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रविवार, 27 अगस्त, 2006 को 19:37 GMT तक के समाचार
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संवेदनशील मनोरंजन का एक नया मुहावरा

हृषिकेश मुखर्जी
हृषिकेश मुखर्जी ने हास्य और हल्की-फ़ुल्की फ़िल्मों की एक नई धारा विकसित की
भारतीय सिनेमा को 'आनंद' और 'गुड्डी' जैसी सहज और संवंदनशील फ़िल्में देने वाले फ़िल्मकार हृषिकेश मुखर्जी ने 1970 के दशक में भारत के शहरी और शिक्षित वर्ग को संवेदनशील मनोरंजन का एक नया मुहावरा दिया था.

उनकी फ़िल्मों में न ही श्याम बेनेगल, एमएस सथ्यू और गोविंद निहलानी जैसे सिनेमाकारों की 'अंकुर', 'गरम हवा' और 'आक्रोश' जैसी कृतियों का कटु यथार्थ था और न ही प्रकाश मेहरा की 'ज़ंजीर', रमेश सिप्पी की 'शोले' और यश चोपड़ा की 'दीवार' सरीखी व्यावसायिकता और अतिनाटकीयता.

हृषिकेश मुखर्जी की फ़िल्में 1960 और 1970 के दशक के मध्यम वर्गीय समाज की आकांक्षाओं, कुंठाओं और अंतर्द्वंद्वों का आईना हैं.

हृषिकेश मुखर्जी की आरंभिक फ़िल्मों के पीछे डिसिका की 'बायलॉजिक थीव्स' जैसी यूरोपीय नवयथार्थवादी फ़िल्मों से प्रेरित बिमल राय की फ़िल्मों की छाप है.

मानवीय चरित्र

बिमल राय से प्रभावित तीन सिनेमाकार, बासु भट्टाचार्य, गुलज़ार और हृषिकेश मुखर्जी 60 और 70 के दशक में उभरे और इनमें हृषिकेश मुखर्जी सर्वाधिक लोकप्रिय हुए.

राजेश खन्ना
'आनंद' फ़िल्म अपनी संवेदनशीलता के लिए आज भी याद की जाती है

हृषिकेश मुखर्जी की 'अनुपमा', 'सत्यकाम', 'आनंद' और 'अभिमान' जैसी फ़िल्मों ने धर्मेंद्र, राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन जैसे लोकप्रिय फ़िल्मी सितारों को विश्वसनीय मानवीय चरित्रों का जामा पहनाया.

हृषिकेश की आरंभिक फ़िल्मों में बिमल राय का प्रभाव भी था और इतालवी नवयथार्थवाद का प्रभाव भी लेकिन 1970 के दशक में उन्होंने हास्य और हल्की-फ़ुल्की फ़िल्मों की एक नई धारा विकसित की.

उन्होंने 'बुड्ढा मिल गया', 'चुपके-चुपके', 'गोलमाल', 'ख़ूबसूरत' और 'नरम-गरम' जैसी फ़िल्में बनाईं और ये सब काफ़ी सफल भी रहीं.

'ख़ूबसूरत' हृषिकेष मुखर्जी की अंतिम सफल फ़िल्म थी. इसके बाद हिंसा और सेक्स सिनेमा पर हावी हो गया और हृषिकेश मुखर्जी, बासु भट्टाचार्य और गुलज़ार एक तरह से हाशिए पर चले गए.

सेंसर बोर्ड अध्यक्ष के रुप में
 जब मुझे सेंसर के लिए फ़िल्में देखनी होती हैं तो आधी रात के बाद दरवाज़ा बंद करके देखता हूँ. मैं नहीं चाहता कि मेरे नाती-पोतियों पर इस तरह की फ़िल्मों की छाया पड़े
हृषिकेश मुखर्जी

1940 में कोलकाता की हाज़रा रोड पर युवा मृणाल सेन और सलिल चौधरी के साथ विश्व सिनेमा पर बहस करने वाले हृषिकेश मुखर्जी ने लगभग 50 स्तरीय फ़िल्मों का निर्माण किया.

इसमें से आधी से अधिक व्यावसायिक रुप से बेहद सफल रहीं.

1990 में सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष बने तो वे इस दौर की फ़िल्मों से बेहद नाराज़ थे.

उन्होंने एक बार कहा था, "जब मुझे सेंसर के लिए फ़िल्में देखनी होती हैं तो आधी रात के बाद दरवाज़ा बंद करके देखता हूँ. मैं नहीं चाहता कि मेरे नाती-पोतियों पर इस तरह की फ़िल्मों की छाया पड़े."

इसमें कोई शक नहीं कि हृषिकेश मुखर्जी की अधिकांश फ़िल्में आने वाली पीढ़ियों का भी स्तरीय मनोरंजन करती रहेंगीं.

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