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वर्दी वाली फ़िल्में पसंद नहीं आ रहीं हैं अब | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ऐसा लगता है कि हिंदी फ़िल्मों के दर्शकों ने वर्दी वाली फ़िल्मों से तौबा कर ली है. सन् 2004 का अब तक का लेखाजोखा तो कम से कम यही बताता है. इन सात महीनों में सात ऐसी फ़िल्में रिलीज़ हुईं जिनमें कहानी वर्दीधारियों यानी पुलिसवालों या फ़ौजियों पर केंद्रित थीं. ये थीं ख़ाकी, आन, दीवार-लेट्स ब्रिंग अवर हीरोज़ होम, देव, अब तक छप्पन, लक्ष्य और गर्व. ये सभी फ़िल्में भारी-भरकम बजट वाली हैं. इनमें सितारे भी भारी-भरकम हैं. चार फ़िल्में तो बिग-बी यानी अमिताभ बच्चन की ही थीं. भारी बजट लेकिन ये बड़े बजट और बड़े सितारों वाली फ़िल्में बड़ी कमाई से बड़ी दूर रह गईं. हाँ, अबतक छप्पन और ख़ाकी को ज़रूर कुछ कामयाबी मिली. लेकिन बाक़ी पाँच फ़िल्मों में चाहे बिग-बी की मौजूदगी हो या जावेद अख़्तर की पटकथा, या फिर हृतिक रोशन, प्रीति ज़िंटा, अक्षय कुमार, संजय दत्त, सुनील शेट्टी, सलमान ख़ान जैसे सितारे-जादू किसी का नहीं चला. न तालियाँ न आँसू सबसे बुरी हालत तो दीवार की हुई जो भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 की जंग का ज़िक्र करती है. फ़िल्म के अनुसार तब से अब तक 21 भारतीय युद्धबंदी पाकिस्तान में क़ैद हैं. ये फ़िल्म इन लोगों पर आईएसआई और पाकिस्तानी फौजियों के ज़ुल्मों-सितम को दर्शाती है.
फिर दिल्ली का एक लड़का चोरी से पाकिस्तान में घुसता है और इन क़ैदियों को छुड़ा कर लाता है. ये पूरा खेल दर्शकों को पसंद नहीं आया. न तो उन्होंने दिल्लीवाले की ज़बरदस्त बहादुरी पर तालियाँ बजाईं और न ही पाकिस्तान में बंद लोगों की हालत पर आँसू बहाए. नतीजा यह निकला कि वितरकों ने अपने सिर पकड़ लिए. लक्ष्य की बात करें तो यह फ़िल्म यूँ तो एक ऐसे युवक की कहानी है जो तय नहीं कर पा रहा है कि उसे जीवन में करना क्या है. फिर कारगिल की लड़ाई होती है. तब तक वो सेना में अफ़सर बन चुका है. कारगिल में लड़ते हुए उसे पता चलता है कि उसके जीवन का लक्ष्य क्या है. एक संवेदनशील विषय में सेना और कारगिल को पिरो कर निर्देशक फ़रहान अख़्तर ने जो ग़लती की, उसका ख़ामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है. 'दिल चाहता है' जैसी हिट फ़िल्म देने वाले निर्देशक की इस फ़िल्म को हालाँकि मुंबई, दिल्ली और विदेशों में कुछ दर्शक तो मिल रहे हैं. लेकिन जयपुर जैसे शहरों में लक्ष्य दिखा रहे हॉल तीसरे हफ्ते तक पहुँचते-पहुँचते 60 फीसदी खाली हैं तो अकोला जैसे शहरों में 70 फीसदी. देव का भी वही हाल लक्ष्य की ही तरह संवेदनशील विषय देव का भी था.
बल्कि यह कहें तो ज़्यादा ठीक होगा कि देव एक संवेदनशील ही नहीं, सामयिक और ज्वलंत मुद्दे पर केंद्रित थी. गुजरात के दंगों पर आधारित इस फ़िल्म को बनाया भी बेहतरीन और समझदार निर्देशकों में गिने जाने वाले गोविंद निहलानी ने. लेकिन अमिताभ बच्चन और ओमपुरी जैसे दिग्गजों की इस फ़िल्म में कहानी पुलिसवालों की ही थी. इसलिए अमिताभ की देव मुंबई में ही दूसरे हफ्ते में केवल 32 प्रतिशत कलेक्शन ही जुटा पा रही है तो आगरा में 26 प्रतिशत और इंदौर में 21 प्रतिशत. पुलिसवालों की ही कहानी बयान करती 'आन' आई तो बड़ी धूम से पर, कब ग़ायब हो गई, पता ही नहीं चला. पुलिसवालों और फ़ौजियों की सबसे ताज़ा कहानी है-गर्व. अभिनेता पुनीत इस्सर की बतौर निर्देशक यह पहली फ़िल्म है. लेकिन सलमान ख़ान की इस फ़िल्म को भी मुंबई-दिल्ली जैसे शहरों में ही पहले पूरे हफ़्ते ही पूरे हॉल के दर्शक नसीब नहीं हो रहे हैं. अपील का सवाल इन सबकी फ़िल्मों में जिनमें फ़ौजी थे, उनमें पाकिस्तान भी था. कहीं सही सही तो कहीं केवल संदर्भ में. जहाँ पुलिसवाले थे, वहाँ भी कई जगह आतंकवाद था. फ़िल्म पंडित कहते हैं कि यह पहली वजह है जो लोग इन फ़िल्मों की तरफ़ खिंचे नहीं चले आए. निर्माता मुकेश भट्ट का कहना है कि ऐसी फ़िल्में ज़रूरत से ज़्यादा बन गई हैं तो डेविड धवन का मानना है कि युद्ध का चक्कर अब लोगों को अपील नहीं करता है. निर्माता पहलाज निहलानी कहते हैं कि भारत पाकिस्तान के रिश्ते अब जहाँ हैं, वहाँ इन फ़िल्मों का पाकिस्तान की खिंचाई करना ही माइनस प्वाइंट है. इसके अलावा पहले मुन्ना भाई एमबीबीएस और कल हो न हो, फिर मर्डर और अब हम तुम और मैं हूँ न जैसी फ़िल्मों के लिए लगी भीड़ बता रही है कि आज लोगों को कैसी फ़िल्में चाहिए. आज की ज़रूरत ज़िंदगी से जुड़ी हल्की-फुल्की कहानी है या फिर घर-घर की कहानी मसलन बागवान. लेकिन एक सच यह भी है कि यह ज़रूरत आज की है, हिंदी फ़िल्मों के दर्शकों को रंग बदलते देर नहीं लगती. कल क्या चाहिए, इसका किसी को नहीं पता और यही निर्माताओं की सबसे बड़ी दिक्कत है. |
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