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'शाहरूख़ ख़ान का एक सपना...' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हिंदी फ़िल्मों में ‘रोमांस किंग’ की तरह माने जाने वाले अभिनेता शाहरुख़ ख़ान का सपना ऐसी फ़िल्म बनाने का है जिसकी भाषा हिंदी हो, जो भारत की कहानी बताती हो और जिसे देखने दुनिया का हर इंसान जाए. शाहरुख़ अपने प्रोडक्शन में बनी फ़िल्म ‘पहेली’ के प्रचार के लिए लंदन में थे. इस मौक़े पर उन्होंने कहा कि उनके लिए ऐसी फ़िल्म का मानक इतालवी फ़िल्म ‘लाइफ़ इज़ ब्यूटीफ़ुल’ है. शाहरुख़ ने कहा, “मैं उस फ़िल्म की भाषा नहीं समझता, उसके कलाकारों को भी नहीं जानता मगर वो इतनी अच्छी फ़िल्म है जिसे देखने वाला हर व्यक्ति उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता.” उन्होंने कहा कि वह भी ऐसी ही फ़िल्म बनाना चाहते हैं जो भारतीय फ़िल्मों का प्रतिनिधित्व करती हो और लोग भले ही उसकी भाषा नहीं समझ पाएँ मगर देखने ज़रूर जाएँ. शाहरुख़ ने कहा, “मैं, क्राउचिंग टाइगर हिडेन ड्रैगन जैसी फ़िल्म नहीं बनाना चाहता. इंशाअल्ला मैं ऐसी फ़िल्म बनाना चाहता हूँ जिसे बनाने के बाद जब मैं लॉस एंजेलेस जाऊँ तो लोग उसे देखने के लिए लाइन लगाकर खड़े हों.” अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान उनसे जब हिंदी फ़िल्मों के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान नहीं बना पाने के बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि इसमें अभी पाँच से दस साल तक का समय लग सकता है. उन्होंने कहा, “जब मैं ये कहता हूँ तो इसलिए नहीं कि हम वैसी फ़िल्में नहीं बना पा रहे हैं. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि फ़िल्मों की मार्केटिंग, उसे बेचने और उसके डिस्ट्रीब्यूशन के क्षेत्र में मेहनत करने की ज़रूरत है.” शाहरुख़ के अनुसार अभी हिंदी फ़िल्मों के प्रिंट लंदन जैसे शहरों में लगभग डेढ़ सौ तक जाते हैं मगर जब 700 से 900 तक प्रिंट जाने लगेंगे तब हिंदी फ़िल्में इस स्तर पर आएँगी कि वो पहचान बना सकें. उन्होंने कहा, “यही वजह है कि मैं पाँच से दस वर्ष तक के समय की बात करता हूँ और इसमें पैसा भी काफ़ी लगेगा, ये काफ़ी ख़र्चीला होगा.” 'पेशेवर रवैया' वैसे शाहरुख़ एक तरफ़ तो लंदन में आकर हिंदी फ़िल्मों को प्रभावी बनाने के लिए पेशेवर रवैये की बात कर रहे थे वहीं दूसरी तरफ़ वो जिस संवाददाता सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे उसी में सबसे पीछे की कतार से एक व्यक्ति ने बताया कि पाकिस्तानी अभिनेत्री मीरा भी वहाँ लोगों के बीच बैठी हैं.
इसके बाद सबसे पीछे बैठी मीरा ने वहाँ खड़े होकर शाहरुख़ के लिए अपने लगाव का ज़िक्र किया और शाहरुख़ से पूछकर उन्हें मंच पर फूल भी देने पहुँचीं. इस संवाददाता सम्मेलन में पहुँचे लंदन के अन्य पत्रकार इस घटनाक्रम से थोड़े अचंभे में थे कि आयोजकों को मीरा की मौजूदगी का पता नहीं था या उन्होंने मीरा को नज़रअंदाज़ कर दिया. पत्रकार इससे बहुत ख़ुश नहीं दिखे. इसके बाद लंदन की एक पत्रिका टाइम आउट के पत्रकार ने उसी संवाददाता सम्मेलन में सबके बीच अपनी ये शिकायत भी दर्ज करा दी कि उन्हें हिंदी फ़िल्मों की समीक्षा से जुड़े कार्यक्रमों के लिए निमंत्रण ही नहीं मिलता तो भला वो फ़िल्मों को आगे बढ़ाने में मदद कैसे करें. संवाददाता सम्मेलन के बाद शाहरुख़ और उसी कार्यक्रम में हिस्सा लेने पहुँचीं रानी मुखर्जी से पत्रकारों को अलग से साक्षात्कार का समय दिया गया था मगर उसके लिए एक-दो नहीं पाँच घंटे का इंतज़ार करवाया गया. कुछ पत्रकार तो इससे नाराज़ होकर चले भी गए क्योंकि उनका तर्क था कि एक तरफ़ तो भारत से बाहर हिंदी फ़िल्मों के प्रचार प्रसार की बात हो रही है और वहीं आयोजक अगर इतना इंतज़ार करवाएँगे तो हिंदी फ़िल्मों का प्रचार संभव कैसे होगा. |
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