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सुरों की साधना का संघर्ष | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लोककला, संगीत और गायन में समृद्ध राजस्थान के थार मरूस्थल के रूकमा एक ऐसा नाम है जिसने महिला गायन की नई परंपरा प्रारंभ की है. लोक संगीत में प्रवीण राजस्थान मांगणियार बिरादरी में महिलाओं को मंच-समारोहों में गायन की इजाज़त नहीं थी. लेकिन रूकमा ने इस परंपरा को तोड़ नया इतिहास रचा है. मध्यप्रदेश सरकार ने रूकमा को इस वर्ष के राष्ट्रीय देवी अहिल्या अलंकरण से नवाज़ा है. रूकमा को इसके साथ एक लाख रुपए भी मिलेंगे. रेगिस्तान में सुरों की मलिका रूकमा जब ढोलकी थाप और हारमोनियम की संगत पर अपने सुरों का जादू बिखेरती हैं तो मरूस्थल का संसार भी सतरंगा हो जाता है. पोलियोग्रस्त रूकमा बचपन से ही दोनों पैरों से लाचार हैं. लेकिन आवाज़ के जादू ने रूकमा को कभी अपाहिज होने का एहसास नहीं कराया. जीवन की मार रूकमा ने कोई पंद्रह साल पहले तब गाना शुरू किया जब पति इमाम की मृत्यु हो गई और घर में कोई कमाने वाला नहीं रहा. मांगणियार मुस्लिम समाज की रूकमा को गायकी की तालीम घर में ही माँ आसू से मिली थी. लेकिन रूकमा के पहले कार्यक्रम में ही समाज में हलचल मच गई. आसू कहती हैं, “हमारे यहाँ औरतों का गाना मना था. मैंने इसे तोड़ा तो लोगों ने बहिष्कार कर दिया. मैंने समाज को समझाया कि वो विकलांग है और गुज़र-बसर के लिए गायन में कोई बुराई नहीं है. धीरे-धीरे समाज मान गया.”
अब रूकमा के ही नक़्शे क़दम पर उसकी बहन अकला और चचेरी बहन दरियाब भी गाने लगी है. बाड़मेर के सामाजिक कार्यकर्ता भुवनेश जैन कहते हैं, ‘‘इस लोक कलाकार ने बसंत कम और पतझड़ ज्यादा देखे हैं.’’ रूकमा का निकाह सिद्दीक़ के साथ तय हुआ था, लेकिन सिद्दीक़ ने अकला का हाथ थाम लिया. रूकमा का विवाह उसकी उम्र से कई पड़ाव बड़े ईमाम से कर दिया जो कुछ सालों बाद चल बसा. शौहर की मौत के बाद अभावों की जिंदगी में रूकमा के भीतर छुपे कलाकार को मंच पर अवतरित कर दिया. माटी की गंध रूकमा को सबसे ज़्यादा बालम गीत पसंद है, जो प्रकारांतर से राजस्थान का परिचायक गीत बन गया है. मांगणियार लोक कलाकार परिषद के अध्यक्ष समंदर ख़ान कहते हैं कि रूकमा के गीतों में राजस्थान की माटी की गंध छुपी है, रूकमा का मुक़ाम गायकी में बहुत ऊँचा है. रूकमा कहती हैं, “रियासती काल में राजघरानों में कला को प्रश्रय मिलता था. अब सरकार का प्रश्रय तब तक है जब तक आपके गले में सुर.” सैंकड़ो साल पहले हिंदू से मुसलमान बने मांगणियार अपने जजमानों या प्रश्रयदाता सामंतों के लिए गाते रहे हैं. बदले में जजमान उन्हें पुरस्कारों से सम्मानित करते रहे. यहीं उनकी जीविका का सहारा बना. जजमान और कलाकारों में कहीं-कहीं वह रिश्ता अब भी मौजूद है. रूकमा के जजमान रामसर गाँव के जोगेंद्र सिंह राजपूत कहते हैं, ‘‘इन कलाकारों की मदद करना, एक पापंपरिक धर्म है. इसीलिए हम अब भी इस रिश्ते का निर्वाह करते हैं.’’ अपनी माँ की इस सफलता पर सख़ी खाँ कहते हैं, “माँ को बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा. लेकिन उसने हार नहीं मानी. आज रूकमा कई कलाकारों के लिए जीवन का ध्येय बन गई है.” |
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