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सैनिकों की बहादुरी की दास्तान है 'एलओसी'
वर्ष 1999 में जब भारत प्रशासित कश्मीर के करगिल सेक्टर पर पाकिस्तान के साथ जंग छिड़ी थी तो ऐसा लगा था जैसे दोनों पड़ोसी देश जमकर घोषित रूप से युद्द करने वाले हों. बॉलीवुड की हालिया रिलीज़ फ़िल्म 'एलओसी:करगिल' उस संघर्ष की याद को एक बार फिर से ताज़ा कर गई है. जेपी दत्ता के निर्देशन में बनी इस फ़िल्म में एलओसी यानी लाइन ऑफ़ कंट्रोल या नियंत्रण रेखा पर उस समय की स्थिति को क़ैद करने की कोशिश की गई है जब वहाँ जंग छिड़ी थी.
फ़िल्म अपने दर्शकों में देश-प्रेम भरने की पूरी कोशिश करती है, लेकिन जेपी दत्ता इस बात से मना करते हैं कि उन्होंने राष्ट्रीयता की भावना को भुनाने की कोशिश की है. समय का सच जेपी दत्ता कहते हैं," मेरा काम अपने समय का गवाह बनना है और ये सच है कि हमारी सबसे बड़ी समस्या हमारा पड़ोसी है. उसके चलते हम परेशान रहते हैं और हमारे चलते वो." बॉलीवुड के लगभग 40 छोटे-बड़े सितारों से भरी इस फ़िल्म के एक नायक सुनील शेट्टी का कहना है, " ये फ़िल्म पाकिस्तान विरोधी बिल्कुल भी नहीं है. ये एक कोशिश है ये बताने की कि एक भाई ने दूसरे भाई को मारा है और जंग नहीं होनी चाहिए."
आमतौर पर बॉलीवुड की फ़िल्में सरहद पार पाकिस्तान में काफ़ी लोकप्रिय रही हैं. लेकिन इस फ़िल्म पर सरहद पार की प्रतिक्रिया का इंतज़ार सबको है. हालाँकि फ़िल्म के एक और अभिनेता अभिषेक बच्चन का मानना है, "पाकिस्तान के लोग भी इस फ़िल्म की प्रशंसा करेंगे. इस फ़िल्म में दोनों तरफ़ के सैनिकों की देशभक्ति दिखाई गई है." अब देखना ये है कि जब दुनिया भर में जगह-जगह होती जंगों को रोकने के लिए भी जंगें हो रहीं हैं तो ऐसे में जेपी दत्ता की ये फ़िल्म क्या कर पाती है. |
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