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सत्याग्रह की सार्थकता पर विचार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सत्याग्रह आँदोलन की सौवीं बर्षगांठ पर महात्मा गाँधी की पोती इला का कहना है कि बापू के बताए अहिंसा के रास्ते पर चलने से ही दुनिया का भला हो सकता है. सत्याग्रह आँदोलन की वर्षगांठ पर दक्षिण अफ्रीका में तीन दिनों का सम्मेलन का आयोजित किया गया है. इसमें महात्मा गाँधी के विचारों की प्रसंगिकता पर चर्चा होगी. यह आयोजन महात्मा गाँधी की पोती इला गाँधी की अगुआई में 'गाँधी डेवलपमेंट ट्रस्ट' की ओर से हो रहा है. सम्मेलन में सेनेगल, चाड, केन्या, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, भारत और अमरीका के प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे. महात्मा गाँधी ने अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए सबसे पहले सत्याग्रह का प्रयोग दक्षिण अफ्रीकी सरकार की रंगभेद नीति के ख़िलाफ़ किया था. इसके बाद यह भारत के स्वतंत्रता सेनानियों के लिए ब्रितानी हुकूमत के विरोध का मुख्य हथियार बन गया. इला गाँधी ने बीबीसी के साथ बातचीत में कहा कि तीन दिनों तक चलने वाले सम्मेलन में मौजूदा हालात में गाँधी की विचारधारा कितनी सार्थक है, इस पर विचार किया जाएगा. यह पूछे जाने पर कि अमरीका पर चरमपंथी हमले और सत्याग्रह की बरसी एक ही दिन पड़ रही है, इस पर वो क्या सोंचती हैं, इला गाँधी ने कहा, "ऐसी घटनाओं का एकसाथ होने के कुछ कारण होते हैं. आज हमें यह देखना पड़ेगा कि कौन सा रास्ता ठीक है, हिंसा का या अहिंसा का." वो कहती हैं, "अगर लोग अहिंसा के रास्ते पर चलने पर विचार करें तो इस दुनिया का बहुत भला हो सकता है. हम सम्मेलन में भी इसके लिए क्या किया जाए, इस पर विचार करेंगे." उन्होंने सत्याग्रह का मतलब समझाते हुए कहा कि बापू की नज़र में सब एक ही भगवान के बच्चे हैं, चाहे धर्म कोई भी हो. प्रासंगिकता इला कहती हैं कि अग़र बापू जिंदा होते तो अभी हो रही लड़ाईयों और दंगों से उन्हें बहुत दर्द होता. वो कहती हैं, "लेकिन एक बात है कि बापू हमेशा आशावादी रहे. वो कभी भी निराशावादी नहीं थे. इसलिए अग़र वो जिंदा होते तो बहुत सारा काम करते जो दुनिया के हित में होता. वो चुप कभी नहीं बैठते." उन्होंने बताया कि सत्याग्रह की वर्षगाँठ पर आयोजित सम्मेलन में दुनिया भर में फैली हिंसा, भ्रष्टाचार और उपभोक्तावाद पर चर्चा की जाएगी और इससे निपटने के लिए क्या उपाए हो सकते हैं, उसे तलाशने की कोशिश की जाएगी. गाँधी जी के सहयोग से स्थापित फीनिक्स विस्थापित केंद्र के अनुभवों का जिक्र करते हुए इला गाँधी ने कहा, "बचपन में मेरे पिता और माँ हर रोज़ शाम को प्रर्थना करते थे. इसमें सभी धर्मों को सम्मान दिया जाता था. यही सत्याग्रह में भी बताया गया." उन्होंने कहा कि इस वर्ष फरवरी में दक्षिण अफ्रीकी संसद में सत्याग्रह का जिक्र होने से वहाँ की युवा पीढ़ी में गाँधी जी को समझने की इच्छा जगी है. | इससे जुड़ी ख़बरें गांधी का अस्थिवाहक ट्रक फिर चलेगा18 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस चर्चिल की मंशा थी, 'गांधी मरें तो मरें'01 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस नाथूराम के भाई गोपाल गोडसे की मृत्यु28 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस गांधी और शास्त्री के मूल्य: कितने प्रासंगिक? 02 अक्तूबर, 2005 | आपकी राय साबरमती से एक बार फिर दांडी यात्रा शुरू 12 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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