कपूर एंड संस चला पाएँगे फ़िल्म?

इमेज स्रोत, DHARMA PRODUCTIONS
- Author, मयंक शेखर
- पदनाम, फ़िल्म समीक्षक
फ़िल्म: कपूर एंड संस
निर्देशक: शकुन बत्रा
कलाकार: सिद्धार्थ मल्होत्रा. आलिया भट्ट, फ़वाद ख़ान
रेटिंग: ****
शहरी भारतीय परिवार को आधार बनाकर बनाई गई अब तक की फ़िल्मों में मुझे ये सबसे ज़्यादा झकझोरने वाली फ़िल्म लगी.
कहानी में ढेर सारे ट्विस्ट हैं और ये मुख्य रूप से चार पात्रों पर आधारित है जो लगभग चार दिन तक साथ वक़्त बिताते हैं.

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फ़िल्म की कहानी से ज़्यादा पात्रों के बीच की बातचीत, उनके बीच का तनाव, झगड़ा और दूसरी बाहरी बातें इसे इतना मज़ेदार बनाती हैं.
फ़िल्म के युवा कलाकारों के बीच ज़बरदस्त केमिस्ट्री नज़र आती है.
ये अपने आप में स्टार हैं. आलिया भट्ट एक सुंदर अभिनेत्री होने के साथ-साथ बेहतरीन एक्ट्रेस भी हैं. (इस रोल में वो करीना कपूर से ख़ासी प्रभावित लगती हैं)
फ़िल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा भी हैं जो अपने टैलेंट से बेख़बर थोड़े बेपरवाह से नज़र आते हैं.

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और हां, फ़वाद ख़ान भी हैं. सच कहूं तो महिलाओं के बीच में फ़वाद की अपार लोकप्रियता मेरे लिए थोड़ी समझ से परे है.
लेकिन चलो कोई बात नहीं. थोड़ा बहुत तो मैं समझ ही सकता हूं कि क्यों आप लोग उन पर अपनी भरपूर मोहब्बत लुटा रही हैं.
उनकी पिछली फ़िल्म 'ख़ूबसूरत' में उनके टैलेंट को पूरी तरह बर्बाद कर दिया गया था.
सिद्धार्थ और फ़वाद फ़िल्म में भाई बने हैं जो एक साथ बड़े होते हैं. लेकिन फ़िल्म सिर्फ़ इस बारे में नहीं है.

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फ़िल्म भाइयों के प्यार, उनकी प्रतिस्पर्धा, भरपूर पैसे, उसके बाद पैसों की तंगी, शादी, विवाहेतर संबंध वगैरह वगैरह पर भी फ़ोकस करती है.
फ़िल्म देखने के बाद आप ख़ुद अपने अंदर झांकने पर मजबूर हो जाएंगे.
ये फ़िल्म परिवार और रिश्तों के बीच की गंदगी को बेहद ख़ूबसूरती से उजागर करती है.
आप फ़िल्म के साथ बहते चले जाते हो क्योंकि हर एक किरदार आपको बांध लेता है.
फ़िल्म के सभी पात्र बिलकुल असल नज़र आते हैं. कोई परंपरागत बॉलीवुड फ़िल्मों की तरह हीरो नहीं है, सबके अंदर कुछ ना कुछ ख़ामियां हैं. सब इंसान नज़र आते हैं, देवता नहीं.
आपको रत्ना पाठक शाह में अपनी मां के कुछ अंश नज़र आएंगे.
रजत कपूर में आपको अपने पिता दिखेंगे.
दोनों भाइयों से भी आप आइडेंटीफ़ाई कर लेंगे.

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और फिर फ़िल्म में दादा का रोल निभा रहे ऋषि कपूर हैं. उनके आकर्षण से बचना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है.
ऐसे मज़ेदार, प्यारे क्यूट दादा को कौन प्यार नहीं करेगा. प्रोस्थेटिक्स के पीछे छुपे ऋषि कपूर ही इस किरदार को इतने स्वाभाविक तरीके से निभा सकते थे.
पोर्न देखता और सुट्टे लगाता ये प्यारा सा बूढ़ा आपको अपना दीवाना बना लेगा.
दादाजी की मौत नज़दीक है और वो मरने से पहले पूरे कपूर ख़ानदान को इकट्ठा देखना चाहते हैं.
इसी वजह से कपूर परिवार के सभी सदस्य एक जगह जमा होते हैं.
दोनों भाई (सिद्धार्थ और फ़वाद) में बातचीत नहीं होती है.
दोनों भाई पेशे से लेखक हैं. वो विदेश में रहते हैं.
क्योंकि भारत में लेखकों की क्या हालत है सब जानते हैं.

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दोनों एक ही लड़की (आलिया भट्ट) को पसंद करते हैं.
ओह नो, तो क्या फ़िल्म उसी दिशा में जाती है जैसा हम सोच रहे हैं. जी नहीं, यही तो इस फ़िल्म की ख़ासियत है.
मेरे ख़्याल से ये फ़िल्म मुझे मीरा नायर की मॉनसून वेडिंग की याद दिलाती है.
कपूर एंड संस के लिए इससे बेहतर तारीफ़ नहीं हो सकती.
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