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लड़की होने की व्यथा है मातृभूमि में | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत सरकार के स्वास्थ विभाग के एक सर्वेक्षण के मुताबिक पिछले सौ सालों में देश में 3.5 करोड़ लड़कियों को इस दुनिया में आने से पहले ही मार दिया गया यानी जन्म से पहले ही उनकी भ्रूणहत्या कर दी गई. इससे तो यही झलकता है कि स्त्री को देवी का दर्जा देने वाले भारतीय समाज में लड़की होना ही अपने आप में कठिन चुनौती है. विकास के दावों और प्रगति के नारों के बीच औरतों की बेआवाज़ लुप्त होती प्रजाति की यही कहानी कहती है फ़िल्म मातृभूमि. समाज में लड़कियों की स्थित को लेकर यह फ़िल्म दिलचस्प और रोंगटे खड़े करने वाली परिस्थितियों के बीच कई सवाल खड़े करती चलती है. आख़िर में लड़की फ़िल्म एक ऐसे गाँव की कहानी है जहाँ भ्रूण हत्याओं के कारण एक भी औरत बचीं नही है. ऐसे में एक परिवार अपने लिए दूसरे गाँव से बहू ख़रीद कर लाता है. पाँच बेटों के सथ ससुर भी बहू का यौन शोषण कर सौदे की पूरी क़ीमत वसूलता है. सबसे छोटा बेटा बहू से सहानुभूति और प्रेम दिखाने लगता है तो उसकी हत्या कर दी जाती है. लड़की भागने की कोशिश करती है मगर पैसों के लालच में अंधा पिता शरण देने से इनकार कर देता है और छोटी जात के नौकर के साथ भागने के परिणाम स्वरूप गाँव में जातीय युद्द छिड़ जाता है. सज़ा के तौर पर बहू को सारे गाँव से बलात्कार का शिकार होना पड़ता है, और इन बलात्कारों की वजह से फिर एक लड़की का जन्म होता है. शहर बनाम देहात फ़िल्म के विषय चयन के बारे में निर्देशक मनीष झा बताते हैं, "बचपन से मैं भारतीय समाज में औरतों की दशा देख कर सोच में पड़ जाता था, किसी के घर लड़की पैदा हो तो मुर्दनी छा जाती थी, जबकि लड़का पैदा होने पर जीवन का सबसे बड़ा त्यौहार मनाया जाता था."
स्कूल-कॉलेज में भी कभी नही बताया जाता कि भारत में लड़कियों की संख्या कम हो रही है. ये एक ऐसा विषय है जिसे जानते सब हैं, उसके शिकार भी होते हैं मगर उसका सामना नहीं करना चाहते. मनीष कहते हैं, "दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में लोग कहते हैं कि ये सब उत्तर प्रदेश, बिहार में होता है, वहाँ लोग मानते हैं कि ये देहात या आदिवासी इलाक़ों में होता है." मनीष झा कहते हैं कि सच ये है कि शहरी इलाकों में औरतों का प्रतिशत मर्दों से काफ़ी कम है और आदिवासी इलाक़ों में आज भी एक तरह से संतुलन क़ायम है. मतलब साफ़ है कि पढ़े लिखे और समझदार माने जाने वाले शहरी लोगों के बीच ये समस्या ज़्यादा गहरी है. हंगामा मनीष झा कहते हैं कि असल में सैकड़ों साल की परंपरा से एक पक्की राय क़ायम हो गई है.
वह याद करते हैं कि उनकी फ़िल्म को लेकर टोरंटो में किस तरह हंगामा मच गया था. मनीष झा बताते हैं, "वहाँ भारतीय मूल के लोग काफी संख्या में हैं. मैंने तथ्यों की पड़ताल की तो पता चला कि वहाँ के भारतीय लोग गर्भ में ही बच्चे का लिंग परीक्षण करवा कर लड़की होने पर अमरीका जाकर गर्भपात करवा लेते हैं क्योंकि कनाडा में गर्भपात के नियम काफ़ी कड़े हैं." "इसलिए ये कहना बिल्कुल ग़लत है कि अशिक्षित या पिछड़े इलाक़ों में लड़कियों की भ्रूण हत्या जैसी समस्याएँ होती हैं. एक समस्या पर केंद्रित फ़िल्म बनाने के लिए संसाधन जुटाने कितने मुश्किल रहे, इस सवाल पर मनीष कहते हैं कि 2002 में 'ए वेरी वेरी साइलेंट' नाम की उनकी लघु फ़िल्म को कॉन फ़िल्म महोत्सव में जूरी पुरस्कार मिला था, ये फ़िल्म बेघर महिलाओं की बेबसी पर बनी थी. "इस फ़िल्म के कारण काफ़ी लोगों की रुचि उनके साथ काम करने की हो गई थी, इसलिए फीचर फ़िल्म बनाने में आसानी हो गई." 28 दिनों में मनीष झा याद करते हैं, "कलाकारों को हमने पूरी स्क्रिप्ट पढ़ने को दी तो सभी पूरे मन से चाहते थे के फ़िल्म बननी चाहिए. हमने 14- 15 घंटे तक लगातार शूटिंग करते हुए 28 दिनों में शूटिंग पूरी की." भारत में सार्थक फ़िल्मों की कमी की वजह के बारे में मनीष कहते हैं, "सरकारी सहयोग के न होने से भारत में फ़िल्म निर्माण निजी व्यवसाय की तरह माना जाता रहा है, जहाँ कलातत्व या रचनात्मकता की बजाय बिकाऊपन पर पूरा जोर होता है." "इसलिए हमारे यहाँ कलाकारों के चयन से लेकर आईटम गीत तक हर चीज़ महत्वपूर्ण होती है सिवाय कहानी के. एनएफडीसी जैसी संस्थाओं का 80 फ़ीसदी बजट उनके प्रशासनिक कामों में ख़र्च हो जाता है, शेष 20 प्रतिशत से क्या फ़िल्में बन सकती हैं." इसके बाद मनीष एक ऐसी फ़िल्म पर काम करने जा रहे हैं जो प्रेम कहानी होगी और जिसका नायक एक दिन में दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी क़रार दे दिया जाता है. |
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