवुड फिल्मों से किसी भी तरह कमतर नहीं है.

कुछ यही हाल लंदन में भी है. यहाँ फिल्म कैसेट्स की दुकानों में हर तीसरी फ़िल्म दक्षिण भारतीय ही माँगी जाती है.

ऐसी ही एक दुकान के संचालक उदयन बताते हैं “ पहले मैं सिर्फ़ तमिल फिल्मों की कैसेट्स और सीडी ही रखता था लेकिन लोगों की माँग को देखते हुए फ़िल्म पत्रिकाएँ भी रखना शुरू कर दिया. इन पत्रिकाओं के लोग ख़ासे मुरीद है ”.

इन दुकानों पर लोगों की कतार देखी जा सकती है. कुछ पत्रिकाओं की माँग तो इतनी ज़्यादा है कि उनके नवीन अंक आते ही दुकान से नदारत भी हो जाते हैं.

ऐसे में कई लोग अपनी पसंदीदा पत्रिकाओं के अंक पहले से ही बुक करवा लेते हैं ताकि वे उन्हें समय पर पढ़ सकें.

साहित्य के इस संसार को ग़ौर से देखने के बाद यह भी पता चलता है कि लंदन में तमिल भाषी साहित्य जितना सुलभ है उतना अन्य दक्षिण भाषाई साहित्य नहीं.

कन्नड, तेलगू और मलयालम की गिनी-चुनी किताबें ही इन स्टॉलों पर नज़र आईं. इन्हें भी किसी ग्राहक की ख़ास माँग होने पर ही मंगवाया जाता है.

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