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रविवार, 27 अगस्त, 2006 को 17:48 GMT तक के समाचार
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'कम समय में अच्छी फ़िल्में बनाते थे हृषिकेश दा'

हृषिकेश मुखर्जी
हृषिकेश मुखर्जी सामाजिक सरोकारों के विषय लेकर फ़िल्में बनाते रहे
हृषिकेश दा के साथ मेरा अनुभव बहुत ही अच्छा रहा है. मैंने उनके साथ 'सत्यकाम', 'चुपके-चुपके' और 'अनुपमा' जैसी फ़िल्में की हैं.

हृषिकेश दा की इन फ़िल्मों से मुझे ख़ास पहचान मिली है. मैं उन्हें एक अच्छे इंसान और अच्छे दोस्त के रूप में याद करती हूँ.

उनकी मृत्यु का बहुत ज़्यादा अफ़सोस है पर पिछले कुछ दिनों से वो काफ़ी बीमार चल रहे थे.

उनके साथ बीते दिनों में वो हमारे दोस्त भी थे और निर्देशक भी. वो शतरंज के शौकीन थे और ख़ूब चुटकुले सुनाते थे इसलिए शूटिंग सेट पर ऐसा लगता ही नहीं था कि काम कर रहे हैं बल्कि पिकनिक जैसा माहौल रहता था.

मुझे याद है जब 'अनुपमा' की शूटिंग चल रही थी.

इस फ़िल्म के लिए उन्होंने मुझसे कहा था कि देखो यह एक बिना माँ की बेटी की कहानी है इसलिए ज़्यादा संवारकर बाल मत बनाओ. यह ठीक नहीं लगेगा.

मैं बहुत ज़िद्दी थी और इस पर उनसे ख़ूब बहस करती थी.

वो मुझे समझाते थे कि देखो मैं अच्छी रोशनी का इंतज़ाम करूँगा जिसमें तुम बहुत अच्छी लगोगी. ख़ुदा के लिए ऐसे बाल मत बनाओ.

आज जब कभी मैं वो फ़िल्म देखती हूँ तो लगता है कि मुझे उनकी बात मान लेनी चाहिए थी.

महान फ़िल्मकार

उनके साथ काम के दौरान ऐसा कभी नहीं महसूस होता था कि जैसे हम किसी तरह के तनावपूर्ण माहौल में काम कर रहे हों.

 उनकी अधिकतर फ़िल्में मध्यम वर्ग पर आधारित रहीं. मध्यम वर्गीय परिवार, उनकी पारिवारिक अनुभूति और उस समय का एक ख़्याल जिसमें पारिवारिक मूल्यों की बात होती थी, उनकी फ़िल्मों के विषय होते थे.

बहुत ही स्वाभाविक होकर काम करने की आदत थी उन्हें.

उनकी अधिकतर फ़िल्में मध्यम वर्ग पर आधारित रहीं. मध्यम वर्गीय परिवार, उनकी पारिवारिक अनुभूति और उस समय का एक ख़्याल जिसमें पारिवारिक मूल्यों की बात होती थी, उनकी फ़िल्मों के विषय होते थे.

उस तरह का काम तो आज के दौर में देख पाना मुश्किल ही है. आज एनआरआई जैसे विषयों पर जो फ़िल्में बन रही हैं, वो इस तरह की फ़िल्म कभी न बनाते.

अच्छे फ़िल्मकार तो वो थे ही, एक अच्छे तकनीक विशेषज्ञ के रूप में भी उनकी ख़ास पहचान थी. इसका फ़ायदा उनकी फ़िल्मों को मिलता था.

कम समय में अच्छी फ़िल्म बनाना और वो भी अच्छे संगीत के साथ हृषिकेश दा की ख़ासियत थी.

आख़िरी शब के हमसफ़र...

ऐसा नहीं है कि आख़िर के दिनों में वो ग़ुमनामी के अंधेरों में रहे. दरअसल इन आख़िरी दिनों में वो ख़ुद ही लोगों के साथ बहुत मिलना पसंद नहीं कर रहे थे.

इसकी दो वजहें थी. एक तो वो काफ़ी बीमार चल रहे थे. ऐसे में लोगों से बहुत मिलने का मन नहीं होता है और दूसरी वजह यह रही होगी कि उनके साथ के कई लोग गुज़र चुके हैं.

दादा मुनि उनके ख़ास दोस्त थे. बिमल रॉय से उनकी अच्छी दोस्ती थी. ये तमाम लोग भी अब नहीं रहे. हाँ अमित जी (अमिताभ) कभी-कभी मिलने जाते रहे.

उनकी कमी हम सभी को बहुत खलेगी. अभी तो गुलज़ार जी हैं जो इस तरह की फ़िल्में बनाते हैं वरना उनके साथ ही एक तरह की फ़िल्मों का युग ख़त्म हो गया.

(पाणिनी आनंद से हुई बातचीत के आधार पर)

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