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भारत की पहचान बॉलीवुड और गांधी से | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका के हॉलीवुड से कौन वाकिफ नहीं है लेकिन मुझे पहला बड़ा झटका वहाँ तब लगा जब महसूस हुआ कि अमेरिका में भारत की भी एक बड़ी पहचान हिंदी फ़िल्मों की वजह से ही है. लंदन से दस घंटे के सफ़र और कोई डेढ़ घंटे इमीग्रेशन पर काटने के बाद जब टैक्सी तक पहुँचे तो पता चला कि ड्राइवर बात करने के मूड में था. और जब उसे पता चला कि हमरा भारतीय कनेक्शन है तो सीधे बात चली फ़िल्मों की और सीधे पहुँची अमिताभ बच्चन और शोले तक. उत्तरी अफ़्रीका से अमरीका में भाग्य अजमाने आए हमारे यह ड्राइवर वकील होने के बावदूद टैक्सी चला रहे थे और उनके अतीत की सुखद यादों में दोस्तों के साथ शोले भी शामिल थी. टेस्कसास राज्य का बड़ा शहर ह्यूस्टन बड़ी गाड़ियों, चौड़ी सड़कों और उँची अट्टालिकाओं की चकाचौंध. और इसी सब में शामिल है संपदा वहाँ रहने वाले सफल और धनी भारतीयों की. अमरीका में कम से कम चार दशक गुज़ार चुके अधिकाँश भारतीय काफ़ी संपन्न हैं और उन्होंने जो बनाया है यहाँ उसे दिखाने का उन्हें शौक भी है. चमकती ‘लेक्सस’ ‘बीएमडब्लू’ गाड़ियों और विशालकाय घरों में रहने वाले भारतीय अब आर्थिक संपन्नता के बाद, राजनीति में रूचि लेने लगे हैं. और राष्ट्रपति बुश की धनाड्यों को लुभाने वाली नीतियों के चलते धनी भारतीय अक्सर बुश के ही समर्थक मिले. पहचान गाँधी से भी फिल्मों के अलावा महात्मा गांधी के कारण भी भारतीयो की यहां एक अलग सी पहचान है.
हालांकि बुश के गृह प्रदेश में जब मैंने बुश की लोकप्रियता की थाह लेनी चाही तो पता चला कि लोग उनकी ‘नेक्सट डोर नेबर’ वाली छवि के कायल हैं. वहीँ बुश के शहर क्रोफ़र्ड में जहाँ मुझे लगा कि लोगों को भारत के बारे में माहात्मा गाँधी के सिवा कुछ पता नहीं. पड़ोस के जॉर्जिया राज्य में अटलाँटा शहर में मार्टिन लूथर किंग मेमोरियल में गाँधी का नाम हर जगह लिया जाता है. लेकिन पुराने लोग दुखी रहते हैं कि गाँधी और किंग की सोच अब शायद कुछ ख़ास माने नहीं रखती. वहाँ ऐथेन्स विश्विद्यालय में छात्रों से बात कर पता चला कि उन्हें लगता है कि सारी दुनिया अमरीका से जलती है. अंतराष्ट्रीय संबधों में शोध कर रहे छात्र संयुक्त राष्ट्र के औचित्य और महत्व पर सवाल उठा रहे थे. लेकिन यह ज़रूर है कि इन छात्रों को दुनिया के हर कोने में होने वाली ख़बरों का भान था. बड़ा शहर निराले रूप फिर मौका मिला शहरों के शहर न्यूयॉर्क को देखने का, सही मायनों में कॉस्मोपोलिटन शहर जहाँ दुनिया के हर कोने से आए लोग कंधे से कंधा मिलाते हैं. पहुँचते ही पहला झटका लगा उस होटल में जहाँ बुकिंग थी. पता चला कि उस रात कमरे का किराया उस किराए से दो सौ डॉलर ज़्यादा लगेगा जो हमें पहले बताया गया था. लिहाज़ा, अपना सामान लिए हम सड़क पर.
किसी तरह ठिकाना मिला और फिर शुरू हुआ शहर को समझने का सिलसिला. वहाँ चलने वाली 60 प्रतिशत टैक्सियाँ एशियाई मूल के ड्राइवर चलाते हैं इसलिए हिंदी-उर्दू में बात करना बहुत आसान था. और कई ऐसे इलाकों का भ्रमण हुआ जो दिल्ली के करोल बाग की याद दिला दें आपको. मैनहैटन की पॉश दुकानों और बुटीको के बाहर फ़ुटपाथ पर गुची और लूई वीटोन के हैंडबैग दस प्रतिशत कीमत पर मिल जाते हैं आसानी से. बस पुलिस को देखते ही यह दुकानदार सामान समेट कर भाग लेते हैं. पुलिस से ही एक दिन लादेन के बारे में हमने बात की. वो दिन था जब चुनाव पूर्व लादेन का नया वीडियो जारी हुआ था और पूरे न्यूयॉर्क में पुलिस ही पुलिस नज़र आ रही थी. हाँलाकि हमें जवाब साफ़ तो नहीं मिला लेकिन यह साफ़ था कि ग्यारह सिंतबर के हमले की भयावहता लोगों को अच्छी तरह से याद थी. कोशिश अगली बार न्यूयॉर्क और वॉशिंगटन में जॉन कैरी का बोलबाला था और मज़ेदार बात यह है कि ख़बरों के अनुसार अमरीका में जहाँ भी पोर्न यानि अश्लील फ़िल्मों की खपत ज़्यादा है वहाँ डेमोक्रेट समर्थक ज़्यादा है. अमरीका में पार्टी के अनुसार यह विभाजन तो साफ़ था. मध्य अमरीका के राज्य काफ़ी हद तक कट्टरपंथी, बाहरी दुनिया से अनजान, धार्मिक और रिपब्लिक्न समर्थक. वहीँ दोनों तटों से लगे राज्यों में मुक्त विचारधारा, समलैंगिकों की शादी और गर्भपात जैसे विषयों पर चुनाव की आज़ादी का समर्थन और वहीं डेमोक्रेट पार्टी का समर्थन भी. जब अमरीकी जनता ने बुश को बहुमत से चुने जाने का निर्णय सुना दिया तो बाहर की दुनिया में शायद कुछ लोगों ने आश्चर्य जताया हो लेकिन मुझे याद है कि चुनाव से दस दिन पहले एक भारतीय डेमोक्रेट ने दूसरे भारतीय रिपबल्किन से बड़ी संजीदगी से कहा था “इस बार बाज़ी आपकी, हम अगली बार कोशिश करेंगे.” |
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