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गुरुवार, 03 फ़रवरी, 2005 को 09:10 GMT तक के समाचार
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इराक़ में जीवन का नया रंग

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ये चित्र बना हुआ है ब़गदाद में फ्रांसीसी दूतावास की दीवार पर
बम विस्फोट, आत्मघाती हमलों और अमरीकी वाहनों से भरी मनहूस सी लगने इराक़ी राजधानी ब़गदाद में ज़िदगी ने अपना हल्का सा रंग दिखाया है.

शहर की हर इमारत के आगे कंक्रीट की मोटी मोटी दीवारें बनी हुई हैं. ये दीवारें चार मीटर ऊंची हैं जो बमों और मोर्टार हमलों से इमारतों का बचाव करती हैं.

लेकिन स्वभाव से जीवट माने जाने वाले इराक़ियों ने इन दीवारों को अपनी कला के रंग से भरना शुरु कर दिया है.

इन दीवारों पर लोग चित्रकारी कर रहे हैं और मज़े की बात है कि ये चित्र आम जीवन से जुड़े हैं.

ये चित्र युद्ध और अमरीका विरोधी नहीं हैं बल्कि दर्शाते हैं युवकों की इच्छाओं और पारंपरिक लोक कलाओं को.

बीबीसी के बगदाद ब्यूरो से कुछ फर्लांग दूर फ्रांसीसी दूतावास की इमारत के बाहर की दीवार पर कई चित्र एक साथ लगे हैं.

जंगली घोडे, उड़ने वाले कालीन, ऊंची और असंभव लगने वाली इमारतें, मीनारें , इराक़ी किसान, ट्रैक्टर , घर, इंतज़ार करती महिला. ऐसे ही चित्रों से भरी है ये दीवार.

हालांकि हर दीवार पर पहले से एक कबूतर बना हुआ है जो शांति का प्रतीक माना जाता है लेकिन इराक़ियों को शायद ही इसका पता हो.

बेहतरीन चित्रकला

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युवतियों के चित्र युवा इराक़ियों की तमन्नाओं के परिचायक हैं.

रायटर्स संवाद समिति की इमारत के बाहर की दीवार पर थोड़े अलग से चित्र हैं.

ये चित्र किसी कला विशेषज्ञ के बनाए हुए हैं. जो इराक़ के किसी कॉलेज़ में पढ़ाया करते हैं.

उनका नाम किसी ने पूछा नहीं और वो भी कुछ हफ्ते तक चित्र बनाते रहे . चित्र पूरा होते ही चले गए.

ये चित्र हैं इराक़ी झंडों के, फूलों के, कुछ पिकासो के चित्रों की नकल की गई हैं.

लेकिन इन सबसे अलग सबसे सुंदर है बीबीसी ब्यूरो की दीवारों पर बने चित्र.

जी हां, इन दीवारों पर इराक़ के प्राचीन इतिहास को दर्शाते हैं.

शक्ले कोण के आकार में बनी हैं जैसे सुमेर सभ्यता के समय बनते थे.

बेबीलोन काल के रथ और प्राचीन शासकों की दूरदृष्टि इन चित्रों में हैं जो शायद बताती है यह देश कई बार कठिन समय से गुज़र चुका है लेकिन कभी बर्बाद नहीं किया जा सका.

शहर के अन्य हिस्सों में सुरक्षा इतनी कड़ी है कि कुछ भी देखने के लिए बख्तरबंद वाहनों की झिर्री का इस्तेमाल करना पड़ता है और इस छोटी झिर्री से दुनिया ठीक दिखती नहीं.

सद्दाम के चित्र

मैं पहले भी इराक़ आ चुका हूं. तब यहां चित्रों का सिर्फ एक ही विषय हुआ करता था. सद्दाम, सद्दाम और सद्दाम.

पश्चिमी वेशभूषा में, अरबी शेख के रुप में, रुसी साम्यवादी के रुप में और न जाने किन रुपों में हर तरफ बड़ी बड़ी होर्डिंगों पर सद्दाम ही दिखते थे.

हालांकि अब ऐसे चित्र नहीं दिखते बल्कि जीवन का एक छोटा सा रंग दिखाई पड़ने लगा है. लेकिन ये दीवारें और इन पर बने चित्र कब तक ऐसे ही रह सकेंगे, कहना मुश्किल है.

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