2 माह रहा ट्रांसजेंडरों के साथ: विजय

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए बैंगलोर से
साल 2014 के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले कन्नड़ अभिनेता विजय अब हिंदी और तमिल सिनेमा के 'स्टार निर्देशकों' के साथ काम करना चाहते हैं.
62वां राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार विजय के लिए दोहरी ख़ुशी लेकर आया है.
कन्नड़ फ़िल्म 'नानु अवनालु अवालु' में एक ट्रांसजेंडर की भूमिका निभाने के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला.
वहीं उनकी फ़िल्म 'हरिवु' को कन्नड़ भाषा की साल 2014 की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म चुना गया है.
'यकीन नहीं हो रहा'

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कर्नाटक की राजधानी में बैंगलुरु में रहने वाले 42 वर्षीय फ़िल्म और रंगमंच अभिनेता विजय को अभी तक देश का सबसे बड़ा फ़िल्म पुरस्कार जीतने की बात पर यक़ीन नहीं हो रहा.
उन्हें नहीं लगता था कि वो आमिर ख़ान या सलमान ख़ान जैसे कलाकारों को पीछे छोड़कर ये पुरस्कार जीत पाएंगे.
विजय ने बीबीसी हिंदी से कहा, "मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे राष्ट्रीय पुरस्कार मिल सकता है. मुझे नहीं पता था कि मैं दूसरों से आगे निकल सकता हूँ."
विजय ने कहते हैं, "मैं नियमित और लीक से हटकर दोनों तरह की भूमिकाएँ करना चाहता हूँ."
विजय अब तक आठ कमर्शियल और दो 'कलात्मक' फ़िल्मों में काम कर चुके हैं. उनकी हिंदी फ़िल्म 'होमस्टे' अभी रिलीज़ होने वाली है.
भूमिका की तैयारी

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एक ट्रांसजेंडर की भूमिका निभाने को लेकर क्या उन्हें कोई हिचक थी, ये पूछने पर विजय ने कहा, "आम चरित्र न निभाना एक बड़ी चुनौती है. मुझे लीक से हटकर भूमिकाएँ करना पसंद हैं क्योंकि मुझे कलाकार के रूप में ख़ुद की तलाश पसंद है."
विजय इससे पहले प्रकाश राज की फ़िल्म 'ओग्गाराने' में एक 'समलैंगिक' का किरदार निभा चुके हैं जिसे देखकर फ़िल्म के निर्देशक लिंगादेवारु ने उन्हें इस फ़िल्म के लिए चुना.
अपने किरदार को समझने के लिए विजय कई दिनों तक ट्रांसजेंडरों की कॉलोनी में रहे. वो कहते हैं, "उनमें से कइयों ने फ़िल्मों में काम किया था. मैं उनके साथ क़रीब 60 दिन रहा."
विजय का पूरा नाम विजय कुमार है लेकिन उनका लोकप्रिय नाम 'संचारी' विजय है क्योंकि वो 'संचारी' नामक नाटक समूह से जुड़े हुए हैं.
इंजीनियर से बने अभिनेता

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इंजीनियरिंग स्नातक विजय पिछले दो सालों से पूरी तरह से फ़िल्म और रंगमंच को समर्पित हैं लेकिन उससे पहले कम्प्यूटर साइंस पढ़ाते थे.
ट्रांसजेंडरों के मुद्दे को उठाने वाली फ़िल्म 'नानु अवनालु अवालु', 'लिविंग स्माइल' विद्या की आत्मकथा 'आई एम विद्या' पर आधारित है.
हालांकि फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर अच्छा कारोबार नहीं कर पाई.

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प्रसिद्ध रंगकर्मी और अभिनेता प्रकाश बेलावाड़ी कहते हैं, "क्षेत्रीय भाषाओं के अभिनेताओं का राष्ट्रीय पुरस्कार जीतना अचरज की बात नहीं है. हमारे राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों की यही सबसे ख़ास बात है."
बेलवाड़ी याद दिलाते हैं कि इससे पहले कन्नड़ सिनेमा में पी लंकेश और शंकर नाग को राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं. हालांकि कन्नड़ के किसी हीरो ने क़रीब 27 साल बाद राष्ट्रीय पुरस्कार जीता है.
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