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मंगलवार, 21 दिसंबर, 2004 को 14:36 GMT तक के समाचार
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रेस की तैयारी
अचला शर्मा
रेस की रिकॉर्डिंग करती हुईं अचला शर्मा और स्टूडियो मैनेजर नील बुल
बीबीसी हिंदी सर्विस - ख़बरों की दुनिया में तो पिछले छह से भी अधिक दशकों से यह नाम अपने-आप में एक पहचान रहा है.

मगर दुनिया भर से जुटी ख़बरों को ठोक-बजाकर हिंदीभाषी जनमानस तक पहुँचानेवाली बीबीसी हिंदी सर्विस की एक और पहचान रही है - रेडियो नाटक - बीबीसी हिंदी सेवा से प्रसारित होनेवाले वर्षांत कार्यक्रमों की एक अटूट और आवश्यक कड़ी.

आवश्यक इसलिए क्योंकि वर्षांत कार्यक्रमों में अगर नाटक ना बजे तो फिर श्रोताओं की प्रतिक्रिया क्या रहेगी इसका अंदाज़ा लंदन पहुँचनेवाले उनके पत्रों से ख़ुद ही लग जाता है.

 हर वर्ष के अंत में मेरी कोशिश रहती है कि कुछ ऐसा कह सकूँ, जो हमारे आपके जीवन को प्रभावित करनेवाले बदलावों से जुड़े, कुछ सामयिक सवाल उठाए
अचला शर्मा

तो श्रोताओं की नाराज़गी भरी चिट्ठियों के पहुँचने के भय, या कहा जाए कि अपनी आदत के अनुसार बीबीसी हिंदी इस साल फिर आ गया है एक नया रेडियो नाटक लेकर.

इस वर्ष के रेडियो नाटक का नाम है- रेस.

रेस

रेस कहानी है उस होड़ की, जिसने हाल के अर्से में भारतवासियों को कुछ ऐसा लपेट में लिया है कि वह सोच ही नहीं पा रहे कि जो सोचने के लिए मिल रहा है वह सोचने की चीज़ है भी कि नहीं.

रेस छोटे पर्दे पर पर लगी उस होड़ को सवालों के घेरे में लाने की एक कोशिश है जो सीधे असर डालती है आम लोगों की दिमाग़ी खुराक को.

छोटे पर्दे की इस रेस ने सवाल ला खड़ा किया है कि ख़बरों की परिभाषा क्या होनी चाहिए.

रेस सवाल उठाती है कि क्या ख़बर केवल किसी घटना को, बल्कि हर किसी छोटी-बड़ी घटना को बता देने भर का ही नाम है या ख़बरों के कुछ मानदंड भी हैं.

रेस के कलाकार
बुश हाउस में हुई रिकॉर्डिंग रेस की

बीबीसी हिंदी सेवा प्रमुख अचला शर्मा कहती हैं,"हर वर्ष के अंत में मेरी कोशिश रहती है कि कुछ ऐसा कह सकूँ, जो हमारे आपके जीवन को प्रभावित करनेवाले बदलावों से जुड़े, कुछ सामयिक सवाल उठाए."

उनके शब्दों में इस बार ये नाटक एक बड़ी चुनौती से कम नहीं था क्योंकि इस बार रेडियो, यानी आवाज़ के माध्यम से एक दूसरे ही माध्यम यानी छोटे पर्दे को श्रोताओं के सामने प्रस्तुत करना था.

तैयारी

हर बार की तरह इस बार फिर अचला शर्मा ने नाटक लिखने का बीड़ा उठाया, और 'लिखा' मतलब 'लिखा', अर्थात उसी शैली में काग़ज़ पर काली स्याही वाली कलम से लिखा जिस शैली में कंप्यूटर से पहले के युग में 'लिखे' जाते थे.

मूल पांडुलिपि, तत्पश्चात टंकित हुई, और फिर उनकी कापियाँ वितरित हुईं नाटक के कलाकारों को.

रेस के कलाकार
टेबुल के इस तरफ़ हैं अंशु शर्मा और दूसरी तरफ़ ममता गुप्ता

पत्रकार दल ने भी एक-बार फिर अपनी कॉलरें ऊचकाईं. और हो ना क्यों, आख़िर पूरा साल मुन्नाभाई एमबीबीएस और वीर ज़ारा के सीन याद करते रहे, अब जाकर मौक़ा मिला है अपनी प्रतिभा को साबित करने का!

रोल तय हुआ, प्रैक्टिस हुई, परवेज़ आलम और ममता गुप्ता सरीखे पेशेवर नाटककारों ने नए-नवेलों को डायलॉग डिलिवरी और आवाज़ की ऊँच-नीच समझाई, जो नहीं समझे उनको डाँट भी लगाई.

और फिर रविवार 19 दिसंबर को अचला जी की अगुआई में जुटे बीबीसी हिंदी सर्विस के वर्षांतस्फुरित नाट्यकार जुटे बुश हाउस के स्टूडियो में जहाँ बीबीसी वर्ल्ड सर्विस का दफ़्तर है.

और इस तरह तैयार हुआ बीबीसी हिंदी सर्विस का वर्षांत रेडियो नाटक - रेस - जिसका प्रसारण 25,26 और 27 दिसंबर को तीन किश्तों में किया जाएगा.

रेस में जिन कलाकारों ने अपनी आवाज़ें दी उनमें प्रमुख हैं - ममता गुप्ता, परवेज़ आलम, राजेश जोशी, अनीश अहलूवालिया, मानक गुप्ता, आकाश सोनी, अंशु शर्मा, संतोष सिन्हा, सुनीति सिंह, ब्रजेश उपाध्याय, नलिन कुमार, सुशील झा और मुकेश शर्मा.

नाटक में सहयोग देनेवाले अन्य कलाकार रहे - शिवकांत, अब्बास नासिर, नरेश अरोड़ा, उर्मिला शेखावत, अतुल संगर, पंकज प्रियदर्शी और तुफ़ैल अहमद.

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